सुस्ती की परियोजना

पूर्व-पश्चिम कारीडोर परियोजना की अवधि को दो वर्ष तक और आगे बढ़ाया जाना इस बात का परिचायक है कि बुनियादी ढांचे के निर्माण की हर संभव तरीके से अनदेखी की जा रही है।
 
सात राज्यों को लाभान्वित करने वाली साढ़े तीन हजार करोड़ की लागत की इस परियोजना को इस वर्ष दिसंबर तक पूरा करना था, लेकिन पता यह चल रहा है कि अभी आधा काम ही पूरा हो सका है और कुछ स्थानों पर तो कुल कार्य का दस फीसदी भी नहीं हो पाया है। इस परियोजना की गंभीर स्थिति का एक अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि 3443 किलोमीटर लंबे राजमार्ग में से केवल 765 किलोमीटर का काम ही पूरा हो सका है। यह स्थिति तो नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली कहावत को भी मात करने वाली है। यदि यही हालत रही तो दो साल बाद इस परियोजना की अवधि को पुन: आगे बढ़ाने की नौबत आ सकती है। ऐसा ही होने की आशंका इसलिए भी अधिक है, क्योंकि राज्यों के साथ-साथ केंद्र सरकार भी ढिलाई बरत रही है। कहीं इसका एक कारण इस परियोजना का श्रीगणेश राजग शासन के समय होना तो नहीं? सच्चाई जो भी हो, केंद्रीय सड़क परिवहन एंवं राजमार्ग मंत्रालय इस परियोजना की सुस्त रफ्तार के लिए राज्यों को दोषी ठहराकर अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर सकता। नि:संदेह संबंधित राज्य सरकारों ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाने में अपेक्षित दिलचस्पी नहीं दिखाई, लेकिन क्या कारण है कि केंद्रीय सत्ता इसकी निगरानी नहीं रख सकी? आखिर ऐसी परियोजनाओं की लगातार निगरानी क्यों नहीं की जा सकती? यदि नहीं की जा सकती तो फिर ऐसी परियोजनाओं को महत्वाकांक्षी और विकास की वाहक बताने का क्या औचित्य?
   प्रश्न यह भी है कि केंद्रीय सत्ता बुनियादी ढांचे के त्वरित निर्माण की महत्ता को समझने से क्यों इनकार कर रही है? यदि केंद्र सरकार अपनी कथित महत्वाकांक्षी परियोजना पर ढीला-ढाला रवैया अपनाएगी तो राज्य सरकारे तो शिथिलता बरतने के मामले में दो कदम आगे ही नजर आएंगी। यह विचित्र है कि बुनियादी ढांचे के विकास की रट तो खूब लगाई जाती है, लेकिन ऐसा करने के लिए जो कुछ आवश्यक है उसे करने में लापरवाही का परिचय दिया जाता है। ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने 8-9 प्रतिशत की विकास दर को ही आर्थिक विकास का एकमात्र पैमाना मान लिया है। निश्चित रूप से यह विकास दर उल्लेखनीय है, लेकिन इससे देश की समस्त समस्याओं का समाधान तो बिल्कुल भी नहीं होने वाला। पूर्व-पश्चिम कारीडोर परियोजना सड़क निर्माण संबंधी ऐसी एकमात्र योजना नहीं है जो लेट-लतीफी का शिकार हो। ऐसी ही अन्य अनेक योजनाएं भी है जो समय पर पूरी होती नजर नहीं आतीं। यदि देश भर में बन रहे राजमार्गो और उनसे जुड़ने वाले संपर्क मार्गो की समीक्षा की जा सके तो सिर्फ और सिर्फ यही निष्कर्ष सामने आएगा कि उनके निर्माण के मामले में कामचलाऊ रवैया अपना लिया गया है। इसके लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत भी नहीं है। राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाके को ही यह जानने के लिए देखा जा सकता है कि सड़क निर्माण संबंधी योजनाओं की क्या स्थिति है?
  
   [जागरण मुख्य संपादकीय]