अलगाववाद की धारा

भारत का मन बेचैन है। वीएस नायपाल ने 'इंडिया, ए मिलियन म्यूटिनीज नाऊ' में ठीक लिखा है कि भारत लाखों विद्रोहों का देश है। जिहादी आतंकवाद राष्ट्रव्यापी है। भारत के गांवों और शहरों में यह लघु उद्योग की तरह पनपा है। केंद्र सहित तमाम राज्य सरकारों ने इसे सब्सिडी दी है। कश्मीर घाटी में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं। पूर्वोत्तार के राज्य अशांत हैं। हिंसक नक्सली 13 से ज्यादा राज्यों में प्रभावी हैं। लगभग 170 जिलों में उनकी समानांतर सत्ता है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का जाल देशव्यापी है, देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तार प्रदेश उसका खास प्रभाव क्षेत्र है। ढाई करोड़ बांग्लादेशी हैं, उन्हें भारतीय नागरिकता देने की मांग हैं। करोड़ों के जाली नोट हैं। 14-15 करोड़ मुसलमानों को बरगलाने वाले ढेर सारे कट्टरपंथी संगठन हैं। कई आतंकवादी संगठन हैं, बाकी इनके लिए तमाम कच्चा माल तैयार करते हैं। इंडियन मुजाहिदीन भारत को राष्ट्र नहीं मानता, निर्दोषों पर बम चलाता है, रक्तपात करता है। वह आतंकी सिमी का नया विस्तार है। नक्सलपंथ, अलगाववाद और जिहादी आतंकवाद राष्ट्र से युद्ध है। शत्रु आस्तीन में हैं, प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र महासभा में आतंकवाद से लड़ने के लिए सारी दुनिया से अपील करते हैं।

नक्सलपंथ से संघर्ष जारी है। वे मारे जाते हैं, दंडित भी होते हैं। उन्हें हिंदू बताकर शोर नहीं किया जाता। आतंकवादी आमने-सामने की मुठभेड़ में मारे जाते हैं, सप्रमाण गिरफ्तार होते हैं। बावजूद इसके शोर होता है, जबर्दस्त प्रतिरोध होता है। अबू बशर डंके की चोट पर आतंकवाद को जायज ठहराता है तो भी उसके लिए विलाप हो रहा है। न्याय व्यवस्था अफजल को फांसी का दंड सुनाती है, लोग उसकी तरफदारी में हैं। वाराणसी में एक संदिग्ध की गिरफ्तारी के विरोध में हजारों की भीड़ उसे छुड़ाकर ही शांत होती है। मुस्लिम समुदाय आहत है कि वह आतंकी घटनाओं को लेकर निशाने पर हैं। बुनियादी सवाल यह ंहै कि किसी संदिग्ध की गिरफ्तारी पर हजारों का मजमा क्यों लामबंद हो जाता है? वह पुलिस को अपना काम क्यों नहीं करने देता? सिमी/इंडियन मुजाहिदीन ने अपने मकसद नहीं छुपाए। वे भारत में इस्लामी राज्य-राष्ट्र चाहते हैं? प्रचार करते हैं कि यह अयोध्या में विवादित ढांचे का विध्वंस और गुजरात दंगों का बदला है। सवाल यह है कि क्या आतंकी युद्ध बीते 10-12 वर्ष का प्रतिफल है? नहीं। इतिहास की छोटी सी समझ भी भारत की अलगाववादी समस्या के विश्लेषण के लिए काफी है।

डा. अंबेडकर ने लिखा है,''ह्वेन सांग की भारत यात्रा के समय पंजाब, अफगानिस्तान भारत का हिस्सा था और यहां के निवासी वैदिक/बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। फिर पश्चिमोत्तार से मुस्लिम आक्रांताओं ने हमला किया। मो. बिन कासिम ने सिंध पर चढ़ाई की। बाद में गजनी के 17 आक्रमण हुए। 1173 ई. में गोरी ने हमला किया। चंगेज खान के मंगोल समूहों ने धावा बोला। 1526 ई. में बाबर ने हमला किया, फिर 1738 में नादिरशाह और 1761 में अहमदशाह अब्दाली ने।'' कांग्रेसी वामपंथी दृष्टि में इन हमलों का उद्देश्य लूट था। डा. अंबेडकर ने लिखा, ''नि:संदेह मूर्तिपूजा और हिंदू बहुदेववाद पर प्रहार कर इस्लाम की स्थापना इन हमलों का एक उद्देश्य था।'' हजारों मंदिरों का ध्वंस, काशी, मथुरा, अयोध्या, सोमनाथ और सारनाथ संग्रहालय की सभी टूटी मूर्तियां इसकी गवाही हैं, पर डा. अंबेडकर ने एक और खास साक्ष्य-अभिलेख दिया है,''हज्जाज को भेजे मोहम्मद बिन कासिम के खत का मजमून कि मूर्तिपूजकों को इस्लाम में दाखिल कर लिया गया या तबाह कर दिया गया। मंदिरों की जगह मस्जिदें बनाई गई हैं, कुतुबाह पढ़ी जाती है, अजान दी जाती है।''

