धर्ममार्ग- उपनिषद की शिक्षाएं- कन्हैयालाल शर्मा 'निर्मल'

उपनिषद का शाब्दिक अर्थ है गूढ़-विद्या यानी रहस्य अथवा वह विद्या जो केवल दीक्षित-शिष्यों को एकांत में दी जाती है और इसका पूरा ध्यान रखा जाता है कि वह किसी अनधिकारी को न दी जाए। उसी समय से यह शब्द शास्त्र के लिए भी प्रस्तुत होने लगा। साधारण गणना के अनुसार इन ग्रंथों की संख्या बहुत अधिक हो जाती है, किंतु उनमें केवल लगभग एक दर्जन ही वैदिक साहित्य के वास्तविक अंगों की श्रेणी में आते है। शेष बाद के उपनिषद है और अपेक्षतया कम महत्व के है। पहले वालों को हम प्रामाणिक उपनिषद कह सकते है और वे वैदिक विचारधारा के अमूल्य रत्‍‌न कहे जाते है। जहां वे छंदोबद्ध करके नहीं लिखे गए हैं वहां वे संगीतात्मक गद्य में है। उपनिषदों की वास्तविक शिक्षा क्या है? यह सिद्ध करने को थोड़ी कठिनाई है, क्योंकि इस संबंध में अनेक मत है। हां,यह स्पष्ट है कि उन सबों का प्रतिपाद्य मत अद्वैतवादी और एकत्ववादी है। कहने का तात्पर्य यह है कि वे यही शिक्षा देते है कि परम सत्य एक और केवल एक है। अस्तु एकत्व सिद्धांत, उपनिषदों की मुख्य शिक्षा है। इसका स्वरूप क्या है? इसके लिए वैदिक-साहित्य की कुछ बातों पर ध्यान देना होगा।
   एकत्ववाद, संपूर्ण विश्व, प्रकृति, मनुष्य और देवता, इनकी विषय रूप से व्याख्या करने का परिणाम है। इनमें एक 'ब्रह्म' की भावना है, जो धीरे-धीरे प्रधानता पाती गई। ऋगवेद में एक प्रश्न उठाया गया है,'वह कौन सा काष्ठ या वृक्ष है, जिससे इस पृथ्वी और आकाश की रचना हुई?' इसके उत्तर में ब्राह्मण में कहा गया है, ब्रह्म ही वह काष्ठ है और ब्रह्म ही वह वृक्ष है।' उपनिषदों में इस मत का प्राधान्य है। हां, यह अवश्य है कि 'ब्रह्म' शब्द की व्युत्पित्ति 'वृह' धातु से हुई है। इस धातु का अर्थ होता है बढ़ना या फैलना। इस प्रकार पूरा अर्थ है, 'वह सूक्ति अथवा स्त्रोत रूप में प्रस्फुटित हो जाने वाली शक्ति है।' अथर्वेद में विश्व-आत्मा के बारे में कहा गया है कि पृथ्वी उसके पैर है,अंतरिक्ष उसका उदर है, आकाश सिर है, सूर्य-चंद्र नेत्र और वायु प्राण है। ब्रह्म और आत्मा की अलग-अलग भावनाओं में एकत्व भी स्थापित किया गया है। इन दोनों के एकत्व का प्रतिपादन ही उपनिषदों की शिक्षाओं का सार है।
- कन्हैयालाल शर्मा 'निर्मल'