राष्ट्रीय एकता पर राजनीति

राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक के निष्प्रभावी रहने के कारण बता रहे है हृदयनारायण दीक्षित

सांप्रदायिक तुष्टीकरण और राष्ट्रीय एकीकरण साथ-साथ नहीं चल सकते। सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में ही चेतावनी दी थी कि मजहब के आधार पर अल्पसंख्यक दर्जे के दावों को महत्व देने से समाज के विभिन्न वर्गो को संविधान में प्रदत्त विशेष संरक्षण और विशेषाधिकार प्राप्त करने की उम्मीदों को बढ़ावा मिलेगा। यदि मजहब के आधार पर इसी सिद्धांत को बढ़ावा दिया गया तो देश को धार्मिक भिन्नता के आधार पर एक नए विखंडन का सामना करना पड़ सकता है। कोर्ट ने अल्पसंख्यकवाद में अलगाववाद और अलगाववाद से नए राष्ट्र विभाजन का खतरा बताया। बावजूद इसके केंद्र उग्र मजहबी सांप्रदायिकता और अलगाववाद के सामने मिमियाता रहा, तुष्टीकरण जारी है। केंद्र ने सांप्रदायिक बजट बनाया और मुस्लिम सर्वोपरिता का नया सिद्धांत चलाया। केंद्र ने आतंकी अफजल को छूट देकर पूरे मुस्लिम समाज को आतंक-समर्थक माना। सपा सरकार ने सिमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से राष्ट्रद्रोह का मुकदमा उठाकर समूचे मुस्लिम समाज को सिमी समर्थक जाना। वोटबैंकवादी दलों ने आतंकवाद पर नरम रुख अपनाकर समूचे मुस्लिम समाज को खुश करने की कोशिशें की। तुष्टीकरण, मजहबी आक्रामकता और अलगाववाद राष्ट्रीय एकता का सर्वनाश कर रहे हैं, बावजूद इसके ये सारे विषय राष्ट्रीय एकता परिषद की कार्यसूची से बाहर थे।

प्रधानमंत्री राष्ट्रीय एकता का क्या अर्थ लेते हैं? भारतीय राष्ट्र जीता जागता 'राष्ट्र पुरुष' है। अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक चिंतक ओपेनहाइम ने राष्ट्र राज्य को 'साधारण अंतरराष्ट्रीय व्यक्ति' बताया है। राष्ट्र एक व्यक्ति है, भूमि, जन और राज्यव्यवस्था इसकी देह हैं, संस्कृति इसका प्राण है। लेकिन प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में भारतीय संस्कृति को कई संस्कृतियों की साझे वाली 'कंपोजिट कल्चर' बताया। किसी विशेष भूखंड के प्रति एकल प्रीति और इस भूखंड के निवासियों के जीवन की सुंदरतम रीति ही संस्कृति कहलाती है। राष्ट्र भू सांस्कृतिक आस्था है। संस्कृति का निर्माण पंथ, मजहब या रिलीजन से नहीं होता। वरना तुर्की, इंडोनेशिया और पाकिस्तान की संस्कृति एक जैसी होती। आतंकवाद पर गहन बहस की जरूरत है। प्रधानमंत्री के अनुसार आतंकवाद से कड़ाई से निपटना है, लेकिन किसी संप्रदाय विशेष को पीड़ित नहीं किया जाना चाहिए। यहां बुनियादी प्रश्न यह है कि आतंकवाद को मजहब से जोड़कर देखने की आवश्यकता क्या है? भारत में हजारों लोग हत्या, लूट, डकैती, दुष्कर्म आदि आरोपों में रोजाना गिरफ्तार होते हैं। उनका धर्म-मजहब नहीं देखा जाता। आतंकवाद राष्ट्र के विरुद्ध सीधा युद्ध है, बावजूद इसके आतंकवादी का मजहब देखा जाता है। सुरक्षाबल क्या करें? वे आतंकी पर कार्रवाई भी करें और मजहब विशेष का ध्यान भी रखें। उनके समक्ष यह एक असंभव चुनौती है।

भारतीय संविधान में केंद्र व राज्यों के प्रमुख सत्ता संचालकों के एक साथ विमर्श करने का कोई श्रेष्ठ मंच नहीं है। राष्ट्रीय एकता परिषद ऐसा मंच हो सकती है, लेकिन केंद्र ने इसका दुरुपयोग किया। प्रधानमंत्री उड़ीसा की घटनाओं को उठाकर हिंदू संगठनों को घेरना चाहते थे। उन पर अंतरराष्ट्रीय ईसाई समुदाय और सोनिया गांधी का दबाव रहा होगा। प्रसिद्ध संत लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या सहित उड़ीसा की सारी घटनाएं मतांतरण से जुड़ी हुई हैं। अपनी आस्था के अनुसार धर्म चयन या मतांतरण व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन भय, लोभ या षड्यंत्र के जरिए किसी दूसरे व्यक्ति को मतांतरित कराने का काम जघन्य अपराध है। महात्मा गांधी भी मतांतरण के विरोधी थे। मतांतरण राष्ट्रांतरण है। इसलिए राष्ट्रीय एकता का शत्रु है। केंद्र ने मतांतरण और राष्ट्रीय एकता को भी एकता परिषद के एजेंडे से बाहर रखा। केंद्र का अपना तुष्टीकरण एजेंडा है। जनमत इस एजेंडे के खिलाफ है। केंद्र राष्ट्रभाव और राष्ट्रीय एकता के मौलिक विचार का विरोधी है।

