'गांधीजी को नोबेल न देने का अफ़सोस'

महात्मा गांधी के जन्मदिन को संयुक्त राष्ट्र विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मना रहा है, उन्हें शांति और अहिंसा का प्रतीक माना जाता रहा है.
लेकिन इस बात को लेकर हमेशा बहस होती आई है कि शांति के लिए मिलने वाले विश्व के सर्वोच्च सम्मान यानी नोबेल पुरस्कार से गांधीजी को कभी सम्मानित क्यों नहीं किया गया.
लेकिन अब नोबेल फ़ाउंडेशन के कार्यकारी अध्यक्ष माइकल सोहलम ने अफ़सोस जताया है कि गांधीजी को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया गया.
एक भारतीय टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में नोबेल फ़ाउंडेशन के कार्यकारी अध्यक्ष ने कहा," हमने एक महान नोबेल विजेता को खो दिया और वे गांधी थे."
वहीं नोबेल म्यूज़ियम के क्यूरेटर डॉक्टर एनडर्स कहते हैं, "नोबेल म्यूज़ियम में हमें महात्मा गांधी की कमी सबसे ज़्यादा ख़लती है. मुझे लगता है कि वो एक ग़लती थी."
गांधीजी को पाँच पर नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया लेकिन नोबेल समिति का मानना था कि गांधीजी को ये सम्मान नहीं दिया जा सकता क्योंकि ‘वे सही मायनों में न ही राजनेता थे और ने राहतकर्मी’.
नोबेल से वंचित
गांधीजी को 1937, 1938,1939, 1947 और फिर उनकी हत्या के कुछ दिन पहले 1948 में नामांकित किया गया था.
1948 में किसी को भी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया था. उस समय कहा गया था कि कोई भी ऐसा कोई उपयुक्त जीवित व्यक्ति नहीं है जिसे ये पुरस्कार दिया जा सके.
नोबेल फ़ाउंडेशन के कार्यकारी अध्यक्ष माइकल सोहलम का कहना है, "मैं आमतौर पर नोबेल समिति के फ़ैसले पर टिप्पणी नहीं करता. लेकिन यहाँ तो उन्हें ही लगता है कि गांधीजी छूट गए."
उन्होंने टीवी चैनल से बातचीत में कहा, "समय-समय पर नोबेल पुरस्कार के लिए कई भारतीयों के नाम पर चर्चा हुई लेकिन उनका नाम कभी सूची में नहीं आया. जिन लोगों को नोबेल नहीं दिया गया उनमें से सबसे बड़ा नाम गांधीजी का था."
भारत में जन्मे या भारतीय मूल के कई लोगों को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है. इनमें रबींद्रनाथ टैगोर, सीवी रमन, डॉक्टर हरगोबिंद खुराना, डॉक्टर चंद्रशेखर, मदर टेरेसा, प्रोफ़ेसर अमर्त्य सेन और वीएस नायपॉल शामिल हैं.

क्या गांधी जी जैसी महान शख़्सियत नोबेल पुरस्कार की मोहताज थी ?

आज यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या गांधी जी जैसी महान शख़्सियत नोबेल पुरस्कार की मोहताज थी.

इस सवाल का सिर्फ़ एक ही जवाब है कि गांधी जी की इज़्ज़त और महानता नोबेल पुरस्कार से भी बड़ी थी.

अगर नोबेल कमेटी उन्हें यह पुरस्कार देती तो इससे उसी की शान बढ़ जाती. लेकिन नोबेल कमेटी ने यह अवसर गंवा दिया.