यथार्थ से आगे है आस्था

- सदियों से मानव मन में बसे मिथकों की महत्ता पर प्रकाश डाल रहे हैं डा.महीप सिंह 
 
आस्था कहती है कि रामसेतु भगवान राम की वानर सेना ने बनाया था, जिससे होकर वह सेना सीता माता की मुक्ति के लिए लंका जा सके। वैज्ञानिक कहते है कि ये समुद्र में बालू और लाइमस्टोन के बने छोटे-छोटे द्वीप है, जिनका निर्माण प्रकृति ने किया है। आस्था और विज्ञान के मध्य हो रहे तर्क-वितर्क के मध्य स्वयं भगवान राम की लोकमानस में बनी संपूर्ण राम कथा ही प्रश्नों के घेरे में आ जाएगी, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था। भारत सरकार के पुरातत्व विभाग की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में जो हलफनामा दाखिल किया गया उससे न केवल सारे देश में हड़कंप मच गया, बल्कि संप्रग सरकार भी संकट में आ गई। सभी धर्मो में अनेक आस्था बिंदु होते है, जो शताब्दियों में विकसित होते हुए जन-मानस का अंग बन जाते है और तर्क-वितर्क से ऊपर उठ जाते है। कई बार वैज्ञानिक खोज और निष्कर्ष उनके विरुद्ध निकलते है। आस्था और विज्ञान के बीच की टकराहट सभी धर्मो और सभी देशों में होती रही है, भविष्य में भी रहेगी। इससे उन छवियों का बिंब संकट में नहीं पड़ता जिस पर करोड़ों लोग अपने मानस में ऊंचा महल उतार लेते है और उसे अपनी नैतिकताओं और आदर्शो का प्रेरक स्त्रोत मान लेते है। राम एक ऐसा ही शब्द है। 

   इस देश की बहुसंख्या में दो ऐसे धुरी शब्द है जिन पर उसका मानस घूमता है। ये शब्द है- राम और कृष्ण। वैसे राम को अंशावतार और कृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है, किंतु राम शब्द में वैयक्तिकता के साथ निर्वैयक्तिता का जैसा संयोग है वह कृष्ण शब्द में नहीं है। कृष्ण का बिंब वासुदेव, देवकी, नंद, यशोदा, गोप-गोपियां, कंस, जरासंध और महाभारत में उनकी भूमिका के प्रसार में घूमता है, किंतु राम का नाम तो सभी प्रकार के सांसारिक संबंधों और कार्यो से परे निकल जाता है। संत कबीर ने अपने एक पद में कहा है- मेरे राम ने दशरथ के घर में जन्म नहीं लिया, न उसने लंका के राजा रावण को मारा। कबीर यह भी कहते है कि सभी ओर दशरथ के पुत्र का बखान होता है। ऐसे लोग राम नाम का सही अर्थ नहीं समझते है। कबीर के ही समकालीन संत रविदास ने भी कहा था, हमारा राम दशरथ का पुत्र नहीं है। हमारा राम तो विश्व में रमा हुआ है। जो राम को बूझ लेते है, वे जानते है कि राम घट-घट वासी है। जो राम से प्रेम करते है वे उसकी व्यापकता को समझ लेते है। हमारा संपूर्ण भक्ति आंदोलन निर्गुण और सगुण अवधारणाओं में बंटा हुआ है। निर्गुण संत राम के निर्वैयक्तिक स्वरूप को स्मरण करते है, जबकि सगुण कवि उन्हे दशरथ-कौशल्या के पुत्र, लक्ष्मण-भ्राता, सीता-पति, रावण के संहारक रूप में स्मरण करते हुए उन्हे विष्णु के अवतार के रूप में देखते है, किंतु सभी जपते राम नाम को ही है। राम नाम की यह व्यापकता यदि ओझल हो जाएगी तो राम की खंडित-छवि ही हमारे सामने आएगी और पुरातत्व विभाग वाले उसके ऐतिहासिक प्रमाण ढूंढने में लग जाएंगे। 

