करुणानिधि का कृत्य

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि उस फटकार के सर्वथा योग्य है जो उन्हें उच्चतम न्यायालय से लगातार दो दिन सुननी पड़ी। आश्चर्य है कि पहले दिन की फटकार से उन्हें अपनी गलती समझ में नहीं आई।
 
उन्होंने अपने दल की ओर से बुलाए गए तमिलनाडु बंद पर उच्चतम न्यायालय के आदेश के विरोध में जिस तरह उपवास पर बैठने का निर्णय लिया उसकी सिर्फ निंदा ही हो सकती है। यह अच्छा रहा कि बंद को सफल बनाने के दबे-छिपे प्रयासों पर उच्चतम न्यायालय ने यहां तक चेतावनी दे डाली कि वह केंद्र को तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन लागू करने का निर्देश देने में संकोच नहीं करेगा। करुणानिधि चाहते तो उच्चतम न्यायालय के ऐसे कठोर तेवरों का सामना करने से बच सकते थे, लेकिन वह राज्य बंद के आयोजन को अवैध करार देने पर भी मनमानी करने से बाज नहीं आए। उन्होंने गुपचुप रूप से ऐसे प्रयत्न किए ताकि जनजीवन पर बुरा असर पड़े। वस्तुत: इस बात की जांच होनी चाहिए कि राज्य परिवहन निगम की बसें क्यों नहीं चलीं? द्रमुक नेताओं ने उच्चतम न्यायालय के साफ और सख्त निर्देश के बावजूद जो कुछ किया वह और कुछ नहीं, शीर्ष अदालत की अवहेलना है। सच तो यह है कि उन्हें बंद का आह्वान करना ही नहीं चाहिए था। आखिर इससे निकृष्ट राजनीति और क्या हो सकती है कि किसी राज्य में सत्तारूढ़ दल ही राज्य बंद का आयोजन करे? ऐसा करने वाले दल शासन करने के अपने नैतिक अधिकार को ताक पर ही रखते हैं। यह शुभ नहीं कि ऐसे बंद के खिलाफ उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बावजूद द्रमुक ने ऐसा करने की हिमाकत की। इससे भी अधिक अशुभ यह रहा कि उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट आदेश को खारिज करने की चेष्टा की गई और वह भी पूरी बेशर्मी के साथ। इस बेशर्मी में अपने स्वभाव के अनुरूप वाम दल तो शामिल हुए ही, केंद्र सरकार भी शामिल होती नजर आई।

   करुणानिधि के कथित अनशन का समर्थन करते हुए केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी का यह कहना लोगों की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश है कि यह जयंती से पहले महात्मा गांधी के प्रति सम्मान प्रकट करने का अहिंसक तरीका है। सच तो यह है कि यह गांधी जी के स्मरण का बहुत ही भोंडा तरीका है। ऐसे ही कृत्यों से गांधी जी और उनके विचारों की खिल्ली उड़ती है। माना कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता द्रमुक के समक्ष नतमस्तक होने के लिए विवश है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वह न्यायपालिका की अनदेखी करने के द्रमुक नेताओं के कृत्य में शामिल हो। यह घोर लज्जा की बात है कि तमिलनाडु बंद के खिलाफ उच्चतम न्यायालय की सख्ती पर द्रमुक नेता टीआर बालू ने न्यायपालिका का उपहास उड़ाने की कोशिश की। किसी केंद्रीय मंत्री का ऐसा आचरण सहन नहीं किया जाना चाहिए। देखना है कि वह किसी तरह के दंड के भागीदार बनते हैं या नहीं? उच्चतम न्यायालय के किसी निर्णय से असहमत होने का यह मतलब नहीं कि उसका अपमान किया जाए। दुर्भाग्य से पिछले दो दिनों में ऐसा ही करने की कोशिश की गई। यह भारतीय राजनीति की एक और खतरनाक प्रवृत्ति है। इस प्रवृत्ति का सख्ती के साथ दमन करने की जरूरत है, लेकिन आखिर यह करेगा कौन?
   [जागरण-मुख्य संपादकीय]