राजनीतिक हादसों का दौर

परमाणु करार के बाद रामसेतु मामले पर जारी विवाद से भाजपा को लाभ होता हुआ देख रहे है अरुण नेहरू
 
राजनीतिक दुर्घटनाओं की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, लेकिन जब वे होती हैं तो उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता है। गठबंधन सरकारें तो कभी भी दुर्घटना का शिकार हो सकती है। कोई भी सहयोगी दल राजनीतिक और आर्थिक जरूरतों के लिए या फिर जाति व धर्म पर आधारित वोट बैंक को देखते हुए कभी भी बखेड़ा खड़ा कर देता है, जिससे गठबंधन की स्थिरता पर ही सवालिया निशान खड़ा हो जाता है। सभी पार्टियों में भी लगभग ऐसा ही हो रहा है। दरअसल समस्या तब आती है जब राजनीतिक भ्रम गठबंधन धर्म की लक्ष्मण रेखा को पार कर जाता है। मौजूदा समय केंद्रीय राजनीति में जो कुछ हो रहा है उसे जनता बड़ी उत्सुकता से देख रही है। रामसेतु विवाद ने परमाणु मुद्दे पर मिले लाभ को मिटा दिया है। 
 

   कांग्रेसी वफादारी तो दिखा रहे हैं,पर साथ ही अंदरूनी कलह, राजनीतिक नेतृत्व का अभाव और संवेदनशील आंतरिक मुद्दों पर उनका नजरिया सही न होने के कारण निकट भविष्य में चुनाव की संभावना कमजोर पड़ रही है। इसके विपरीत रक्षात्मक भाजपा को साफ-साफ फायदा होता दिख रहा है। यदि भाजपा उत्तरी राज्यों में अपनी सीटे बढ़ाने में कामयाब होती है और गुजरात में अनुमान के मुताबिक सफाया करने में सफल रहती है तो वह अच्छी-खासी चुनौती पेश करेगी। तात्पर्य यह है कि यदि भाजपा ने अगले चुनाव में सौ से अधिक सीटे जीत लीं तो कई नए-पुराने सहयोगी उसकी ओर आकृष्ट हो सकते है। भाजपा को राहत जरूर मिल गई है, लेकिन नेतृत्व का मामला लटका होने से यहां कभी भी टकराव हो सकता है। अगले कुछ महीनों में गुजरात में होने वाले चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन चुनावों के बाद हर पार्टी को अपने हालिया अतीत की समीक्षा का अवसर मिलेगा, जिससे वे भविष्य की अपनी दिशा तय कर सकेंगी। वाम दलों द्वारा परमाणु करार का विरोध जारी रहने पर भी सरकार गिरने की आशंका नहीं है। बसपा, अन्नाद्रमुक, तेलगूदेशम और जनता दल को छोड़कर कोई भी पार्टी चुनावी जंग के लिए तैयार नहीं है। कांग्रेस को कुछ फायदा अवश्य होगा, लेकिन यह उत्तर तक सीमित रह जाएगा। भाजपा शासित राज्यों- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को लाभ होगा, किंतु दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र में उसकी सीटें घटेंगी। इसके अलावा उत्तर प्रदेश और बिहार में उसकी स्थिति पर भी कुछ प्रभाव पड़ेगा। दीपावली और दशहरा करीब आने के साथ अगले कुछ महीनों में रामसेतु का विवाद और अधिक भड़केगा। इस मुद्दे पर वामपंथी दल और सपा मौन रहकर समझदारी का ही परिचय दे रहे हैं। द्रमुक परिवार अपने लिए मुसीबतें खड़ी कर रहा है और इस संबंध में उसके विचार संप्रग में मामले को उलझाएंगे ही। यह राहत की बात है कि प्रधानमंत्री कुछ समय के लिए अस्पताल में रहने के बाद अब पुन: स्वस्थ होकर काम में जुट गए है। रामसेतु मामले पर अंबिका सोनी और जयराम रमेश की बयानबाजी से दिक्कतें ही खड़ी हुई है। वैसे इन दोनों के विचार ज्यादा अर्थ नहीं रखते, क्योंकि इन दोनों में से किसी की भी तरक्की या विदाई का अंतत: लोगों के मानस पर कोई प्रभाव नहींपड़ेगा।वोट बैंक के लिए अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण अनेक गतिविधियों से जाहिर हो रहा है। 2004 चुनाव के बाद से आरक्षण और फिर आतंक से निपटने में कारगर कानूनों में संशोधन करने को प्राथमिकता दी जा रही है। बहुसंख्यकों के वोट को अपना मानकर चला जाता है। निकट भविष्य में कांग्रेस और सोनिया गांधी इस मुद्दे पर परेशानी में पड़ सकते हैं। एक बार ये मुद्दे चर्चा का विषय बन जाएं तो इन्हें सुलझाना मुश्किल हो जाता है। इस विपत्ति से पार्टी और नेताओं को बचाने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि इसके जिम्मेदार लोग अपनी जवाबदेही स्वीकार करें। मेरा विश्वास है कि राजनीतिक हादसे अभी थमने वाले नहीं है। जैसे ही चुनाव सिर पर आएंगे, अनेक भेद खुलने जैसी बातें सामने आएंगी। जाहिर है कि इन पर लोगों में चर्चा भी होगी। राजनीति में 'लीक' हमेशा ऊपर से होता है। ऐसी स्थितियों में त्वरित निर्णय लेना महत्वपूर्ण होता है। दुर्भाग्य से मौजूदा स्थितियों में ऐसा तंत्र नजर नहीं आता जो आपात स्थितियों से सही तरह निपट सके। भ्रमित विपक्ष से राजनीतिक लाभ उठाने की आशा हर कोई कर रहा है। देश में आर्थिक विकास के अनुरूप राजनीतिक और कानूनी ढांचा विकसित नहीं हो पाया है। यहां राजनीतिक मुद्दे और राजनेता राजनीतिक जांच-पड़ताल का हिस्सा हैं। यद्यपि राजनेताओं को मतपत्र की ताकत से पराजित किया जा सकता है, लेकिन जहां तक न्यायिक पद्धति का प्रश्न है तो हमारे देश में सार्वजनिक जवाबदेही तथा जांच-पड़ताल जैसा कुछ नजर नहीं आता। निश्चित ही इस तंत्र में कतिपय खामियां है, जिन्हे प्राथमिकता के आधार पर दुरुस्त किया जाना चाहिए। 

