कलह बढ़ाते करुणानिधि

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की सलाह दे रहे हैं ए.सूर्यप्रकाश 
 

संप्रग सरकार द्वारा रामसेतु पर दिए गए शपथपत्र से होने वाले नुकसान की बड़ी तत्परता से क्षतिपूर्ति करने के बावजूद इस विवाद से छुटकारा पाने में कांग्रेस को दिक्कतें पेश आ रही हैं। इस शपथपत्र ने देश में दोनों राजनीतिक धाराओं में उफान ला दिया है। कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को तो चुप करा सकती है, पर गठबंधन के सदस्यों जैसे, द्रमुक और सहयोगी वामपंथी पार्टियों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। यह बिल्कुल साफ है कि द्रमुक नेता और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि तथा दो कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं ने गैरजरूरी और भड़काऊ बयानबाजी की। करुणानिधि, जो अब बिल्कुल असंतुलित व्यक्ति के तौर पर सामने आए हैं, के अनुसार भगवान राम पियक्कड़ थे। हिंदू मानते हैं कि भारत और श्रीलंका के बीच पुल का निर्माण राम ने करवाया था, इसलिए करुणानिधि ने हिंदुओं से पूछा कि राम कौन से इंजीनियरिंग कालेज में गए थे?

   करुणानिधि राष्ट्रीय एकता तहस-नहस करने की क्षमता रखते हैं। उनके बयान उत्तर और दक्षिण इलाकों तथा आर्य और द्रविड़ जातियों में संघर्ष करा सकते हैं। अपने बयानों पर करुणानिधि को जरा भी अफसोस नहीं है। उनके बयानों पर माकपा के महासचिव प्रकाश करात का कहना है कि आस्थावान लोगों की तरह नास्तिकों को भी अपनी राय रखने का हक है। यह सही है पर इससे पहले कि वह अपने शब्दाडंबर पर आत्ममुग्ध हों, उन्हें संविधान की भारतीय दंड संहिता के अध्याय 15 को ध्यान से पढ़ना चाहिए, जिसमें धर्म संबंधी अपराधों की व्याख्या है। जैसा कि हम जानते है, द्रविड़ पार्टियां और कम्युनिस्ट गढ़े हुए तर्कवाद का इस्तेमाल करते हैं। जब वे ऐसे व्यक्ति या घटना के संबंध में बात करते हैं जो हिंदुत्व की परिधि में आते हों तो उनके तर्कवादी संवेग उद्दात हो जाते हैं। लेकिन ईसाई या इस्लाम की पौराणिक मान्यताओं के सामने आते ही ये संवेग भाप बनकर उड़ जाते हैं। भारत वासियों की धर्म में गहरी आस्था है। ऐसे में कुछेक नास्तिकों को यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि वे धार्मिक मान्यताओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणी कर जन-जीवन का अस्त-व्यस्त कर दें। नास्तिक मुट्ठी भर ही हैं। 1991 की जनगणना के मुताबिक उस समय भारत में केवल 1782 अनीश्वरवादी और 101 नास्तिक थे। इससे पहले कि ये अति लघु अल्पसंख्यक अनिश्वरवादी और बवाल मचाएं, हमें उनके अत्याचारों को खत्म करना होगा। रामसेतु विवाद ने एक बार फिर से उस घबराहट को उजागर कर दिया है जो कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के बुर्जुआ लोकतंत्र की अवमानना करने वाली पार्टियों के संसर्ग से पैदा होती है। अमेरिका-भारत के बीच परमाणु करार के संदर्भ में ये अति लघु अल्पसंख्यक भारत की बांह मरोड़ने और बहुसंख्यकों को कुचलने की तैयारी में हैं। अगर कांग्रेस को भारत की संप्रभुता को बचाए रखना है तो उनकी धौंस पर अंकुश लगाना होगा। वह यह कहकर बरी नहीं हो सकती कि यह गठबंधन राजनीति की अनिवार्यता है। उसके दोस्तों और अन्य सहयोगियों द्वारा भगवान राम पर किए गए हमले से भारत में राष्ट्रीय एकता का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो सकता है। राम की मान्यता केवल धार्मिक संदर्भों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे तो भारत की अवधारणा के ही केंद्रीय बिंदु हैं। धर्म के संकीर्ण सीमांत से परे जनमानस पर राम के प्रभाव की सबसे सटीक व्याख्या जवाहरलाल नेहरू ने की है। उन्होंने दोनों महाकाव्य रामायण और महाभारत को जीवनी शक्ति बताते हुए कहा कि वे जनजीवन की संरचना का एक अंग हैं। अपनी पुस्तक 'भारत की खोज' में उन्होंने कहा है कि उन्होंने कहीं भी, कभी भी ऐसी पुस्तक नहीं देखी, जिसने जनमानस पर इतना सतत और जबरदस्त प्रभाव डाला हो, जितना कि इन दोनों महाकाव्यों ने। राष्ट्रीय मानस पर पड़ने वाले प्रभाव के अलावा ये देश को एकता के सूत्र में बांधने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। नेहरू की राय में, ''ये महाकाव्य हमें समझाते हैं कि जातिवाद के विविध रूपों और स्तरों पर बंटे रहने के बावजूद, उनके मतभेद दूर करने और शौर्य की परंपरा और नैतिक जीवन जीने की पुरातन भारतीयता का राज क्या है। वे लोगों के विचारों में एकरूपता लाने का प्रयास करते हैं, जो विभिन्नता को कम करने में कारगर है।'' महात्मा गांधी कहा करते थे,''उन्हें गीता और रामायण से बड़ी सांत्वना मिलती है। मैं साफगोई के साथ स्वीकार करता हूं कि कुरान, बाइबिल और विश्व के अन्य धर्मग्रंथों में से कोई भी मेरे दिल को इतना नहीं छूता, जितना भागवत गीता और रामायण।'' क्या कांग्रेस में कोई इन पंक्तियों को पढ़कर करुणानिधि जैसे सहयोगियों को सुना सकता है, जो अपने ईशनिंदात्मक बयान के बारे में सफाई देने के लिए वाल्मीकि का उल्लेख कर रहे हैं।
  
  
   किसी को भारतीय दंड संहिता की धारा 295 भी करुणानिधि को पढ़कर सुनानी चाहिए, जिसके अनुसार जो कोई शब्दों या भावभंगिमाओं से किसी वर्ग के नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनावश ठेस पहुंचाता है अथवा उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वास का अपमान या अपमान करने का प्रयास करता है तो उसे तीन साल तक सजा और दंड या दोनों भुगतने होंगे। धारा 298 में भी ऐसे लोगों के लिए सजा का प्रावधान है, जो शब्दों या इशारों से किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाए। इन दो धाराओं के अलावा, धारा 153 के अनुसार अगर कोई व्यक्ति विभिन्नों धर्मों, भाषाई अथवा क्षेत्रीय गुटों या जातियों या संप्रदायों की ईशनिंदा करता है, नफरत, दुर्भावना को बढ़ावा या बढ़ावा देने का प्रयास करता है तो उसे तीन साल तक सजा हो सकती है। करुणानिधि के बयान इस प्रावधान की जद में भी आते हैं, क्योंकि वे ईशनिंदा कर विभिन्न जातियों में भेद पैदा कर रहे हैं। वे उन लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं, जिनके आराध्य राम हैं। अगर हिंदू आस्था और विश्वास का संबल कायम रखना चाहते हैं तो उन्हें दंड संहिता की इन धाराओं का इस्तेमाल करते हुए करुणानिधि पर केस करना चाहिए।