कृषि संकट का समाधान

 कृषि और किसानों के संकटग्रस्त होने के मूल कारण और उनके निदान बता रहे हैं राजेंद्र सिंह 
 
जब अर्थव्यवस्था नौ प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर से कुलांचे भर रही है तब कृषि दर चार प्रतिशत से भी नीचे घिसट रही है। वर्ष 1992-96 के बीच कृषि विकास दर चार प्रतिशत से अधिक जरूर रही पर 1997-98 में यह दो प्रतिशत पर अटक गई। कृषि विकास दर की वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में कृषि में निवेश बढ़ाया जाए। पिछले कई वर्षो से कृषि में निवेश कम हो रहा है। 2006 में प्रत्यक्ष निवेश मात्र 20,000 करोड़ था। खाद्यान्न, उर्वरक, ऊर्जा और सिंचाई में सब्सिडी को मिलाकर यह निवेश लगभग 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। निवेश और सब्सिडी का अनुपात 1:4 है। हमारे नीति नियंता यदि इस अनुपात को पलट कर 4:1 कर दें तो कृषि संकट काफी कम हो जाएगा। कुछ लोगों का मानना है कि भारतीय कृषि को व्यापार के लिए खोल देने से संकट का दौर आया है, लेकिन वास्तविकता यह नहीं है।
   कृषि में उदारीकरण का अर्थ अनुबंध खेती को प्रोत्साहन देना है, जिससे एक तरफ तो किसानों को बाजार जोखिम से बचाना है, वहीं दूसरी तरफ किसानों को नई प्रौद्योगिकी, कर्ज एवं मानक संबंधी जानकारियां, ऋण सुरक्षा आदि सुविधाएं आसानी से सुलभ करना है। आज कृषि क्षेत्र में वृद्धि की संभावनाएं नहीं के बराबर है। मृदा क्षरण, जल-भराव आदि से मिट्टी में विकृतियां आ गई है। भूमि में संतुलित पोषण न होने के कारण और उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग के कारण मिट्टी की उत्पादकता में कमी आई है। साथ ही सतह सिंचाई विस्तार कार्यक्रम में कमी, भू-जल स्तर काफी नीचे जाने के कारण समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। जहां तक कृषि में चार प्रतिशत विकास दर का प्रश्न है, फसली क्षेत्र में यह संभव प्रतीत नहीं होता, परंतु बागवानी और कृषिजन्य उद्योगों, जैसे दुग्ध पालन, मुर्गी पालन और मत्स्य पालन के जरिए 6-8 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की जा सकती है। आज 1.6 प्रतिशत वार्षिक दर से जनसंख्या बढ़ रही है। इस बढ़ती आबादी को भरपेट भोजन उपलब्ध कराने हेतु उत्पादकता और उत्पादन दोनों बढ़ाने की आवश्यकता है। इससे मांग-पूर्ति में संतुलन बना रहेगा। यह चिंता की बात है कि मांग और पूर्ति में खाई बढ़ती जा रही है। वर्ष 1995 में खाद्यान्न उत्पादन 191.5 मिलियन टन था। 2003 में घटकर यह 174.77 रह गया। 2005 में यह 204.6 मिट रहा। आज देश को कम से कम 210 मिलियन टन खाद्यान्न की आवश्यकता है। वित्तीय वर्ष 2000 में गेहूं की पैदावार 76.4 मिलियन टन थी, जो वर्ष 2005 में घटकर 68.4 और 2006 में 69.6 मिलियन टन पर आ गई। 2001 को आधार मानकर वर्तमान जनसंख्या वृद्धि दर के मद्देनजर हमें कुल 75 मिलियन टन गेहूं चाहिए, जो वर्तमान उत्पादन को देखते हुए लगभग 5.5 मिलियन टन कम है। गेहूं की घटती प्रति हेक्टेयर पैदावार को शुरू में गंभीरता से नहीं लिया गया, क्योंकि देश में गेहूं का इतना भंडार थाकि दो वर्षो तक मांग-पूर्ति में संतुलन बनाए रखा जा सका, पर वर्ष 2006 में स्थिति तब खराब हुई जब 2005 में कम उत्पादन और कम सरकारी खरीद होने से भंडारण में कमी आई। उदाहरण के लिए मार्च 2002 में 26 मिट गेहूं का सुरक्षित भंडार था, जो मार्च 2006 में घटकर दो मिलियन टन पर आ गया। यही कारण है कि सरकार को मांग-पूर्ति में संतुलन स्थापित के लिए गेहूं का आयात करना पड़ा। भारत सरकार ने महंगे आयात को कम करने के लिए चार वर्ष की कार्ययोजना तैयार की है, जिसमें 2011 तक गेहूं के पैदावार में 11 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है अर्थात 73 मिट से 80 मिलियन टन उत्पादन प्रतिवर्ष का लक्ष्य रखा गया है। इसी तरह का चावल का उत्पादन वर्ष 2011 तक 90 मिलियन टन से बढ़ाकर 110 करने का लक्ष्य रखा गया है। आज खाद्यान्न उत्पादन, मांग और पूर्ति की नियमित समीक्षा की आवश्यकता है, जिससे आयात द्वारा इस संतुलन को बनाया रखा जा सके। आयात एक स्थायी नीति नहीं हो सकती। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक राष्ट्र है, इसके बावजूद हमें 5.5 मिलियन टन गेहूं का आयात करना पड़ा। यह चिंता का विषय है। जब कभी मुख्य उत्पादन करने वाले देशों में उत्पादन कम होता है तो विश्व बाजार पर इसका प्रभाव पड़ता है। आयात का नियमित विकल्प छोटे राष्ट्रों के लिए तो ठीक है, पर भारत और चीन जैसे विशाल जनसंख्या वाले देशों के लिए सही नहीं। किसानों के सामने बड़ी समस्या उत्पाद मूल्य में उतार-चढ़ाव से है। जिस मूल्य पर किसान अपने उत्पाद बेचता है और जिस मूल्य पर उपभोक्ता इन उत्पादों को बाजार से खरीदता है उनमें जमीन-आसमान का फर्क हो सकता है। मूल्य अस्थिरता से किसानों की सुरक्षा के लिए एक मूल्य स्थिरीकरण निधि की स्थापना की जानी चाहिए। आजकल कुछ प्रदेशों में अनुबंध खेती का भी विरोध हो रहा है, जबकि अनुबंध खेती कृषि संकट का सही निदान है। इसके तहत कृषकों और प्रायोजकों के बीच एक होने वाले अनुबंध में कृषि उत्पाद की कीमत पहले से ही तय कर दी जाती है। <br>
  
