इतिहास का भारतीय अंदाज

इतिहास के प्रति भारतीयों की समझ को औरों से अलग बता रहे हैं हृदयनारायण दीक्षित 
 
आस्था की स्थापना शून्य में नहीं होती। आस्था इतिहास से सामग्री लेती है, आदर्श और मर्यादा के तराजू से तौल करती है, विवेक पर कसती है, श्रद्धा बनती है और आस्था में रूपांतरित हो जाती है। राम इतिहास है, मर्यादा पुरुषोत्तम होने के कारण आस्था बने। महात्मा गांधी भी इतिहास है, संस्कृति मूलक त्याग तप के चलते वे बापू बने। गांधी जी इतिहास में गुजरात वाले मोहनदास करमचंद है, लेकिन लोकआस्था में साबरमती के संत और राष्ट्रपिता। श्रीराम भी इतिहास में इक्ष्वाकुवंशी दशरथ के पुत्र अयोध्या के राजा है, लेकिन आस्था में विष्णु अवतार और परब्रह्म भी हैं। गांधी इतिहास की तारीखों में मिल जाते है, वे अभी-अभी हुए। राम इसी तर्ज के इतिहास में नहीं मिलते। वे इस इतिहास के पूर्व प्रागैतिहासिक काल में हुए। अमरकोश के अनुसार तब इतिहास का नाम पुरावृत्त था- इतिहास: पुरावृत्तम इत्यमर:।

   कालिदास ने रघुवंश में राम के समय के इतिहास बोध की चर्चा की है कि विश्वामित्र ने राम को 'पुरावृत्त' सुनाया था। भवभूति, कालिदास और राजशेखर ने रामायण को इतिहास बताया है। बौद्ध जातकों में अयोध्या के इक्ष्वाकुवंशी मांधाता, दशरथ और राम का उल्लेख है। बौद्ध पंथ आस्थावादी नहीं है। राम भारत की श्रुति, स्मृति, जीवन और स्पंदन में मौजूद है। बावजूद इसके एक मुख्यमंत्री, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एजेंसी, कांग्रेस और वामदल राम को इतिहास नहीं मानते। पूरे देश का माहौल गरम है। शब्द और अपशब्द, आस्था बनाम अनास्था का संघर्ष है। बेशक श्रीराम यूरोपीय तर्ज का इतिहास नहीं हैं। भारत ने यूरोपीय तर्ज पर अपना इतिहास संकलन नहीं किया। अलबरूनी का भी आरोप था, ''हिंदू चीजों के ऐतिहासिक क्रम पर अधिक ध्यान नहीं देते, वे अपने सम्राटों के कालक्रमानुसार उत्तराधिकार के वर्णन में लापरवाह हैं।'' भारत ने राजाओं की विवरणी नहीं बनाई। इसके भी अपने कारण थे। भारतीय ऐतिहासिको का मुंह भविष्य की ओर था। उन्होंने कूड़ा करकट से तौबा की। इतिहास से अनुकरणीय पात्र छांटे, उन्हे रचा, संवारा, काव्य और गीत बनाया। लोकस्मृति ने बुद्धि में सुरक्षित जगह दी और लोकमन ने हृदय में। राम, कृष्ण, हनुमान और राजा हरिश्चंद्र ऐसे ही नायक है। राजा ढेर सारे हुए, लेकिन राजा रामचंद्र एक ही हुए। राज्य भी बहुत हुए, लेकिन राम राज्य की पुलक ने गांधी को भी मोहित किया। भक्त भी बहुत सारे हुए, लेकिन एक हाथ में ध्वज और दूसरे हाथ में शक्ति वज्र लेकर हनुमान ही निकले। सिर्फ ध्वज से ही काम नहीं चलता, शक्ति के बिना ध्वज को कौन पूंछेगा? सिर्फ शक्ति से भी काम नहीं चलता, सिद्धांत के बिना शक्ति का दुरुपयोग निश्चित है।
  
  
   करुणानिधि पूछेगे कौन हनुमान? ये बिना हेलीकाप्टर ही हवाई यात्रा पर कैसे निकले? मा‌र्क्सवादी विद्वानों को भी वानरदेव का यह प्रतीक भौंचक करता है। विश्व सभ्यता/ कला के विश्लेषक हुड ने 'दि होम आफ हीरोज' में बताया ''क्रीट द्वीप की मिनीअन कला में हाथी दांत की मुद्रा में एक वानर है। यह मुद्रा 2200 से 2000 ई. पूर्व की मानी गई। मैकाय का विश्लेषण है कि सुमेर और एलम की वानर मूर्तियों से प्राचीन सिंधु घाटी में प्राप्त मूर्तियों की घनिष्ठता है।'' मूर्तियां शून्य से नहीं आई, वे इतिहास में तथ्य थीं और सर्जन में कला बनीं। कालिदास के समय आधुनिक विमान नहीं थे, लेकिन रघुवंश में पुष्पक विमान है। राम और सीता पुष्पक में है। कालिदास, तुलसी जैसे राम भक्त नहीं थे। वे रोमांटिक भी हैं। विमान माल्यवान पर्वत से गुजरा तो राम ने सीता से कहा, ''जब वर्षा हुई, तब तुम्हारी याद आई, वर्षा के कारण पोखरों से उठी गंध,अधखिली मंजरियों वाले कदंब पुष्प और भौरों के मनोहर स्वर तुम्हारे बिना बहुत अखरे।'' राम समुद्र देखकर सीता से कहते हैं, ''सगर ने अश्वमेध किया। कपिल घोड़ा ले उड़े। सगर पुत्रों ने धरती खोद डाली, यहां समुद्र बन गया।'' फिर रघु की कथा सुनाते है। कालिदास यह सामग्री कहां से लाए? तब एएसआई नहीं थी।
  
