बेहतर भविष्य की ओर हिंदी - हृदयनारायण दीक्षित

भारत मे सरस्वती के तट पर विश्व मे पहली बार शब्द प्रकट हुआ। ऋग्वैदिक ऋषि माध्यम बने। ब्रह्म/ सर्वसत्ता ने स्वयं को शब्द मे अभिव्यक्त किया। ब्रह्म शब्द बना, शब्द ब्रह्म कहलाया। अभिव्यक्ति बोली बनी और भाषा का जन्म हो गया। नवजात शिशु का नाम पड़ा संस्कृत। संस्कृत यानी परिष्कृत, सुव्यवस्थित/ बार- बार पुनरीक्षित। अक्षर अ-क्षर है। अविनाशी है। सो संस्कृत की अक्षर ऊर्जा से दुनिया मे ढेर सारी बोलियो/भाषाओ का विकास हुआ। लोकआकांक्षाओ के अनुरूप संस्कृत ने अनेक रूप पाये। भारत में वह वैदिक से लोकसंस्कृत बनी। प्राकृत बनी। पाली बनी। अपभृंश से होकर हिंदी बनी।
 
   भारत स्वाभाविक ही हिंदी मे अभिव्यक्त होता है। भारत के संविधान मे हिंदी राजभाषा है, लेकिन 54 वर्ष बाद भी अंग्रेजी ही राजभाषा है। भारत की संविधान सभा मे राष्ट्रभाषा के सवाल पर 12, 13 व 14 सितंबर को लगातार तीन दिन तक बहस हुई। लंबी बहस के बाद (14 सितंबर 1949) अंग्रेजी महारानी और हिंदी पटरानी बनी। बहस के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने कहा, पिछले एक हजार वर्ष के इतिहास मे भारत ही नही सारे दक्षिण पूर्वी एशिया मे और केंद्रीय एशिया के कुछ भागो मे भी विद्वानो की भाषा संस्कृत ही थी। अंग्रेजी कितनी ही अच्छी और महत्वपूर्ण क्यो न हो, लेकिन इसे हम सहन नही कर सकते। हमे अपनी ही भाषा (हिंदी) को अपनाना चाहिए। संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा घोषित करने के बावजूद अंग्रेजी को बनाए रखने का प्रस्ताव किया और इसे हटाने के लिए 15 वर्ष की समय सीमा तय हो गयी। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा मै संस्कृत चुनता। वह मातृभाषा है। हम हिंदी क्यो स्वीकार कर रहे है? इस (हिंदी) भाषा के बोलने वालो की संख्या सर्वाधिक है। अंग्रेजी हटाने के लिए 15 वर्ष हैं। वह किस प्रकार हटायी जाए? असल मे संविधान की मसौदा समिति राष्ट्रभाषा के सवाल पर एक राय नही हो सकी। सभा मे 300 से ज्यादा संशोधन प्रस्ताव आए। जी. एस. आयंगर ने मसौदा रखा। हिंदी की पैरोकारी की लेकिन कहा आज वह काफी सम्मुनत भाषा नही है। अंग्रेजी शब्दो के हिंदी पर्याय नही मिल पाते। सेठ गोविंद दास ने हिंदी को संस्कृति से जोड़ा यह एक प्राचीन राष्ट्र है। हजारो वर्ष से यहाँ एक संस्कृति है। इस परंपरा को एक बनाए रखने तथा इस बात का खंडन करने के लिए कि हमारी दो संस्कृतियां है, इस देश मे एक भाषा और एक लिपि रखना है। नजीरुद्दीन अहमद ने अंग्रेजी अनिवार्य रखने का आग्रह किया, लेकिन टोका टाकी के बीच उन्होने संस्कृत की भी वकालत की। 

