हिंदुत्व पर बेवजह बहस

सेकुलरिज्म के नाम पर हिंदुत्व को कट्टरता से जोड़ने को अनुचित ठहरा रहे है हृदयनारायण दीक्षित 
हिंदुत्व एक बार फिर गर्म बहस का मुद्दा है।  हिंदुत्व ही भारत की राष्ट्रीयता है और भारत हिंदुत्व के कारण ही पंथनिरपेक्ष और लोकतंत्री है। बहस जारी है। बयानबाजी, आरोपो-प्रत्यारोपो का दौर है। सेकुलरवादी दरअसल थोक वोट बैक के लोभ मे हिंदू और हिंदुत्व को राजनीतिक नारा बताते है। वे हिंदू/ हिंदुत्व को मजहब या रिलीजन की श्रेणी मे रखते हैं, लेकिन असलियत ऐसी नही है। विश्व के प्रत्येक हिंदू का अपना एक निज धर्म है, तरह-तरह की आस्थाएं है, तमाम तरह की प्रतीतियां और अनुभूतियां है। यहां आस्तिकता है तो नास्तिकता भी है, हजारो देवी-देवता है, अनेक विचार है, तर्क है, प्रतितर्क है।  हिंदुत्व का विचार भाजपा नही लाई।
 
   राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी हिंदुत्व का विचार नही लाया। हिंदू, सिंधु/इंडस अति प्राचीन संज्ञाए है। हिंदू भू-सांस्कृतिक संज्ञा है। हिंदू इसलाम या ईसाइयत की तरह संगठित पंथ/मजहब नही है। यह एक विशेष प्रकार की तर्कपूर्ण जीवनपद्धति है। इस देश की विनम्र राष्ट्रीय वैशिष्ट्याभिमानी चेतना का नाम हिंदू है। 

   
   गांधी संघ के स्वयंसेवक नही थे। गांधी ने जवाहरलाल नेहरू को यरवदा जेल से लिखे पत्र मे लिखा, ''मै धर्म नही छोड़ सकता, इसलिए हिंदुत्व छोड़ना असंभव है। हिंदुत्व के कारण ही मै ईसाइयत, इसलाम और अन्य धर्मो से प्रेम करता हूं। इसे मुझसे दूर कर दो तो मेरे पास कुछ भी नही बचेगा।'' गांधी ने सर विलियम विल्सन, विलियम हंटर और पिनकाट आदि विद्वानो के उद्धरण देकर प्राचीन हिंदू संस्कृति और दर्शन की श्रेष्ठता सिद्ध की। उन्होने पिनकाट के हवाले से लिखा, ''तमाम सामाजिक मामलो मे अंग्रेज हिंदुओ के गुरु बनने के प्रयत्न की अपेक्षा उनके चरणो के पास बैठने और शिष्य बनकर सीखने के ही योग्य है।''
 
   हिंदू संस्कृति सनातन है, वेद प्राचीनतम हैं, हिंदू दर्शन श्रेष्ठ है, गणित के अंक उन्होने खोजे, हिंदू विश्व की प्राचीनतम भाषा के उत्ताराधिकारी है। गांधी हिंदुत्व नही छोड़ सकते, क्योकि हिंदुत्व छोड़ देने पर उनके पास कुछ भी नही बचेगा, लेकिन उसी गांधी के उत्ताराधिकारी कांग्रेसजनो की दृष्टि मे हिंदुत्व सिर्फ सांप्रदायिकता है। 

   
   डॉ. लोहिया भारतीय समाजवादियो के महानायक थे। उन्होने 'सगुण निर्गुण धर्म पर एक दृष्टि' मे बताया कि ''झुक कर आत्मसमर्पण करने से अच्छा है कि हम खत्म हो जाएं। हम आत्मसमर्पण की क्षति को खत्म करना सीखे और यह तभी होगा जब हिंदू धर्म मे आप तेजस्विता लाएं।'' हिंदुत्व की तेजस्विता राष्ट्रीय स्वाभिमान की पर्यायवाची है। आज के समाजवादी लोहिया से बहुत दूर हैं। मुसलिम आक्रामकता और अलगाववाद आधुनिक समाजवादी सोच मे पंथ निरपेक्षता है और हिंदुत्व का आग्रह सांप्रदायिकता है। व्यक्ति की तरह राष्ट्र भी एक जीवंत सत्ता है। राष्ट्र का भी धर्म होता है। जैसे व्यक्ति की देह, मनस्, अंतस्, ओजस् और तेजस् मिलकर 'व्यक्तित्व' कहलाती है वैसे ही राष्ट्र की देह, अंतस्, मनस्, ओजस् और तेजस् मिलकर राष्ट्रीयत्व कहलाती है। 
   
   हिंदू केवल नाम रूप ही नही है, इसका एक सामूहिक मनस् है-विराट मानवीय संवेदनाओ से युक्त एक सामूहिक अंतस् है। विश्व अभ्युदय की कामना से युक्त एक विशिष्ट ओजस् है। भारत एक जन है, हिंदुत्व एक संस्कृति, इसलिए हम सब एक राष्ट्र हैं। हिंदुत्व ही भारत का राष्ट्रीयत्व है।