डूबती नाव पर मुशर्रफ

नवाज शरीफ के पुन: निर्वासन को मुशर्रफ की शातिर चाल बता रहे है राजीव शुक्ला 
अपनी पाकिस्तान यात्रा के कुछ समय पहले नवाज शरीफ एक दिन लंदन में मुझे एक भारतीय रेस्टोरेट में मिल गए। वहां वह अपने पूरे परिवार के साथ मशहूर भारतीय फिल्म कलाकार देवानंद के साथ भोज पर आए थे। लंबे अरसे बाद उनसे मुलाकात हो रही थी। उन्हे देखकर लगा कि उन्होंने अपना वजन भी काफी कम कर लिया है। बातों ही बातों में उन्होंने पाकिस्तान वापसी की चर्चा भी की। उनकी बातों से कहीं भी यह नहीं लगा कि उन्हे इस बात का जरा भी अनुमान है कि उन्हे वहां से सऊदी अरब पटक दिया जाएगा। वह तो अति विश्वास से भरे नजर आ रहे थे कि पाकिस्तान लौटकर वह फिर से अपनी पार्टी को जमा लेंगे तथा परवेज मुशर्रफ की सत्ता को उखाड़ फेंकेंगे। लंदन में उनके दोस्तों का भी कहना था कि बेनजीर भुट्टो का मुशर्रफ के साथ समझौता बहुत कुछ नहीं कर पाएगा और अंततोगत्वा नवाज शरीफ के हाथ में ही पाकिस्तान की बागडोर आएगी। शरीफ का अनुमान गलत था। मुशर्रफ उनकी ताकत पहचानते है, इसलिए उनके पांव वह पाकिस्तान में नहीं टिकने देंगे। दअरसल मुशर्रफ को नवाज शरीफ से ज्यादा बेनजीर भुट्टो पर भरोसा है। बेनजीर भुट्टो के साथ उनकी सौदेबाजी भी हो चुकी है। 

   मुशर्रफ चाहते है कि बेनजीर भुट्टो को प्रधानमंत्री बनवाकर सारी समस्याएं उनके हवाले कर दी जाएं और वह स्वयं राष्ट्रपति के रूप में पीछे से सारे अधिकार अपने हाथ में रखेंगे। वह किसी भी कीमत पर सेनाध्यक्ष का पद नहीं छोड़ सकते है। उनको पता है कि उनका राष्ट्रपति पद तभी तक है जब तक वह सेनाध्यक्ष है, क्योंकि सेनाध्यक्ष होने की वजह से ही उन्हे राष्ट्रपति पद प्राप्त हुआ है। वह भलीभांति जानते है कि यदि उन्होंने यह पद छोड़ा तो दूसरा सेनाध्यक्ष उनका तख्ता पलट देगा। मुझे याद है कि जनरल जिलाउल हक भी अंतिम समय तक सेनाध्यक्ष के घर में ही रहते थे। आज भी राष्ट्रपति भवन की इमारत इस्लामाबाद में एक महल की तरह दूर से नजर आती है। उसे बहुत खूबसूरत ढंग से बनाया गया है, लेकिन मुशर्रफ उसमें नहीं रहते है। वह रावलपिंडी में सेनाध्यक्ष के छोटे से घर में रहते है। दिन में रावलपिंडी से इस्लामाबाद आकर राष्ट्रपति भवन में काम करते है और शाम को वापस अपने घर चले जाते है। पाकिस्तान में राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री कोई भी हो, सेना तो अपने जनरल की ही बात सुनती है। मुशर्रफ को यह सब अच्छी तरह पता है। पाकिस्तान की व्यवस्था में सेना ही सर्वोपरि है। वहां पुलिस और प्रशासन के बड़े-बड़े अधिकारी भी सेना के अदने से मेजर से हमेशा घबराते है और उसी की बात सुनते है। 

