ब्रिटिश बर्बरता का जश्न

1857 की 150वीं जयंती पर अंग्रेजों के आयोजन को शहीदों का अपमान बता रहे हैं बलबीर पुंज 
 
रामसेतु ध्वस्त करने के प्रयासों के दु:खद प्रकरण के बाद अब फिरंगियों का मेरठ और दिल्ली में 1857 की जीत का जश्न मनाना इस बात का खुलासा करता है कि हमारी संस्कृति और विरासत के प्रति वर्तमान सत्ता अधिष्ठान कितना सम्मान भाव रखता है। देश इन दिनों प्रथम स्वातं˜य समर, 1857 की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ मना रहा है। आगामी 27 सितंबर को शहीद भगत सिंह की सौवीं जन्मतिथि है। 1857 की क्रांति का बिगुल फूंकने वाले मंगल पांडे, नाना साहब, अजीमुल्ला खां, तात्या टोपे, लक्ष्मी बाई, कुंवर सिंह..आदि और बहरे ब्रितानियों को धमाकों से जगाने वाले भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, बाघा जतीन और उनके जैसे सैकड़ों वीर बलिदानियों को हमारी यह कैसी श्रद्धांजलि है? अपना सर्वस्व त्याग कर जिन्होंने हमें आजादी दिलाई उन क्रांतिवीरों ने क्या कभी सोचा होगा कि उनके रक्त-मांस की कीमत पर मिली आजादी को आने वाली पीढ़ी इतने हल्के में लेगी?

   यह घोर आश्चर्य की बात है कि सात समंदर पार से फिरंगियों का एक दल अपने पूर्वजों के शौर्य का शिलालेख लेकर मेरठ और दिल्ली पहुंचता है और हमारे खुफिया विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगती? यही नहींइस आश्य के समाचार प्रकाशित होने के चौबीस घंटे बाद तक केंद्रीय गृह राज्यमंत्री को आधिकारिक सूचना की प्रतीक्षा थी? इस प्रकरण पर सरकार खामोश क्यों है? वस्तुत: इन फिरंगियों के साथ उदारता बरतना उसी मानसिकता की उपज है जिसने इस कालजयी राष्ट्र के गौरवमयी इतिहास के प्रति द्रोहभाव पैदा कर रखा है।
  
  
   क्या यह संभव है कि एक हिंदू बहुल देश में सरकार सबसे बड़ी अदालत में यह शपथनामा दे कि राम है ही नहीं और रामायण कपोल कल्पना है? जिस आराध्य को इस देश की करोड़ों जनता प्रात: वंदनीय मानती हो, जिसके जीवन के संदेश पीढ़ी-दर पीढ़ी करोड़ों मानस पटल पर जीवंत हों उसका कभी अस्तित्व ही नहीं रहा? ब्रिटिश संसद में 2 फरवरी, 1835 को दिए अपने भाषण में लार्ड मैकाले ने कहा था, ''इस देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत, जो इस राष्ट्र की रीढ़ है, जब तक उसे हम नहीं तोड़ डालेंगे तब तक मुझे नहीं लगता कि हम कभी इस देश को जीत पाएंगे। इसलिए मैं प्रस्ताव रखता हूं कि इस देश की प्राचीन शिक्षा पद्धति और उसकी संस्कृति को बदल डालें।.. एक बार ऐसा हो गया तो पूरे देश में हमारा वर्चस्व होगा।''
  
   अंतत: ऐसा ही हुआ भी, यह झूठ परोसा गया कि आर्य बाहर से आए थे। द्रविड़ यहां के असली निवासी थे। आश्चर्य नहीं कि आज द्रविड़ मुनेत्र कषगम पार्टी के नेता श्रीराम के खिलाफ ज्यादा मुखर है। अंग्रेज इतिहासकारों ने इस देश की संस्कृति पर जितना कुठाराघात किया, मा‌र्क्सवादी इतिहासकारों ने इस देश के गौरवमय इतिहास को उतना ही कलंकित किया। ऐसे इतिहासकार यह बताते है, "आर्यो ने अपने राजाओं तथा वीरों की बहादुरी तथा युद्धों का वर्णन कविताओं के रूप में किया है, जो बाद में रामायण तथा महाभारत ग्रंथों के रूप में प्रसिद्ध हुए।"
  
