ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो पुरूस्कार की रात

ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो पुरूस्कार की रात
उनके निर्णय पे निर्भर हमारी औकात की रात

हाय वो रेशमी कालीन पे फ़ुदकना उनका
रटे-रटाए हुए तोतों सा चहकना उनका
कभी देखी न सुनी ऐसी टपकती लार की रात

हाय वो स्टेज़ पे जाकर के गाना जय हो
एक भी शब्द जिसका न समझ आया जज को
फिर उसी गीत को कहते हुए शाहकार की रात

जो न समझे हैं न समझेंगे 'दीवार' की माँ को कभी
जो न सुनते हैं न सुनेंगे गुलज़ार के गीतों को कभी
उन्हीं लोगों के हाथों से लेते हुए ईनाम की रात

अभी तक तो करते थे सिर्फ़ बातें ही अंग्रेज़ी में वो
आज के बाद बनाने भी लगेंगे फ़िल्में अंग्रेज़ी में वो
गैर के सराहते ही मिटते हुए स्वाभिमान की रात

क्या किया पीर ने ऐसा कि धर्म तक छोड़ा उसने?
क्या दिया धन ने हमें ऐसा कि देश भी छोड़ा हमने?
दिल में तूफ़ान उठाते हुए जज़बात की रात