   जब बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री थीं तो उन्होंने सेना का दखल काफी कम कर दिया था। नवाज शरीफ ने भी ऐसा ही किया था और धीरे-धीरे सेना के अफसरों की चलनी बंद हो गई थी। गलती नवाज शरीफ से यहीं हुई कि उन्होंने एक और जनरल की बात पर भरोसा करके सेनाध्यक्ष को ही बर्खास्त कर दिया। शरीफ ने यह कदम उठाकर अपनी मांद में सोए पड़े शेर को जगाने का ही काम किया। सेना ने इसे अपना अपमान माना। नवाज शरीफ ने हुक्म दिया कि जो जहाज कोलंबो से मुशर्रफ को लेकर कराची आ रहा है उसे उतरने न दिया जाए। इसका अर्थ सेना ने यह लगाया कि वह मुशर्रफ की हत्या करा देना चाहते है। शरीफ के इस कदम से नाराज सेना अचानक सक्रिय हो गई और रातोंरात शरीफ का तख्ता पलट दिया गया।
   यदि चुनाव के बाद बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री बनती है तो वह लंबे समय तक मुशर्रफ से बनाकर नहीं रख पाएंगी। उनका टकराव होना तय है। वह बहुत होशियारी से ताकत अपने हाथ में लेने की कोशिश करेगी। शुरुआत में भले ही बेनजीर भुट्टो और मुशर्रफ के बीच समझदारी नजर आए, लेकिन धीरे-धीरे वह मुशर्रफ की ताकत को कमजोर करती जाएंगी। आज मुशर्रफ बेनजीर भुट्टो का साथ लेने के लिए इसीलिए तैयार हो गए है, क्योंकि वह पहले के मुकाबले काफी कमजोर हो गए है। उन्होंने न्यायपालिका से लड़ाई ले ली और फिर उस लड़ाई को अच्छी तरह से नहीं लड़ सके। मुशर्रफ ने एक तरह से न्यायपालिका के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। अब वही सुप्रीम कोर्ट उनके ऊपर हावी हो रहा है। कल तक जो जनता उनकी वाहवाही करती थी, आज उनके खिलाफ हो रही है। उन्होंने यह समझा कि हम आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक तरफ अमेरिका का साथ देते रहेगे और दूसरी तरफ कट्टरपंथी मजहबी ताकतों और आतंकवादियों से भी रिश्ता रखकर काम चलाते रहेगे। इस क्रम में उन्होंने अलकायदा और तालिबान की तरफ से भी आंखें हटा लीं और उधर उनसे लड़ने के नाम पर अमेरिका से जमकर पैसा लिया। धीरे-धीरे पाकिस्तान के सीमाई इलाकों में अलकायदा और तालिबानों ने इतने मजबूत अड्डे बना लिए हैं कि अब चाहते हुए भी मुशर्रफ उन्हे नहीं हटा पा रहे है और यही लोग पाकिस्तान की सेना पर हमले बोल रहे है। लाल मस्जिद पर हमले के बाद यह मामला और गंभीर हो गया। जितने कट्टरपंथी और मजहबी लोग थे वे सब मुशर्रफ के खिलाफ हो गए। इन लोगों ने मुशर्रफ को खत्म करने की ठान ली है। इस्लाम के नाम पर जनता में इन लोगों का भी असर है। काजी हुसैन जैसे लोग जब चाहे तब जनता की भावनाओं को भड़का सकते है। इन हालात में जनभावना भी मुशर्रफ के खिलाफ तेजी से होने लगी है। अब अगला चुनाव उन्हे तीन-तिकड़म से ही जीतना होगा। वह लोकप्रियता के आधार पर नहीं जीत सकते है। उधर अमेरिका भी मुशर्रफ से काफी नाराज चल रहा है। रोज अमेरिकी खुफिया विभाग ऐसी सूचनाएं एकत्र कर रहा है कि किस तरह पाकिस्तान आतंकवादियों का सबसे सुरक्षित घर बनता जा रहा है। अमेरिका यह मानने लगा है कि बिना पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में हमला बोले ओसामा-बिन लादन और तालिबान को खत्म नहीं किया जा सकता है। यदि अमेरिका ने यह हमला कर दिया तो मुशर्रफ पाकिस्तान की जनता की निगाह में खलनायक बन जाएंगे और उन्हे हटना ही पड़ेगा। 

   चूंकि मुशर्रफ के वश में यह नहीं रह गया है कि वह आतंकवादी संगठनों को सीमावर्ती इलाकों से हटा सकें इसलिए वह टाल-मटोल कर रहे है और अमेरिका यह कह रहा है कि अगर आप नहीं हटा सकते है तो हमें हमला करने का मौका दीजिए। इन हालात में मुशर्रफ बुरी तरह फंस चुके है। वह किसी तरह से कोई ऐसा रास्ता खोज रहे है जिससे लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार आ जाए और वह सारी समस्या अपने सिर पर ले ले। मुशर्रफ चुपचाप राष्ट्रपति बनकर बैठे रहें तथा इस बात का सेहरा बांध लें कि उन्होंने लोकतंत्र की वापसी की है। उन्हे सबसे ज्यादा बेनजीर भुट्टो ही उपयुक्त लग रही है, क्योंकि वह पंजाबी नहीं है तथा उनसे समझौता संभव है। नवाज शरीफ और मुशर्रफ की दुश्मनी जगजाहिर है। मुशर्रफ को यह भी पता है कि यदि नवाज शरीफ पाकिस्तान में रहे तो बेनजीर और उनकी पार्टी का सत्ता में आना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए बेहतर यही है कि उन्हे फिर से देश में न आने दिया जाए और यही उन्होंने किया।