जल्द टले खतरा - रूपकुंड

रहस्य और रोमांच का पर्याय माने जाने वाले रूपकुंड के सदियों पुराने मानव और अश्व कंकालों का चोरी होना चिंताजनक है। अब तक प्राचीन मूर्तियों व धरोहरों को निशाना बना रहे चोरों की नजर इन कंकालों पर भी पड़ चुकी है। चमोली जिला प्रशासन की उक्त सूचना के बाद शासन को त्वरित कदम उठाना चाहिए। जिला प्रशासन इस खतरे को भी रेखांकित कर चुका है कि चोरी का सिलसिला जारी रहा तो भविष्य में रूपकुंड कंकाल विहीन हो जाएगा।
 
दरअसल, रूपकुंड धार्मिक यात्रियों के लिए तो आकर्षण का केंद्र रहा ही है, साहसिक खेल व ट्रेकिंग के प्रेमियों को भी अपनी ओर खींचता रहा है। यही वजह है कि प्रदेश सरकार अपने प्रसिद्ध स्थलों में रूपकुंड का भी उल्लेख करती है। इस बेहद खूबसूरत प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण स्थान का धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व के साथ नर व अश्व कंकालों की वजह से खासा पुरातात्विक महत्व भी है। एक आधुनिक परीक्षण में उक्त कंकालों को नवीं सदी का बताए जाने के बाद प्राचीन कालखंड के कई रहस्यों से पर्दा उठने व अनछुए पहलुओं के सामने आने की संभावना है।
 
 कंकाल चोरी होने के बाद अतीत को जानने की दिशा में महत्वपूर्ण इन कड़ियों के गुम होने का भी खतरा पैदा हो गया है। चिंताजनक यह भी है कि पुरातात्विक धरोहरों की चोरी में लिप्त तत्वों के हौसले बुलंद हैं। वहीं, शासन-प्रशासन व सुरक्षा तंत्र ऐसे मामलों को बेहद हल्के ढंग से लेने का आदी है। इन स्थलों का रुख करने वाले यात्रियों की वहां से हड्डियों को ले जाने के पीछे छिपी मंशा का पता लगाया जाना चाहिए। प्रदेश में पर्यटन और संस्कृति को बढ़ावा देने वाले विभागों को भी इस मामले में पर्याप्त सजग होने की जरूरत है। अन्यथा अपने रहस्यों के लिए जिज्ञासुओं का केंद्र बिंदु रहे हिमालय और उसके महत्वपूर्ण स्थलों को खासा नुकसान उठाना पड़ेगा। साथ ही पर्यटन व संस्कृति को बढ़ावा देने की सरकार की मंशा पर भी सवालिया निशान लगने से रोकना मुमकिन नहीं होगा। 

   [जागरण स्थानीय संपादकीय: उत्तराखंड]