  
   भारत पर आर्यों के आक्रमण का गल्प इतिहास एशिया में साम्राज्यवादी प्रसार को उचित ठहराने के लिए लिखा गया। जेएस मिल ने ईसाई मिशनरियों के लिए भारत को बर्बर बताया। दयाराम साहनी ने 1920-21 में हड़प्पा व राखाल दास बनर्जी ने 1921-22 में मोहेजोदड़ों में दो प्राचीन नगर खोद लिए। आरपी चंद्र ने 1926 ई. आर्य आक्रमण का मिथक बनाया। ब्रिटिश पुरातत्व विशेषज्ञ मार्टीमर ह्वीलर ने 1947 में इसे बाकायदा तथ्यगत इतिहास बनाया। ह्वीलर ने 1950 में एक पुस्तक लिखी ''पाकिस्तान के 5 हजार साल: एक पुरातात्विक रूपरेखा।'' पाकिस्तान 1950 में 3 वर्ष का था, ह्वीलर 5000 वर्ष की पुरातात्विक रूपरेखा बता रहे थे। इन्हीं ह्वीलर की बुद्धि चतुराई से आर्य आक्रमण का मिथक इतिहास बन गया। आर्य विदेशी हो गए। इसी तरह रामायण और महाभारत इतिहास होकर भी मिथक बना दिए गए। भारत में यही पढ़ाया जाता है। जाहिर है कि इसे वास्तविक इतिहास नहीं कह सकते, लेकिन यूरोपीय तर्ज के इतिहास लेखन में ऐसी कारगुजारियां होती ही है।
  
  
   भारतीय शैली के इतिहास संकलन में ऐसी कारगुजारियों की गुंजाइश नहीं है। एनसीआईआरटी एक लंबे समय से राम और कृष्ण को कल्पना पुरुष पढ़वा रही है। भारत की लोकस्मृति इसे नहीं मानती। आर्य आक्रमण देश के सभी स्कूलों में पढ़ाया जाता है, लेकिन देश के किसी गांव, किसी भी कोने में किसी भी प्राचीन, अर्वाचीन ग्रंथ में आर्य आक्रमण का छोटा अंश भी नहीं है। लोकस्मृति ऐसा इतिहास नहीं स्वीकार करती। इतिहास याद रखने का उसका अपनी निजी अंदाज है। भारत को वास्तविक इतिहास बोध चाहिए। राम केवल हिंदू आस्था नहीं हैं। कांग्रेस ऐसा कहकर उन्हे छोटा करती है। वे भारत का पर्याय हैं और इतिहास भी है। इंडोनेशिया, बाली, जावा, मलेशिया, लाओस, कंबोडिया, इंग्लैंड और अमेरिका तक राम कथा की धूम रहती है। अपने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हर बरस विजयादशमी पर बधाई देते है। राम नहीं हुए तो यह फर्जीवाड़ा कैसा? अयोध्या इतिहास है, चित्रकूट तथ्य है, दंडकारण्य सत्य है, सरयू, मंदाकिनी और गंगा भी सामने है। लंका भी सत्य है। राम सेतु भी आंख के सामने है। सिर्फ राम ही नहीं दिखाई पड़ते तो इसके कारण साफ है कि इतिहास का मतलब ही 'हो चुका' होता है। राम हो चुके है, स्थल, उपस्थल, युद्धस्थल, उपासना स्थल के साक्ष्य है। चश्मा नंबर बदलने की जरूरत है। बुढ़ापे में अक्सर ऐसा होता है। जवानी में करुणानिधि को भी राम मर्यादा पुरुषोत्तम लगते थे, बुढ़ापे में कुछ नहीं लगते।
  
  
   अमेरिका सच्चे अथरें में राष्ट्र नहीं है, वह 13 राज्यों के स्वतंत्र अस्तित्व से मिलकर संयुक्त राज्य बना था। यह संख्या अब बढ़ गई है। अमेरिकी विचारक हटिंग्टन ''हू आर वी'' लिखकर इतिहास बोध जगा रहे है। डा. अंबेडकर ने संविधान सभा में अमेरिकी विधान निर्माण की कथा सुनाई। अमेरिका में प्रार्थना बनी ''हे प्रभु हमारे राष्ट्र को समृद्ध करो'', लेकिन प्रार्थना की शब्दावली पर झड़प हो गई, संशोधन हुआ, हे प्रभु हमारे संयुक्त राज्यों को समृद्ध करो।'' अमेरिका राष्ट्र नहीं है,राष्ट्र होना चाहता है। भारत सनातन राष्ट्र है, यह अपनी मूल जड़े कैसे काट दे? करुणानिधि, वामदल बताएं कि राम, कृष्ण और सनातन संस्कृति खारिज कर हम कैसा राष्ट्र चाहते है?
  
   (लेखक उप्र सरकार के पूर्व मंत्री हैं)