   रामसेतु को नल और नील ने राम के निर्देश में बनाया था, इसके ऐतिहासिक प्रमाण कहां है? यह प्रश्न बहुत असंगत है वैसे ही जैसे यह पूछा जाए कि कुंवारी मैरी से ईसा का जन्म कैसे हुआ? मानव-मन में सदियों से कुछ मिथक बसे होते है। उनका अपना महत्व होता है। इन्हे वैज्ञानिकता के नाम से तोड़ने का प्रयास करना पूरे जातीय मानस को झकझोरना है। महर्षि वाल्मीकि ने अपनी रामायण में अपने समय में प्रचलित गाथा-गीत को काव्य का रूप दिया। वाल्मीकि रामायण दीर्घकाल तक मौखिक ग्रंथ के रूप रही और प्रक्षिप्त अंश उसमें जुड़ते रहे। यह भी निश्चित है कि राम शब्द दशरथ-सुत राम से कहीं अधिक प्राचीन होगा। इसका कोषीय अर्थ सुहावना, आनंदप्रद, हर्षदायक, सुंदर, प्रिय और मनोहर जैसा है। भारत की लगभग सभी भाषाओं और प्रदेशों में राम कथाएं लिखी गई है। लोकमानस में इसकी प्रसिद्धि के कारण बौद्धों और जैनियों ने भी इसे अपने-अपने ढंग से अपनाया। गुरु ग्रंथ साहब में असंख्य बार राम शब्द को दोहराया गया है। इस ग्रंथ में आराध्य के लिए बहुत से नामों का प्रयोग हुआ है, किंतु गुरुवाणी का सबसे प्रिय शब्द राम है। यह नाम भी निर्गुण संतों की अवधारणा के अनुरूप है। वह निर्गुण है, निराकार है, सर्वव्यापी, सर्वपालक है और घट-घट में समाया हुआ है। पांचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव ने अपनी रचना 'सुखमनी' में कहा है- उस पंडित के उपदेश से ही संसार को जीवन की दिशा मिलती है जो राम नाम के सार रस को पीता है। 

   गुरुवाणी में प्रयुक्त राम शब्द दशरथ-पुत्र नहीं है जहां कही भी दशरथ-पुत्र राम का उल्लेख हुआ है वह जीवन मृत्यु के चक्र में फंसा हुआ सांसारिक जीव है- राम गयो रावण गयो जाको बहु परिवार। गुरु गोविंद सिंह ने उस राम को भी याद किया जिसने सत्ता के मद में डूबे अहंकारी रावण का वध किया था। गुरु गोविंद सिंह ने दोहरा दायित्व संभाला था। वे नानक मार्गो परंपरा के दसवें उत्ताराधिकारी और साथ ही निर्जीव पड़ी जनता में नवजीवन का संचार करने वाले राष्ट्र पुरुष भी थे। लोगों में वीर भाव का संचार करने के लिए उन्होंने प्राचीन अवतार कथाओं का पूरा उपयोग किया था। इसी संदर्भ में दशम ग्रंथ में उनकी राम कथा से संबंधित एक रचना है- रामावतार। इस अवतार कथा की रचना के पीछे उनका स्पष्ट मंतव्य था। रामावतार में कुल 864 छंद हैं। इनमें से 400 से अधिक छंदों में केवल युद्ध-वर्णन है। रामकथा के करुण, भक्तिपरक श्रृंगार तथा अन्य किसी रस पर कवि की दृष्टि अधिक नहीं थमती। लोगों में वीरभाव उत्पन्न करने के लिए वे बड़े मनोयोग से युद्धों का चित्रण करते है। इस प्रसंग में वे दशरथ-सुत राम का स्मरण करते हुए कहते है: 

   राम परम पवित्र है रघुबंस के अवतार।
   दुष्ट दैतन के संघारक संत प्रान अधार॥
 

   गुरु गोविंद सिंह राम के ऐसे स्वरूप को लोगों के सम्मुख रखना चाहते थे जो योद्धा थे, जो दुष्टों और आतताइयों को नष्ट करने के प्रति प्रतिबद्ध थे। वे राम के अलौकिक रूप से इतने प्रभावित नहीं थे जितने उनके उस रूप से जो हाथ में धनुष-बाण लेकर शत्रुओं का विनाश करता है। इस देश की लंबी सांस्कृतिक परंपरा में राम-नाम और राम-कथा का विकास होने में शताब्दियां लगीं। उसे जनमानस ने इस प्रकार स्वीकार कर लिया कि उसके संपूर्ण व्यक्तित्व में इसकी पहचान स्थापित हो गई। कोई भी कार्य आरंभ करने से पहले किसी के भी मुख से सहज निकल पड़ता है, 'राम का नाम लो और शुभारंभ करो।' 'राम-राम' या 'जै रामजी की' संभवत: सबसे प्राचीन और लोकप्रिय अभिवादन है। इस देश में राम शब्द व्यक्ति न रह कर एक विचार के रूप में परिणत हो गया है। इस विचार को ग्रहण करने और इसे अपने जीवन का आलंबन बनाने में इसका निर्गुण होना अथवा सगुण होना, परब्रह्म होना या घट-घट वासी होना अथवा अयोध्या का राजा होना या दशरथ का पुत्र होना किसी प्रकार बाधक नहीं है। दोनों विचारों में कही कोई द्वंद्व नहीं है, विरोध नहीं है। इस पर सिर फुटौव्वल नहीं है कि मेरा राम ही सही अर्थो में राम है। इस देश का प्रत्येक बड़ा कवि, वह किसी भी भाषा का हो, राम की कथा अवश्य लिखता है। आज की स्थिति तो यह है कि जिन लेखकों ने रामकथा को लेकर गद्य-रचनाएं की है वे इस कथा की व्यापक स्वीकृति के कारण, बड़े सफल और लोकप्रिय लेखक बन गए है। कविवर मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में-
राम तुम्हारा वृत्ता स्वयं ही काव्य है। कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है॥