प्रामाणिकता का निरर्थक प्रश्न

राम और रामायण की तरह रामसेतु को भी प्रमाणों से परे मान रहे है बलबीर पुंज 
 
तीव्र जनाक्रोश को देखते हुए केंद्रीय सरकार ने राम और रामायण के अस्तित्व को मान लिया। यदि राम और रामायण सत्यपरक है तो रामायण में वर्णित रामसेतु काल्पनिक कैसे हो सकता है? हजारों साल से आस्था के केंद्र-बिंदु रहे विषयों को क्या प्रमाण की आवश्यकता है? कश्मीर के हजरतबल दरगाह में रखे पैगंबर साहब के बाल की प्रामाणिकता पूछने की हिमाकत क्या कोई करेगा? ईसा मसीह को सलीब पर लटकाया गया था। उसी प्रतीक सलीब को ईसाई अनुयायी गले से लगाए रखते है। क्या कोई उस पर प्रश्न खड़ा कर सकता है? या ईसा एक कुंआरी कन्या-मदर मेरी के गर्भ से जन्मे थे, क्या इस मान्यता की कोई वैज्ञानिक व्याख्या हो सकती है? केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व विभाग ने यह विवादित हलफनामा संयुक्त रूप से सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया था, जिसमें रामायण में वर्णित पात्रों और घटनाओं को काल्पनिक बताया गया था।
 
   हलफनामे के पैरा सात में लिखा है, ''..एडम ब्रिज को आज तक 'सुरक्षित क्षेत्र' या 'सुरक्षित स्मारक' घोषित नहीं किया गया है। भारतीय पुरातत्व विभाग या भारत सरकार के सामने प्रथमदृष्ट्या ऐसा कोई अवसर नहीं आया जिसमें कथित सेतु को 'प्रचीन स्मारक' समझ कर नियमानुसार उसके संरक्षण की बात उठे और इसीलिए भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा इस संदर्भ में कोई अध्ययन नहीं किया गया है।'' 

   
   हलफनामे के पैरा 32 में लिखा है, ''..वैज्ञानिक अध्ययन के प्रकाश में कथित संरचना को मानव निर्मित नहीं कहा जा सकता। वह संरचना केवल बालू और कोरल से संगठित है, जिसे ऐतिहासिक/पुरातात्विक अथवा महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता।..'' जब पैरा सात में सरकार ने स्वयं स्वीकार किया है कि सेतु का कोई वैज्ञानिक अध्ययन ही नहीं किया गया तो फिर सेतु के काल्पनिक होने का दावा कैसे कर दिया गया? हलफनामे के पैरा 29 में कहा गया है, ''नासा ने अपने चित्रों के संदर्भ में किसी अन्य के द्वारा कोई निहितार्थ निकालने की स्थिति में जिम्मेदारी लेने से इनकार किया है।'' यह सही है, किंतु यह भी सही है कि नासा ने उसके रामसेतु होने या न होने पर भी कोई सवाल खड़ा नहीं किया है। करोड़ों हिंदुओं की आस्था है कि वह रामसेतु है। 

   
   केंद्र सरकार या पुरातत्व विभाग क्या इस प्रश्न का जवाब देंगे कि रामायण में वर्णित उसी स्थान विशेष पर ही सेतु क्यों है? वह लंका को ही क्यों जोड़ता है? क्या अयोध्या में विवादित ढांचे के नीचे महल या मंदिर होने के वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं मिल रहे? क्या लुप्त द्वारकापुरी के समुद्र में मग्न होने के प्रमाण नहीं मिल रहे? क्या रेगिस्तान में विलुप्त सरस्वती नदी के प्रवाह मार्गो की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हो रही? इन सब मामलों में सरकार या पुरातत्व विभाग क्या कर रहा है? रामसेतु ध्वंस के प्रयास के पीछे जहाजरानी मंत्री टीआर बालू का बड़ा हाथ है। बालू द्रमुक पार्टी के नेता है। 

   
   अनिश्वरवादी द्रविड़ आंदोलन के संस्थापक रामास्वामी नायकर ने कहा था, ''ईश्वर में विश्वास करने वाले मूर्ख है।'' द्रविड़ आंदोलन के दौरान हिंदू देवी-देवताओं को सार्वजनिक रूप से चप्पलों से पीटा जाता था। मूर्तियां तोड़ी जाती थीं। आश्चर्य नहीं कि टीआर बालू बाबर के प्यादे मीर कासिम का अधूरा काम पूरा करना चाहते है। यह दुष्प्रचार करना कि सेतुसमुद्रम परियोजना राजग के काल में प्रारंभ हुई थी, गलत है। इस परियोजना पर राजग के समय में विचार हो रहा था, किंतु परियोजना की संपूर्ण सर्वेक्षण रपट आने से पूर्व ही राजग सरकार चली गई। 