  
   इन्हीं इतिहासकारों ने लिखा कि आर्य गोमांस खाते थे। यदि आर्य गोमांस खाते थे तो गाय की चर्बी लगे कारतूस ने 1857 में आर्यो के कथित प्रतिनिधि एक पुरबिया ब्राह्मण की आत्मा को क्यों झकझोर दिया? उस ब्राह्मण की दुंदुभि से ब्रितानी साम्राज्य की चूलें क्यों हिल गई? आज फिर कुछ फिरंगी आकर हमारी ही जमीन पर खड़े दो चर्चों के पादरियों को अपने पूर्वजों के शौर्य का शिलालेख थमा जाते है और चर्च प्रशासन को खबर करने की जरूरत तक नहीं समझता। ऐसा नहीं कि यह सारा काम आनन-फानन में हुआ और चर्च किंकर्तव्यविमूढ़ था। सच यह है कि चर्च को ई-मेल से पूरी जानकारी दी गई थी।
  
  
   मेरठ के सेंट जोंस चर्च के पादरी को विगत 28 अगस्त को ही फिरंगियों की टोली ने ई-मेल के माध्यम से सूचित किया था कि वे चर्च देखने आ रहे है। साथ में शिलालेख का मजमून भी भेजा गया था। मेरठ और दिल्ली में 10 मई से 20 सितंबर, 1857 के बीच किंग्स रायल राइफल का‌र्प्स के जवानों के शौर्य का बखान करने वाले इस शिलालेख को चर्च ने राष्ट्रविरोधी समझ प्रशासन को खबर करने की आवश्यकता क्यों नहीं समझी? इसी तरह दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित चर्च सेंट जेम्स को भी सूचित किया गया था। चर्च ने उनके स्वागत के लिए विशेष तौर पर एक विदेशी पादरी फादर वाथराल को इस अवसर के लिए निमंत्रित किया था। 1857 की क्रांति की पचासवीं वर्षगांठ पर ब्रिटेन में छह मई को फिरंगियों ने विजय दिवस मनाया तो भारतीय देशभक्तों ने उनकी ही जमीन पर 10 मई को मेरठ सैन्य विद्रोह धूमधाम से मनाकर भारतीय राष्ट्रवाद की उग्रता की झलक दिखला दी थी।
  
  
   10 मई, 1908 को क्रांति की वर्षगांठ पर वीर सावरकर ने 'ऐ शहीदो' शीर्षक से चार पृष्ठ लंबा पर्चा वितरित किया था। इस पर्चे में वीर सावरकर ने क्रांति के अंजाम तक पहुंचने का उद्घोष करते हुए इसे 'सुनियोजित स्वातंय समर' बताया था, किंतु भारत के गर्व-बिंदुओं के प्रति द्रोहभाव रखने वाले इतिहासकार इसे 'सिपाही विद्रोह' मात्र मानते है। क्रीमिया के युद्ध के साथ पर्सिया, चीन आदि स्थानों में अंग्रेजी सेना की पराजय के कारण भारतीय सेना के समक्ष अंग्रेजों की कथित बहादुरी का खुलासा हो चुका था। भारतीय सेना के बीच यह भावना जागृत हो गई थी कि वे संख्या में अधिक है और ब्रितानी हुकूमत उनके ही सहयोग पर आधारित है। यदि वे विद्रोह को संगठित रूप से संचालित कर लें तो ब्रितानी राज खत्म किया जा सकता है। विद्रोह पहले से ही धधक रहा था, चर्बी वाली घटना ने आग में घी डालने का काम किया।
  
  
   वस्तुत: 1857 का विद्रोह पूर्व नियोजित था। असंतुष्ट राजा-प्रजा और सैनिकों की ओर से बगावत की कमान नाना साहब ने अपने हाथ में ली थी और उन्होंने भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक अपने दूतों को भेजकर उपयुक्त पृष्ठभूमि तैयार कर ली थी। 31 मई को बहादुर शाह जफर के राज्यारोहण का समय तैयार कर लिया गया था, किंतु 29 मार्च को बैरकरपुर और 10 मई को मेरठ में चर्बी वाले कारतूस के कारण आक्रोश तय योजना से पहले फूट पड़ा, अन्यथा आज इतिहास कुछ और ही होता।
  
  
   दिल्ली की जीत पर फिरंगियों ने जिस बर्बरता का परिचय दिया था वह इतिहास में बिरला ही होगा। लार्ड एलफिंस्टन ने तब जान लारेस को लिखा था, "अपनी सेना ने दिल्ली का जो हाल किया वह हृदयद्रावक है।.. हमने तो नादिर शाह को भी मात दे दी।" फिरंगियों का यह दल यदि अपने पूर्वजों द्वारा किए गए जुल्मों पर माफी मांगने आता तो कोई आपत्ति नहीं थी, किंतु डेढ़ सौ साल बाद भी अपनी श्रेष्ठता का अहंकार दिखाने पहुंचे इन फिरंगियों को निश्चित तौर पर इस देश के कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए थी, किंतु क्या भारतीय संस्कृति से विरक्ति रखने वाले सेकुलरिस्टों में वह जज्बा है?