विधि-विधान: श्रीप्रकाश गुप्त

दीवानी के मुकदमों में प्रतिवादी समय से जवाबदावा दाखिल नहीं करते। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने बहुत कठोर शब्दों में न्यायालयों को उनके कर्तव्यों की याद दिलाई है। आरएन जाडी प्रति सुभाष चंद्र के मामले में निर्णय देते हुए न्यायालय ने लिखा कि यह प्रक्रिया न्याय के प्रशासन की सहायता के लिए है। न्यायिक प्रशासन में प्रक्रियात्मक विधि बाधा नहीं डाल सकती है। प्रक्रियात्मक विधि की भाषा कितनी भी कठोर क्यों न हो, उसका उद्देश्य न्याय को अग्रसारित करना है। यह सही है कि प्रतिवादी को प्रतिवादपत्र प्रस्तुत करने के लिए 30 दिन का समय निर्धारित है और इस अवधि में स्वत: वृद्धि नहीं होगी। इसका उद्देश्य प्रतिवादी को विलंब करने से रोकना है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि न्याय देने से इनकार कर दिया जाए। अपील की अधिकतम अवधि 90 दिन निर्धारित है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि 90 दिन के बाद न्यायालय असहाय है। विधि असंभव को संभव नहीं करा सकती। न्यायालयों को इस अपवाद का ध्यान रखना होगा। इस पर जोर दिया जाना चाहिए कि यथासंभव प्रतिवाद पत्र समय के अंदर प्रस्तुत हों। केवल अपवाद स्वरूप अवधि के पश्चात प्रतिवाद पत्र स्वीकार किया जाना चाहिए। आल इंडिया केसेस-12)
   नियमित नियुक्ति का आधार
  
   किसी कर्मचारी द्वारा 240 दिन कार्य कर लेना उसे नियमित करने का अधिकार प्रदान नहीं करता है। एचएएल प्रति धन बहादुर मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया। एचएएल मस्टर रोल ट्रेड यूनियन कांग्रेस, सुल्तानपुर ने यह रिट याचिका प्रस्तुत की कि उनके संगठन के सदस्यों को माली के पद का वेतन क्रम दिलाया जाए और उन्हें निरंतर सेवारत मानकर सभी लाभ दिलाए जाएं। याचिका में कहा गया कि 77 सदस्य दैनिक मजदूरी पर माली का कार्य पांच से सात सालों से कर रहे थे। दिखावे के लिए बीच-बीच में उनकी सेवाओं में अंतराल किया गया। कंपनी में काम भी था और पद भी रिक्त थे। एचएएल ने आपत्ति उठाई कि संगठन के सदस्य आकस्मिक कार्य करते थे। उन्होंने नियमित रूप से कभी भी कार्य नहीं किया। बागवानी कंपनी का मुख्य कार्य नहीं है। इस कारण आकस्मिक कार्य के लिए रखे गए कर्मचारी नियमित नहीं हो सकते। एकल पीठ ने याचिका स्वीकार कर ली और आदेश दिया कि उन व्यक्तियों को नियमित कर दिया जाए जिनके लिए कार्य उपलब्ध है और शेष के लिए निर्णय का अधिकार उप श्रमायुक्त को दिया जाए। खंडपीठ ने एचएएल की अपील अस्वीकृत कर दी। एचएएल ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष विशेष अपील प्रस्तुत की। उच्चतम न्यायालय ने यह सिद्धांत स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारियों की स्थिति उन कर्मचारियों से भिन्न है जो इस प्रकार के औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कार्यरत हैं। यह सही है कि यह सरकारी कंपनी है, लेकिन ऐसे मामलों में सरकारी कंपनी होने पर भी उन्हें सरकारी कर्मचारी के रूप में नहीं माना जाएगा। दैनिक मजदूरी पर रखे गए कर्मचारियों को यदि पद उपलब्ध नहीं हैं तो नियमित कर्मचारी का स्थान प्राप्त नहीं हो सकता। दैनिक कर्मचारी कितना भी पुराना क्यों न हो, उसके लिए पद सृजित नहीं किए जा सकता। एकल पीठ ने निर्णय देने में भूल की और खंडपीठ ने भी उस भूल की पुनरावृत्ति कर दी। दोनों निर्णय उच्चतम न्यायालय ने खंडित कर दिए। (2007 (2) एलबीइएसआर-508)
  
   जिला पंचायत के अधिकार
  
   गुजरात की सभी जिला पंचायत एवं ग्राम पंचायतों ने प्रदेश में पंचायत परिषद की स्थापना कर रखी है। यह रजिस्टर्ड सोसाइटी है। साबर कांठा जिला पंचायत के अध्यक्ष ने जिला विकास अधिकारी द्वारा पंचायत कर्मचारियों की मनमानी नियुक्ति आदि के संदर्भ में शिकायतें पाई। जिला पंचायत ने एक प्रस्ताव पारित किया कि विकास अधिकारी इन सभी मामलों में अध्यक्ष से परामर्श अवश्य करें। अध्यक्ष ने जिला विकास अधिकारी को आदेश किया कि वह सभी पत्रावलियां उनके समक्ष प्रस्तुत करे। जिला विकास अधिकारी ने उनके समक्ष कोई भी पत्रावली प्रस्तुत नहीं की। इन परिस्थितियों में गुजरात उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल हुई। एकल न्यायाधीश ने यह निर्णय दिया कि जिला पंचायत अध्यक्ष की स्थिति राज्य के मुख्यमंत्री या ग्राम पंचायत के सरपंच के समान नहीं है। पंचायत अध्यक्ष विकास अधिकारी को निर्देश जारी कर सकते है। विकास अधिकारी का कर्तव्य होगा कि वह अपने कार्यो या आदेशों की सूचना पंचायत अध्यक्ष को दें, लेकिन पंचायत अध्यक्ष के पूर्व आदेश या परामर्श की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। पंचायत परिषद ने इस निर्णय के विरुद्ध अपील की। खंडपीठ ने भी एकल पीठ के निर्णय को सही माना। मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को मानने से इनकार कर दिया कि जिला विकास अधिकारी को अपनी शक्तियों का उपयोग जिला पंचायत अध्यक्ष से परामर्श करने के पश्चात करना चाहिए। कर्मचारियों की नियुक्ति, प्रोन्नति, स्थानांतरण आदि कार्य जिला विकास अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में हैं। जिला पंचायत या उसके अध्यक्ष कोई अधिकार नहीं रखते। (2007(5) सुप्रीम टुडे-716)
   (लेखक विधि मामलों के जानकार है)