राष्ट्र से भिन्न कोई भी 'आग्रही अस्मिता' राष्ट्रीय एकता की बाधक है। मजहबी आग्रही राष्ट्र को चुनौती देते हैं, अपनी अलग पहचान और निजी कानूनों पर भी संघर्ष करते हैं। भारत में मुसलमानों का अलग 'मुस्लिम पर्सनल ला' है। यह सिविल कानूनों तक सीमित है। केंद्र और कुछ दलों की कार्यशैली से साफ जाहिर है कि इन्हें 'निजी आपराधिक कानूनों' की भी आवश्यकता है। तभी तो आतंकवाद निरोधक सभी निर्देशों, वक्तव्यों में कड़ी कार्रवाई के साथ मुसलमान का विशेष उल्लेख रहता है, मसलन आतंकियों पर कड़ी कार्रवाई हो, लेकिन मुस्लिम समाज को परेशान न किया जाए?

2 दिसंबर 1948 को संविधान सभा में मो. इस्माइल और ताहिर ने अल्पसंख्यक रक्षोपाय के दो प्रश्न उठाए। काजी करीमुद्दीन ने समर्थन किया। बहस मौलिक अधिकारों पर थी, इसलिए सबके लिए थी, लेकिन अल्पसंख्यक अधिकार बीच में आ गए। उन्नाव के दो सदस्य भिड़ गए। मो. हसरत मोहानी ने कहा कि अगर किसी के दिमाग में यह बात है कि वह पर्सनल ला में दखल दे सकता है तो इसका नतीजा बुरा होगा, यदि कोई ऐसा कहने का साहस करता है तो मैं घोषणा करता हूं कि.. उपाध्यक्ष दु:खी हो गए। मौलाना फिर उसी अंदाज में बोले। विश्वंभर दयाल त्रिपाठी ने कहा कि क्या आप उनको नरबलि का अधिकार देंगे, जो इसमें विश्वास रखते हैं। संविधान सभा (25 व 26 मई 1949) में मो. इस्माइल ने कहा कि मैं नहीं समझता कि एक वर्ग से दूसरे को अलग करने के लिए मजहब को आधार बनाने में कोई हानि है। बहस बढ़ गई, सरदार पटेल ने कहा-''जिन लोगों के दिमाग में लीग का ख्याल बाकी है कि एक मांग पूरी करवा ली तो आगे उसी पर चलना है। मेहरबानी कर आप अतीत भूलिए, यदि ऐसा असंभव है तो आपके विचार में जो सर्वोत्तम देश है वहां चले जाइए।'' पं. नेहरू ने सरदार पटेल के तर्क का समर्थन किया। एक राजनीति 1948 व 49 में थी। प्रधानमंत्री और उपप्रधानमंत्री दो टूक बोल रहे थे, लेकिन अब तुष्टीकरण का ही जघन्य खेल जारी है। सिमी, इंडियन मुजाहिदीन या हुजी जैसे संगठन राष्ट्र, पंथनिरपेक्षता और संविधान नहीं मानते।

कांग्रेसी नेता वीरप्पा मोइली के नेतृत्व वाले प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी सख्त कानून की सिफारिश की है, लेकिन उसकी सिफारिशें भी वोट बैंक के खाते में जमा हो गईं। केंद्र ने इन सिफारिशों से संबंधित 'कड़ा कानून-कड़ी कार्रवाई' संबंधी कुछ पृष्ठ पढ़ने के लिए सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन के संयोजन में सचिवों की एक और कमेटी बनाई है। क्या वाकई सख्त कानून लागू करने जैसी छोटी सी बात के लिए कई कमेटियों/अध्ययन दलों की जरूरत है? डा. अंबेडकर ने संविधान सभा में एक अमेरिकी किस्सा सुनाया-''अमेरिकी प्रोटेस्टेंट चर्च ने देश के लिए प्रार्थना प्रस्तावित की, हे ईश्वर हमारे राष्ट्र को आशीर्वाद दो। अमेरिका राष्ट्र नहीं था, इसलिए प्रार्थना का विरोध हुआ। प्रार्थना में संशोधन हुआ, हे ईश्वर इन संयुक्त राज्यों को आशीर्वाद दो।'' भारत भी सत्तावादी दलों के लिए तमाम जातियों और ईसाइयत, इस्लामी मजहब वाली साझा राष्ट्रीयता का देश है। वे इसी साझा राष्ट्रीयता वाले देश के सत्ताधीश हैं और मजहबी राष्ट्रीयता के तुष्टीकरण कर्तव्यों में संलग्न हैं। हे ईश्वर, इन तुष्टीकरणवादियों को 'राष्ट्र' की समझ दो।