झूठ की सनसनीखेज कहानी

 टेलीविजन मीडिया के अति सक्रियतावाद को अनावश्यक बता रहे हैं बलबीर पुंज 
पिछले हफ्ते एक टीवी चैनल पर दिखाया गया स्टिंग आपरेशन जांच के बाद झूठा पाया गया। मीडिया में आ रही खबरों का स्वत: संज्ञान लेते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार और पुलिस से जवाब-तलब किया है। 30 अगस्त को एक निजी समाचार चैनल ने एक शिक्षिका के स्कूली छात्राओं से देह व्यापार कराने के धंधे में लिप्त होने का खुलासा कर मानवीय संवेदनाओं को झकझोर दिया था। खबर प्रसारित होने के बाद दिल्ली के दरियागंज इलाके में हिंसा भड़क हुई। यह समाचार प्रसारित होने से गुस्साए लोगों ने जमकर पथराव और आगजनी की। गुस्साई भीड़ ने शिक्षिका के साथ हाथापाई भी की और उनके कपड़े तक फाड़ डाले थे। इस सनसनीखेज खुलासे का असर इतना था कि दिल्ली सरकार ने फौरन कार्रवाई करते हुए शिक्षिका को बर्खास्त कर दिया। छात्राओं के देह-व्यापार का खुलासा करने वाले समाचार चैनल का झूठ अब जांच के बाद सामने आ चुका है। चैनल की गैर-जिम्मेदारी के कारण सरकारी व निजी संपत्ति लोगों के आक्रोश का निशाना बनी।

   यद्यपि स्टिंग आपरेशन करने वाले पत्रकार और उसके सनसनीखेज आपरेशन में सहायक बनने वाली महिला पत्रकार को गिरफ्तार कर लिया गया है, लेकिन सवाल है कि इस फर्जी आपरेशन के कारण आरोपी शिक्षिका को मानसिक संत्रास के जिस दौर से गुजरना पड़ा और भीड़ की तोड़फोड़ से जो क्षति हुई उस सबकी भरपाई कौन करेगा? चैनल ने सारी गलती का ठीकरा गिरफ्तार पत्रकार के सिर फोड़ दिया है। क्या इतने मात्र से चैनल की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है? वस्तुत: 'तहलका' के बाद से ही टीवी चैनलों में 'स्टिंग आपरेशनों की बाढ़ सी आई हुई है। इनमें से अधिकांश का उद्देश्य सामाजिक-राजनीतिक शुचिता लाना नहीं है। यह विशुद्ध रूप से समाचार चैनलों के बीच छिड़ी प्रतियोगिता की देन है। अपनी टीआरपी बढ़ाने और उसके माध्यम से ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन पाने की होड़ में टीवी मीडिया 'अति सक्रियतावाद' का शिकार बन गया है। इस खुलासे में भी जो कुछ सामने आ रहा है वह शक्तिशाली मीडिया के दुरुपयोग को ही रेखांकित करता है। एक व्यक्ति शिक्षिका द्वारा गबन कर लिए गए अपने धन की उगाही के लिए मीडिया का दुरुपयोग करता है। मीडिया एक लड़की को नौकरी देने का झांसा देकर उसे साजिश में शामिल कर लेता है। भाड़े की लड़की कैमरे के सामने बयान देती है और देखते ही देखते लोग सड़कों पर उतर आते है।
  
  
   आखिर झूठे तथ्यों पर सनसनीखेज कहानी बनाकर मीडिया समाज का क्या भला करना चाहता है? हाल में प्रिंट और टीवी मीडिया में सरौता बाबा का खूब प्रचार हुआ था। कथित तौर पर दैवीय शक्ति से संपन्न यह बाबा सरौते से लोगों की आंख का इलाज करता है। टीवी चैनलों में समाचार आने के बाद जबलपुर शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर भर्रा गांव में इस बाबा के यहां भारी भीड़ जुटने लगी है। विगत गुरुवार को भी हजारों लोगों की भीड़ लगी थी। अचानक बारिश आने से भगदड़ मची और 11 लोग कुचलकर मारे गए। कुछ समय पूर्व पंजाब में एक व्यापारी ने सरेआम आग लगाकर आत्महत्या कर ली थी। समाचार चैनल के लोग घटना को कैमरे में कैद कर दर्शकों को परोस रहे थे। वह व्यक्ति खुद पर पेट्रोल छिड़कता है, जेब से माचिस निकालता है और पत्रकारों के ध्यानाकर्षण से उत्साहित होकर देखते ही देखते आग लगा लेता है। टीवी चैनलों के कैमरामैन इस घटना को अ्छी तरह से कवर करने में कोई कोर कसर नहीं उठा रखते। घटनास्थल पर मौजूद पत्रकार क्या संवेदनहीन हो गए थे? 2001 के तहलका के खुलासे के बाद से ही छल-प्रपंच से रोजाना ऐसी खबरे टीवी चैनलों पर दिखाने की परिपाटी शुरू हो गई है। कहीं शराब और शबाब के नशे में बहके व्यक्ति के मुंह से राज उगलवाए जा रहे है तो कहीं धन देकर इमामों से मनोवांछित फतवे जारी कराए जा रहे है। मानवीय कमजोरियों का जाल बुनकर किसी को उसका शिकार बनाना मीडिया की कार्यशैली का अंग बन गया है।
  
