राम नाम ही सत्य है; हलफनामा - डा.कर्ण सिंह

राष्ट्र की झोली में मानो पहले ही विवाद कम थे, जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने हमारे चारों ओर व्याप्त भ्रांति और तनाव में अपना भी योगदान जोड़ दिया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का यह दृष्टिकोण समझ से परे है कि रामसेतु/एडम ब्रिज एक बालू-प्रवाल शैल समूह है,जिसे ऐतिहासिक, पुरातात्विक या कलात्मक अभिरुचि अथवा महत्व का नहीं कहा जा सकता। यह एक तार्किक नजरिया है, जिसे केवल इतने ही सशक्त पेशेवर जवाबी तर्क से निरस्त किया जा सकता है। रामसेतु मसले पर पुरातत्व विभाग का यह निष्कर्ष राष्ट्र को स्तब्ध करने वाला है। उसने चंद भारी-भरकम गूढ़ उक्तियां रच दीं,जो ऐतिहासिक विभूति के रूप में श्रीराम के अस्तित्व पर ही संदेह प्रकट करती है। इस संबंध में कई तर्क दिए जाने की आवश्यकता है।

   पहला यह कि संसार की अधिकांश महान धार्मिक विभूतियों के ऐतिहासिक साक्ष्यों को खोजना मुश्किल हो जाएगा। यह कोई पीएचडी के शोध प्रबंध का प्रश्न नहीं, बल्कि ऐसा प्रश्न है जो संसार भर के करोड़ों लोगों के विश्वास और मनोभावों को आक्रांत करता है। इसके अतिरिक्त अयोध्या, रामेश्वरम और धनुषकोडि सहित भारत और श्रीलंका में ऐसे बहुत से स्थान है जो श्रीराम के जीवन के घटनाक्रमों के अंतरंग रूप से संबद्ध हैं। इतिहासकार अब यह भली-भांति स्वीकार करते हैं कि ऐसे मिथकों और आख्यानों का वास्तविक घटनाओं और व्यक्तियों के बीच बहुधा सुदृढ़ आधार होता है। दूसरा तर्क यह है कि महर्षि वाल्मीकि की मूल रामायण से लेकर कंबन की महान तमिल कृति और तुलसीदास के अमर काव्य रामचरितमानस तक संसार की लगभग सभी भाषाओं में राम कथा सैकड़ों बार कही और दोहराई गई है। उनके जन्म से आरंभ होकर विजयोल्लसित अयोध्या आगमन तक की अत्यंत मनमोहक कथा विश्व भर के असंख्य हिंदुओं के मानस पटल पर अंकित हैं और उनके लिए उतनी ही सच्ची है जितनी अन्य कोई भी तथाकथित ऐतिहासिक विभूति। रामायण और महाभारत के संदर्भ में 'भारत एक खोज' में जवाहरलाल नेहरू उदृध्त करते हैं, ''मैं इन ग्रंथों के सिवाय कहीं भी किसी ग्रंथ को नहीं जानता, जिसने जनमानस पर इतना अविराम और व्यापक प्रभाव डाला हो।..ये हमें किंचित बहुविध विभाजित और जातियों में वर्गीकृत बहुरंगी समाज को एकजुट रखने, उनके बिखरे स्वरों को समस्वर करने का रहस्य बताते है तथा उन्हे उद्दात परंपरा एवं नीतिपरक जीवन-यापन की एक साझी पृष्ठभूमि प्रदान करते हैं।'' तीसरा तर्क यह है कि मात्र श्रीराम ही नहीं, बल्कि महासती सीता, आज्ञाकारी लक्ष्मण और आकाश विचरण करने वाले महावीर हनुमान सहित रामायण कथा के कितने ही पात्र समय की वीथियों के आर-पार जनसाधारण की चेतना में रचे-बसे हैं। हर वर्ष विजयदशमी उत्सव में रामकथा का अभिनय एवं प्रदर्शन सैकड़ों रामलीलाओं के रूप में अपने चरमोत्कर्ष पर होता है। दक्षिण भारत की तुलना में यह भले ही उत्तर भारत में अधिक प्रचलित हो, किंतु इससे उनका महत्व कम नहीं हो जाता। कार्तिकेय, अयप्पा और शिव-नटराज जैसे कई देवता बहुधा दक्षिण में पूजे जाते है या पूर्व में भगवान जगन्नाथ की आराधना और दुर्गा पूजा भी प्रचलित है,किंतु ये भौगोलिक कारक किसी भी तरह इन देव-मूर्तियों में निहित हिंदुओं की गहन आस्था को डिगा नहीं पाते है। अंत में विलक्षण बात यह है कि रामायण कथा कदापि भारत तक ही सीमित नहीं है। इसकी सुगंध सुदूर दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया तक फैली हुई है। कंबोडिया स्थित धार्मिक उपासना का विश्व का विशालतम स्थल अंकोरवाट का भव्य मंदिर अपनी भक्तियों पर शानदार मूर्तिकला को उकेरे हुए समूची रामायण और महाभारत कथाओं का दर्शन कराता है। इंडोनेशिया में मुख्यत: मुस्लिम कलाकारों द्वारा कहीं श्रेष्ठ रामलीलाओं का बड़ी शालीनता और भावुकता के साथ प्रदर्शन किया जाता है। थाईलैंड का राज परिवार अपने आपको राम-वंश कहता है, यहां अयोध्या नामक एक तीर्थ स्थल भी है।
  
  
   अंग्रेजों द्वारा पृथ्वी के सुदूर छोरों पर भेजे गए बंधुआ मजदूरों, जिनके वंशज अब फिजी, मारीशस, गुयाना और सूरीनाम में फल-फूल रहे है, के लिए सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबल का एकमात्र स्त्रोत तुलसीदास का महाकाव्य रामचरितमानस ही है। जब गांधी जी ने आदर्श समाज की परिकल्पना की थी तब उन्होंने रामराज्य का ही आह्वान किया था और अंतिम समय उन्होंने मुख से 'हे राम' ही कहा। इन तथ्यों के आलोक में पुरातत्व सर्वेक्षण का हलफनामा न केवल भारत एवं समस्त विश्व के हिंदुओं, बल्कि उनके लिए भी स्पष्टतया दुर्भाग्यपूर्ण, अनुचित और पूर्णतया अपमानजनक है जो हमारी विलक्षण बहुलवादी सांस्कृतिक विरासत को संजोए हैं। देश के अधिकांश भागों में मानव की अंतिम यात्रा में राम नाम सत्य ही साथ देता है।