   अनुबंध में यह सुनिश्चित किया जाता है कि प्रायोजक कंपनियां उत्पादन सुनिश्चित करने में किस हद तक सहायता दे सकती है? कृषक को प्रशिक्षण, ऋण व्यवस्था, बीज, उर्वरक आदि की सुविधाएं उपलब्ध कैसे होंगी, इस पर भी अनुबंध में चर्चा होती है। इस खेती का सबसे बड़ा लाभ फसल की बिक्री सुनिश्चित करना है। प्रायोजक कंपनियों को समय से और निर्धारित मूल्य पर कृषि उत्पाद मिल जाता है और किसानों जोखिम से बच जाते हैं। मूल प्रश्न यह है कि किसानों और प्रायोजकों के बीच अनुबंध की शर्तों का अक्षरश: पालन कैसे सुनिश्चित किया जाए? इसके लिए एक राष्ट्रीय कृषि विनियामक प्राधिकरण की स्थापना का सुझाव दिया जाता है। प्राधिकरण का कार्य किसानों और प्रायोजक कंपनियों के बीच किसी भी विवाद को सुलझाने के लिए एक पंच निर्णय के रूप से कार्य करना होगा। इस प्राधिकरण का कार्य यह भी होगा कि यह देश में सभी फसलों के उत्पादन का पूर्वानुमान लगाए और उसके आधार पर निर्यात और आयात के बारे में सही समय पर निर्णय ले।