  
   हाल ही में एक न्यूज चैनल ने अवैध गर्भपात करने वाले डाक्टरों का खुलासा किया था, किंतु उसके लिए रास्ता कौन-सा चुना? पहले भाड़े पर एक गर्भवती महिला का जुगाड़ किया गया और चैनल की टीम चार राज्यों के छत्तीस शहरों की खाक छानती रही। धन के लालच में गर्भपात के लिए राजी डाक्टरों को कैमरों में कैद किया गया। इस बात में दो राय नहीं कि भ्रूण हत्या निंदनीय है, किंतु हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि अपराध करने की पृष्ठभूमि किसने बनाई और झोलाछाप डाक्टरों को किसने उकसाया? मीडिया को ऐसे खुलासे करने से पूर्व यह ध्यान रखना चाहिए कि इससे मानवीय संवेदनाएं भड़कती है। हाल में राजस्थान में आरक्षण के लिए गुर्जरों का हिंसक आंदोलन हुआ था।
  
  
   सड़कों पर की जा रही हिंसा का टीवी पर जिस विस्तार से बार-बार प्रसारण हुआ उसके कारण आंदोलन उग्र स्वरूप लेता गया और यह दूसरे राज्यों में भी फैल गया। इसी तरह सांप्रदायिक दंगों के वीभत्स चित्रों के प्रसारण से भी न केवल संबंधित शहर, बल्कि आसपास के शहरों में भी सांप्रदायिक आग भड़क उठती है। स्टिंग आपरेशन की एक सीमा तय होनी चाहिए और ऐसे अभियानों का एक सामाजिक-राजनीतिक उद्देश्य भी निर्धारित होना चाहिए। पहले से ही कमरे में कैमरा फिट कर किसी व्यक्ति को बुलाना और बाद में शराब के नशे में आ चुके उस व्यक्ति को शबाब के आगोश में दिखाकर मीडिया क्या साबित करना चाहता है? इस बात में दो राय नहीं कि हमारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी धंस चुकी है। सरकारी बाबुओं में घूसखोरी की प्रथा आम है। इसकी रोकथाम के लिए जागरूकता और पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है।
  
  
   मीडिया प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ है, किंतु कुछ चैनल घूसखोरी को उजागर करने के लिए शर्ट या बैग में कैमरा छिपाए सरकारी दफ्तरों में स्वयं काम के बदले धन का लालच देते है। यह कैसी पत्रकारिता है? कभी-कभी तो टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में कुछ टीवी चैनल व्यक्ति की निजता का भी अतिक्रमण कर जाते है। बहुत सारे ऐसे देश है, जहां प्रसारण के कड़े प्रावधान है। हमारे यहां भी स्टिंग आपरेशन की अति सक्रियता के कारण ऐसे कानून बनाने पर विचार चल रहा है, किंतु मीडिया के विरोध के कारण कुछ अवरोध सामने है। मेरे विचार से अब समय आ गया है कि प्रस्तावित कंटेट कोड पर चैनल वालों को आम राय बनानी चाहिए। आपसी सहमति बनने के बाद उस कोड को स्वत: लागू करवाने की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए।
  
  
   प्रजातंत्र में प्रेस के ऊपर महती जिम्मेदारी होती है। प्रेस की आजादी का अर्थ निष्पक्षता और निर्भयता में है। जनहित में किए गए स्टिंग आपरेशन की सार्थकता समझी जा सकती है, किंतु सच यह है कि अधिकांश स्टिंग आपरेशन निजी प्रतिशोध का माध्यम बन गए है। ऐसे अभियानों से मीडिया की मर्यादा भंग होती है। मीडिया की शक्ति उसकी प्रामाणिकता में है। प्रामाणिकता रहित मीडिया दंतहीन शेर की तरह होगा जो समाज में उपस्थित तो है, किंतु कोई सार्थक भूमिका निभाने में अक्षम है। मीडिया का स्वत: स्फूर्त प्रयास ही स्टिंग आपरेशन को 'स्टिंक आपरेशन' में बदलने से रोक सकता है।