   
   भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग के पूर्व निदेशक बद्रीनारायण का मानना है कि सेतु प्राकृतिक संरचना नहीं है। बद्रीनारायण के अनुसार राष्ट्रीय समुद्र तकनीकी संस्थान के सहयोग से रामेश्वरम और अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में पंक्तिपद्ध दस जगह खुदाई की गई थी। इन सभी जगह ऊपरी 6 मीटर के हिस्से में समुद्री रेत, फिर कोरल्स, सैंड स्टोन और निर्माण में प्रयुक्त बड़े पत्थर मिले। इसके बाद के पांच-पांच मीटर में बिखरी बालू और फिर ठोस संरचना दिखाई दी। बालू के ऊपर मिले पत्थर इस प्रकार के थे जो नदियों या मैदानों में मिलते है। बद्रीनारायण के अनुसार वे पत्थर समुद्र निर्मित नहीं है। उन्हे यहां किसी प्रयोजन से डाला गया होगा। वाल्मीकि रामायण में लिखा है, 'पर्वतांश्च समुद्रत्पाट्य यंत्रै: परिवहंति च।' अर्थात बड़े-बड़े पर्वतों-पत्थरों को यंत्रों के द्वारा समुद्रतट पर लाया गया। 

   
   वैज्ञानिक शोध पत्रों के अनुसार यहां जो कोरल बने वे 7300 ई. से 5400 ई. के बीच बने। बाहर के पत्थर 5400 ई. से 4000 ई. के आसपास के बताए गए है। सन 1803 में प्रकाशित 'ग्लोसरी आफ मद्रास प्रेसीडेसी' के अनुसार यह सेतु सन् 1480 तक भारतीय प्रायद्वीप को श्रीलंका से जोड़ता था। इस सेतु से लोग आते-जाते थे, किंतु 1480 में आए भयानक तूफान की वजह से संपर्क टूट गया। यह सेतु 30 मील लंबा और सवा मील चौड़ा है। इस सेतु के ऊपर 3 से 30 फीट तक जलस्तर है। इतने छिछले जल में भारी जहाज कैसे जाएंगे? जहां रामसेतु का अस्तित्व पर्यावरण और हमारे दक्षिणी तटों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है वहीं वह भारत की ऐतिहासिक आध्यात्मिक पहचान का भी प्रतीक है। 

   
   यूनेस्को के 1972 के घोषणापत्र में कहा गया है कि जो मानवनिर्मित नहीं है, प्राकृतिक है और उससे लोगों की आस्था जुड़ी है तो वह धरोहर घोषित किया जा सकता है। पुरातत्व स्थल अस्तित्व अधिनियम 1958 के अनुच्छेद 2 (जे) के अनुसार ऐसी कोई भी जगह या अवशेष, जिसमें ऐतिहासिक, पुरातात्विक महत्व समाविष्ट हो और जो सौ वर्षो से अधिक प्राचीन हो उसे राष्ट्रीय धरोहर मानना चाहिए। वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि की है कि 2004 में आए सुनामी से तूतीकोरिन और दक्षिणी केरल के तटों की सुरक्षा इसी सेतु के कारण हो पाई थी। रामेश्वरम और धनुषकोडि क्षेत्र में थोरियम का विश्व का सबसे बड़ा भंडार है। हाल में अमेरिका के साथ परमाणु संधि कर भारत की संप्रभुता को गिरवी रखने वाली सरकार अमेरिकी दबाव में थोरियम के इस भंडार को भी नष्ट करना चाहती है। हैरत है कि जब समुद्री मार्ग के लिए अन्य सस्ते वैकल्पिक मार्ग भी हो सकते है तो भारत को इतनी कीमतें चुकाने की क्या आवश्यकता है? 

   
   वर्ष 2010 में कामनवेल्थ गेम्स के लिए नई दिल्ली के सुंदर नगर और लोदी रोड इलाके से होते हुए खेलगांव तक सुरंग मार्ग बनाने की योजना केवल इसलिए खटाई में पड़ गई, क्योंकि उससे कथित तौर पर हुमायुं के मकबरे को क्षति पहुंचती। हकीकत यह है कि मकबरा योजना मार्ग से दूर था और पुरातत्व विभाग ने भी योजना को हरी झंडी दे दी थी, किंतु दिल्ली सरकार ने वोट बैंक के लिए एक मकबरे के कारण इस महत्वपूर्ण योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया। यहां हिंदुओं की आस्था और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक रामसेतु को तोड़ने के लिए कुतर्को का सहारा लिया जा रहा है। क्यों? 

   
   (लेखक भाजपा के राष्ट्रीय सचिव है)