औरैया में मिले 4000 वर्ष पुराने ताम्र उपकरण

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के एक गांव में पुरातत्वविदों को ऐसे ताम्र उपकरण हाथ लगे हैं जो 4000 वर्ष पुराने हो सकते हैं। इनके आधार पर उस क्षेत्र की प्रस्तावित खुदाई में मिल सकने वाले जीवाश्मों की कार्बन डेंटिंग से इलाके के सांस्कृतिक, अतीत और इसके कालक्रम को समझने में सहायता मिल सकती है।
   उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के निदेशक डा. राकेश तिवारी ने बताया कि ताम्र उपकरण 25 किलोग्राम का जखीरा है जिसमे मानव आकृतियां, कांटेदार भाले एवं नाना प्रकार की कलाकृतियां हैं। मजे की बात यह है कि ये कलाकृतियां सब संयोगवश और पुलिस एवं प्रशासन की चौकसी से मिली हैं।
  
   उन्होंने बताया कि ताम्र उपकरणों का वह जखीरा 31 अगस्त को अचानक और संयोगवश एक जुते हुए खेत से एक ग्रामीण के हाथ लगा जिसे उसने अपने गांव उदयपुरवा मे छिपा कर रख लिया कि मौका पाकर गलाकर धन कमाएगा।
  
   तिवारी ने बताया कि ग्रामीण अपने मकसद में कामयाब होता इससे पहले ताम्र उपकरणों की जानकारी स्थानीय पुलिस को लग गई और उसने छापा मार कर वह जखीरा बरामद कर लिया। जिला प्रशासन की सूचना पर पुरातत्वविदों ने उपकरणों का परीक्षण किया और पड़ताल से पता चला कि वह किसी प्राचीन सांस्कृतिक स्थान का हिस्सा है।
  
   डा. तिवारी ने बताया कि वह जगह जहां से ताम्र उपकरणों का जखीरा मिला वह उदयपुरवा गांव के दक्षिण में रिंद नदी के करीब है जो कि यमुना की एक सहायक नदी है। फिलहाल उस जगह पर खेती होती है।
  
   डा. तिवारी ने बताया कि मौके पर मिट्रटी के बने मोटे बरतनों के टूटे-फूटे टुकड़े जैसी चीजें ही बिखरी दिखीं मगर उनके गहन और सूक्ष्म अध्ययन से उस क्षेत्र के सांस्कृतिक अतीत की झलक दिख सकती है।
  
   उन्होंने बताया कि वर्ष 1822 में कानपुर के निकट बिठूर में मिले पहले ताम्र उपकरणों के जखीरे के बाद से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के विभिन्न भागों में अब तक लगभग 100 ऐसे जखीरे मिल चुके हैं और लगभग सभी जगहों पर मिट्रटी के खूब पके मोटे बरतनों के टुकडे़ मिले थे।
  
   डा. तिवारी ने बताया कि अब तक मिली जांचों के आधार पर विभाग ने भारतीय पुरातत्व विभाग को क्षेत्र की व्यापक खुदाई का प्रस्ताव भेजा है। उन्होंने बताया कि खुदाई में उस क्षेत्र से ऐसे तमाम जीवाश्मों के पाए जाने की संभावना है जिनकी कार्बन डेंटिंग से उस क्षेत्र के सांस्कृतिक अतीत में झांक कर देखा जा सकेगा और उसका काल निर्धारण भी संभव हो पाएगा।