भारतीय राजनीति इतिहास से आंख चुराती है। महमूद गजनी और बाबर तातार थे। गोरी, नादिर शाह और अब्दाली अफगान थे, तैमूर मंगोल था। वे आपस में शत्रु भी थे, लेकिन यह याद रखने लायक बात है कि हिंदू आस्था को ध्वस्त करने के प्रश्न पर सब एक राय थे। यही याद रखने लायक तत्व भारत के लोग भूल गए। इतिहासकार एएल श्रीवास्तव ने 'मध्यकालीन भारतीय संस्कृति' में लिखा है, ''कुरान और हदीस मुस्लिम शासकों को अपने शासन में हिंदुओं को रहने की अनुमति नहीं देते थे और उन्हें इस्लाम या मृत्यु, दोनों में से एक का चुनाव करने को कहते थे। उलेमा सुल्तानों पर दबाव डालते थे कि हिंदुओं को मुसलमान बनाया जाए या उनका वध किया जाए।''

हिंदू बहुमत के चलते ऐसा नहीं हो पाया। इस्लाम की हनीफी व्याख्या के मुताबिक इस्लाम या मृत्यु के अलावा तीसरा विकल्प था 'जिम्मी'। हिंदू जिम्मी थे। वे द्वितीय श्रेणी के नागरिक थे। सुल्तान अलाउद्दीन ने काजी से इस्लामी कानून में हिंदुओं की स्थिति पर सलाह मांगी। इतिहासविद् डा. टाइटस ने 'इंडियन इस्लाम' में लिखा, ''काजी ने कहा कि वे खिराज अदा करने वाले हैं। खुदा उनसे नफरत करता है। उन्हें अपमानित करना फर्ज है। पैगंबर ने हमें उनका कत्ल करने, लूटने और गुलाम बनाने का हुक्म दिया है। उन्हें इस्लाम में लो या मार डालो।''

सिमी/इंडियन मुजाहिदीन और उनके समर्थक अपने मकसद के प्रति ईमानदार हैं। वे कुरान की आयतें यूं ही ईमेल नहीं करते। कुरान में 'असहमत' के प्रति तमाम हिदायतें हैं। कहा जा सकता है कि प्राचीन धर्म को विवेचन का आधार नहीं बनाया जा सकता, लेकिन आधुनिक इस्लामी चिंतक सैयद कुतुब भी कहते हैं कि इस्लाम को अपना दैवी संविधान स्थापित करने के लिए जरूरी है कि उन भौतिक शक्तियों को नष्ट कर दिया जाए जो उसके मार्ग में बाधक हैं। अंतरराष्ट्रीय व्याख्याता इब्नतमैयाह ने कहा कि जिहाद तो काफिरों द्वारा छीनी गई मुस्लिम सत्ता को वापस दिलाने का विधिवत माध्यम है।

कांग्रेस 1885 से लेकर 1947 तक सबका मंच थी। महात्मा गांधी ने हिंदू-मुस्लिम साझा राष्ट्रीयता के ढेर सारे प्रयास किए। उन्होंने घोर सांप्रदायिक खिलाफत आंदोलन को समर्थन दिया, लेकिन आजादी के ठीक एक साल पहले (15 अगस्त 1946) कलकत्ता में हिंदू नरसंहार हुआ, दो माह बाद नोआखाली में यही हुआ। फिर रावलपिंडी (मार्च 1947) में भीषण हिंदू संहार हुए। इमाम बुखारी ने आजमगढ़ में यही दोहराने की धौंस दी। उनका इतिहास बोध सच्चा है, लेकिन राजनेताओं का कच्चा।

यह विडंबना है कि वर्तमान सत्ताधीश इतिहास से नजर नहीं मिलाते और इस तरह वे अलगाववाद की सतत प्रवाही ऐतिहासिक धारा की भी अनदेखी कर देते हैं। इतिहास क्षमा नहीं करता। वह पुरस्कृत करता है, उपकृत करता है, तिरस्कृत भी करता है, वर्तमान सत्ताधीशों को दंडित भी करेगा। वे जानबूझकर आतंकवाद/अलगाववाद पर नरम हैं। इतिहास का प्रवाह हमेशा एक जैसा ही नहीं चलता। इतिहास चक्र घूमता है। पराक्रमी सत्ता पाते हैं, युद्ध को कर्तव्य मानते हैं। राष्ट्र तभी वैभवशाली बनते हैं।

[आतंकवाद और अलगाववाद की समस्या की तह तक जा रहे हैं हृदयनारायण दीक्षित]