   हाल के महीनों में मीडिया की सक्रियता और लोगों के दबाव में कुछ मामले दोबारा खोले गए। इनमें जेसिका लाल, नीतीश कटारा, प्रियदर्शी मट्टू के मामले शामिल हैं। अदालतों में लाखों-करोड़ों मामले लंबित हैं। यदि सुधार नहीं किया गया तो यह स्थिति बनी भी रहेगी। हम सभ्य समाज में विधि के शासन के बिना नहीं रह सकते। एक ऐसे समय जब हम महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर हैं तब हमें न्यायिक सुधार को गति देनी ही होगी। यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि तीव्र विकास के साथ-साथ आपराधिक घटनाएं भी बढ़ती है। अगर कानूनी तंत्र में सुधार नहीं किया गया तो अराजकता फैल जाएगी। न्यायिक पद्धति और राजनीति में सुधार पर बातें तो खूब की जा रही है, पर इस दिशा में ठोस काम नहीं हुआ है। अब यह समस्या गंभीर होती जा रही है। यदि शासन के सभी अंगों में शामिल लोगों के लिए संपत्ति की घोषणा करना अनिवार्य बना दिया जाए तो अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। ऐसी किसी व्यवस्था के दायरे में लोकसेवकों और राजनेताओं के साथ-साथ उनके परिजनों को भी शामिल किया जाना चाहिए।