सनातन धर्म की सहधर्मिता

[धर्म के नाम पर किसी भी तरह की कट्टरता को पूरी तरह अस्वीकार्य बता रहे हैं कैलाश बुधवार]

धर्म का नाम लेते हुए डर लगने लगा है। किसी और के धर्म का नहीं, स्वयं अपने धर्म का। धर्म के नाम पर क्या-क्या नहीं होता। इस दुहाई पर कि धर्म खतरे में है, अपने धर्म की खातिर अच्छा-खासा समझदार व्यक्ति भी जान देने और जान लेने पर उतारू हो जाता है। मैं जन्म से हिंदू हूं और अपने हिंदू धर्म को बचाए रखना चाहता हूं, पर मुझे चिंता सता रही है कि कहीं अपना धर्म बदलने के लिए मुझे मजबूर न किया जाए। धर्म-परिवर्तन के इरादे से मुझे घेरा जा रहा है, पर सांस रहते मैं अपना धर्म छोड़ने को तैयार नहीं। ऐसे में गोस्वामी तुलसीदास की एक पंक्ति मन में कौंध रही है, 'कहा कहूं छवि आपकी, भले बने हो नाथ। तुलसी मस्तक तब नवै, जो धनुष-बाण लो हाथ'। तुलसी बाबा राम के भक्त थे। जब किसी पुजारी ने जबरन उन्हे कृष्ण की मूर्ति पूजने को मजबूर किया तो भगवान कृष्ण की मूर्ति ने वहां भगवान राम का रूप धारण कर लिया। इस प्रसंग से केवल यह सिद्ध होता है कि किसी के लिए भी अपने धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं। गोस्वामी तुलसीदास ने विष्णु अवतार भगवान कृष्ण की स्तुति में 'कृष्ण गीतावली' भी लिखी। उन्होंने राम और कृष्ण के भक्तों का वैमनस्य ही नहीं मिटाया, विष्णु और शिव के उपासकों के आपसी विरोध को मिटाने के लिए हर प्रकरण में राम और शिव से एक-दूसरे की पूजा करवाई। हिंदुओं के अलग-अलग संप्रदायों के आपसी विग्रह को चुनौती देकर तुलसीदास ने जिस तरह धर्म को उन्माद से मुक्त किया उस पर कवि बेनी की यह पंक्ति आज भी दोहराई जाती है, 'जो पै यह रामायन तुलसी न गावतो'। तुलसी ने कड़े समय में जिस धर्म की रक्षा की उसका नाम क्या है? असल में मेरे धर्म का 'हिंदू' नामकरण तो विदेशियों का किया हुआ है। यदि वह सनातन धर्म है तो क्या आर्यसमाजी हिंदू नहीं? यदि उसे वैदिक धर्म कहे तो क्या दक्षिण के तमिल उससे बाहर है?

हमारे मंदिरों में भगवान राम, कृष्ण और शिव की मूर्तियों के साथ महात्मा बुद्ध विराजते है, हम बद्रीनाथ के भी दर्शन करने जाते है, बालाजी के मंदिर में भी माथा टेकते है, वैष्णो देवी की भी यात्रा करते है, सिद्ध विनायक से मनौती मांगते हैं और पशुपतिनाथ की परिक्रमा भी करते है। जो लोग मंदिर नहीं जाते, मूर्ति-पूजा नहीं करते, क्या वे हिंदू नहीं हो सकते? हमारे धर्म में तो नास्तिक के लिए भी जगह है। हमने अपने धर्म पर कभी कोई लेबल नहीं चिपकाया। धर्म को अपने और पराये के भेद में नहीं बांटा। धर्म केवल धर्म है। उसे सांचों में ढालकर खरा-खोटा बनाना संभव नहीं। विदेशी पूछते है कि मेरे धर्म की परिभाषा क्या है, इस धर्म को कैसे पहचाना जाए? सवाल उठते है कि इस धर्म का प्रवर्तक कौन था? क्या कोई मसीहा था, जिसने यह धर्म शुरू किया? यह कब शुरू हुआ? बचपन में मैंने भी पूछा था। हमारा धर्मग्रंथ क्या है? किसी ने कहा वेद, किसी ने कहा गीता। नामों में रामायण, पुराण शास्त्र, उपनिषद और यहां तक कि मनु स्मृति का नाम गिनाया। बाहर वाले तब चौंकते है जब उन्हे अपने उसी प्रश्न के अलग-अलग उत्तर मिलते है। उनके लिए मेरा सीधा-सा उत्तर है कि मैं जिस धर्म में जन्मा उसे लकीरे खींचकर एक लेबल नहीं दिया जा सकता। मेरा धर्म किन्हीं नियमों की कैद में नहीं है। वह खरीद-फरोख्त का डिब्बाबंद सामान नहीं है। मेरा धर्म 'महाकुंभ' है, जहां भांति-भांति के लोगों के लिए अपने अलग मतों के अखाड़े जमाने की जगह है, जहां महासागर की लहरों की तरह विचारधाराएं टकराती है और आगे बढ़ती रहती हैं, जहां के मुक्त वातावरण में यह संभव है कि कोई भी दो भक्त एक तरह न सोचें, एक ही विधि से पूजा न करें। मेरे धर्म के मुक्त आकाश को जो अपने स्वार्थ से ढकना चाहते है, मेरा उनसे निवेदन है कि दूसरों की नकल करके आप मेरे धर्म को दूसरों के मजहब जैसा क्यों बनाना चाहते है?

