स्मरण- कोमल हृदय वाले भगत सिंह

कैदियों को होने वाली असुविधाओं के खिलाफ जब खिलाफ भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जेल में भूख हड़ताल आरंभ की तो उनसे प्रेरित कितने ही पुराने क्रांतिकारियों और सेनानियों ने भी भूख हड़ताल कर दी। उन्हीं में से एक थे बाबा सोहन सिंह। वह 1915-16 से जेल में बंद थे। जब भगत सिंह को मालूम पड़ा तब तक आठ-दस दिन हो चले थे। वह उन्हे समझाने गए, पर बाबाजी टस-से-मस न हुए। भगत सिंह ने कई तर्क दिए, खुशामदें कीं, समझाया कि हम है तो सही! बाबाजी ने पीठ पर एक धौल मारी, 'चल, बड़ा आया मुझे समझाने!' भगत सिंह की आंखों से टप-टप आंसू गिर पड़े। ऐसे ही एक बार दल की बैठक के समय गंभीर चर्चा के दौरान दुर्गा भाभी की गोद में उनका चार वर्ष का बच्चा भी था। वह प्यार से भगत सिंह को 'लंबू चाचा' कहता था। कोई गंभीर मंत्रणा चल रही थी और बच्चा बार-बार संतरे की जिद कर रहा था। ऐसी चर्चाओं के दौर में भला उस पर कौन ध्यान देता! उलटे भाभी ने उसे दो तमाचे जड़ दिए। भगत सिंह से न रहा गया। उनकी आंखों में आंसू आ गए। वह बच्चे को छाती से चिपटाए आंसू बहाते दरवाजे से बाहर निकल गए। सभी स्तब्ध रह गए।

   जेल में अनशन का ही एक और किस्सा है: भगत सिंह के अनशन में उनके साथ यतींद्रनाथ दास भी शामिल हो गए। यतींद्र दा की हालत पहले से नाजुक थी। वह सूख कर कांटा हो गए थे। दिन-पर दिन बीतते चले और वह मृत्यु के कगार पर खड़े हो गए। जब भगत सिंह उनसे मिलने पहुंचे तब उनकी वाणी भी अवरुद्ध हो गई और वह उनसे लिपट कर रोए। मानवीय घटनाएं ही नहीं, कोमल साहित्य तक उन्हे रुला डालता था। एक बार दल में सब क्रांतिकारी एक ऐसे उपन्यास के बारे में चर्चा कर रहे थे, जिसके सात पात्रों को फांसी हो जाती है। उनमें जो सबसे छोटी उम्र का था वह अपनी संभावित मौत से डरकर रोने लगता है कि नहीं, मुझे फांसी नहीं दी जाएगी! जब उसे फांसीघर ले जाया जाता है तब भी उसका विश्वास रहता है कि उसे फांसी नहीं दी जाएगी। सब लोग इस प्रसंग पर हंसने लगे, मगर भगत सिंह की आंखों में आंसू आ गए। जिसने मौत पर विजय पा ली थी वह उसके लिए रो रहा था जो अपनी मृत्यु से भयभीत था!
  
  
   राजशेखर व्यास