हजारों वर्ष से जिन आस्थाओं की नींव पर हमारा देश अडिग है, क्या धर्माधता का कोई भूकंप उसे डिगा पाएगा? हजारों आक्रमणों के बाद भी जिस देश की आत्मा पर आंच नहीं आई, क्या उसकी आंखों में उन्माद का धुआं भरने के लिए आप अपने ही घर में आग लगा लेंगे? क्या हम उस वहशीपन का शिकार होना चाहते हैं जो दूसरों की हत्या करना, दूसरों की नारियों की अस्मत लूटना, दूसरों के धर्मग्रंथ जलाना और दूसरों के भगवान को खंडित करना अपने धर्म की सेवा मानता है? हमारी भूमि ने चार विश्व धर्मो को जन्म दिया। हमारे देश में जो भी आया, हमने उसे गले लगाया। हमारा देश सद्भाव का, सहधर्मिता का, सबको अपना मानने वाला देश है। हमारे ऋषियों ने हमें यही तो दिशा दिखाई थी। इसलिए साफ-साफ कह दूं मैं किसी भी बहकावे में किसी भी धमकी में अपना धर्म बदलने को तैयार नहीं। ऐसी कोई भी कोशिश विफल होगी जो मेरे विश्वासों की वह आधारशिला उखाड़ने पर आमादा है जिस पर अनादिकाल से मेरे सहधर्मियों की निष्ठा जमी है। प्रश्न यह है कि ऐसा धर्म जो हर पत्थर को भगवान मानकर पूजता है, ऐसा धर्म जो जड़-चेतन सबमें ईश्वर की झांकी देखता है, से मैं अपना नाता कैसे तोड़ लूं? इसी धर्म ने मुझे मूलमंत्र दिया है 'एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति'। यही धर्म मेरी तरह हर मनुष्य की पहुंच उस असीमित व्योम तक करवाता है जहां जीवन के रहस्य की खोज में कोई तर्क आड़े नहीं आता।

इसलिए मेरे धर्म की दुहाई देकर जो लोग उसके मुंह पर कालिख पोतने की कोशिश कर रहे हैं, धर्मांधता की आग लगाकर अपना ही घर जला रहे हैं वे बाज आएं। पागलपन का यह धुआं हम सबका दम घोंट रहा है, सबके दिलो-दिमाग को कचोट रहा है। मुझे माफ करो, मैं अपने धर्म को तुम्हारे रास्ते पर चलने को मजबूर नहीं होने दूंगा। मेरा धर्म तुम्हारे नारों के बहकावे में नहीं आने वाला, जहां तुम अनुयायी बटोर रहे हो। मेरा धर्म खुली हवा में सांस लेता है। तुम उसका गला नहीं घोंट सकते। मैं जन्म से हिंदू हूं, मैं हिंदू बने रहना चाहता हूं।