   
   नजीरुद्दीन ने कहा आप संसार की सर्वोत्तम कोटि की भाषा संस्कृत क्यो नही स्वीकार करते। उन्होने मैक्समुलर, विलियम जोंस, डब्लू हंटर सहित दर्जनो विद्वानो के संस्कृत समर्थक विचार उद्धृत किए, लेकिन अंग्रेजी का समर्थन किया। कृष्णमूर्ति राव ने अंग्रेजी की यथास्थिति बनाए रखने और राष्ट्रभाषा का सवाल भावी संसद पर छोड़ने की वकालत की। हिफजुररहमान ने हिंदुस्तानी भाषा और देवनागरी-उर्दू लिपि पर जोर दिया। स्वाधीनता संग्राम की भाषा हिंदी थी। अक्टूबर, 1917 मे गाँधीजी ने राष्ट्रभाषा की परिभाषा की उस भाषा के द्वारा भारत का आपसी, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक काम हो सके तथा उसे भारत के ज्यादातर लोग बोलते हो। अंग्रेजी मे इनमे से एक भी लक्षण नही है। हिंदी मे ये सारे लक्षण मौजूद है। (संपूर्ण गाँधी वाड्.मय, 14/28-29)संविधान सभा मे जब आर. वी. धुलेकर ने हिंदी को राष्ट्रभाषा कहा तो गुरु रेड्डी ने आपत्ति की। धुलेकर ने कहा आपको आपत्ति है, मैं भारतीय राष्ट्र, हिंदी राष्ट्र, हिंदू राष्ट्र, हिंदुस्तानी राष्ट्र का हूँ। इसलिए हिंदी राष्ट्रभाषा है और संस्कृत अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। अंग्रेजी के नाम पर 15 वर्ष का पट्टा लिखने से राष्ट्रहित नही होगा। अंग्रेजी वीरो की भाषा नही है। वैज्ञानिको की भी नही है। अंग्रेजी के अंक भी उसके नही है। धुलेकर काफी तीखा बोले। पं. नेहरू ने आपत्ति की। वे फिर बोले। नेहरू ने फिर आपत्ति की। लक्ष्मीकांत मैत्र ने संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने का आग्रह किया। अलगूराम शास्त्री ने अंग्रेजी को विदेशी भाषा कहकर हिंदी का समर्थन किया, हिंदी को अविकसित बताने पर वे बहुत खफा हुए। पुरुषोत्तम दास टंडन ने अंग्रेज ध्वनि विज्ञानी इसाक पिटमैन के हवाले से कहा विश्व में हिंदी ही सर्वमान्य वर्णमाला है। अबुल कलाम आजाद, रविशंकर शुक्ल, डॉ. रघुवीर, गोविंद मालवीय, के. एम. मुंशी, मो. इस्माइल आदि ढेर सारे लोग बोले। 

   
   15 वर्ष तक अंग्रेजी जारी रखने के पर परंतुक के साथ हिंदी राजभाषा बनी। सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी ही रही। केंद्र पर हिंदी का प्रचार-प्रसार बढ़ाने की जिम्मेदारी भी डाली गयी (अनु. 351)। तब से ढेर सारे 15 बरस आए, लेकिन अंग्रेजी बढ़ती रही। सारे राजनीतिक दल और मजदूर संगठन अपना अखिल भारतीय पत्राचार अंग्रेजी मे करते है। बड़ी पूँजी वाली राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियां अंग्रेजी मे काम करती है। भारत मे अंग्रेजी बोलना बड़ा आदमी होना है। सौ फीसदी हिंदी भाषी राज्यो उ. प्र., बिहार, म. प्र., राजस्थान, झारखंड, हरियाणा, उत्तरांचल, दिल्ली और छत्तीसगढ़ आदि मे भी पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाने और पढ़ने की आँधी है। भारत के असली प्रशासको की असली भाषा भी अंग्रेजी है। आई. ए. एस. की मुख्य परीक्षा मे राजभाषा के बजाए अंग्रेजी का पर्चा आज भी अनिवार्य है। देश की बाकी भाषाओ मे से कोई एक वैकल्पिक है। संसद ने सर्वसम्मत प्रस्ताव (1967) द्वारा हिंदी अथवा अंग्रेजी मे से किसी एक को अनिवार्य किया। 11 जनवरी, 1991 को संसद ने यही प्रस्ताव दोहराया। राष्ट्रपति ने अंग्रेजी के तुरंत खात्मे के निर्देश (28 जनवरी, 1992) दिए, लेकिन संसद और राष्ट्रपति के तुरंत किसी परंतु मे फँसे हुए है। अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन ने आदोलन चलाया। 350 सांसदो ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को (01.12.1988) ज्ञापन दिया। अटल जी ने सत्याग्रह स्थल पर (07.01.1989) समर्थन दिया। 26 मई, 1989 को सरकारी आश्वासन मिला। एक समिति बनी कि अंग्रेजी कैसे हटे? फिर आंदोलन हुआ। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह (21.11.1990) धरने पर बैठे। पुष्पेन्द्र चौहान दर्शकदीर्घा से नारे लगाते (10.01.1991) लोकसभा मे कूदे। उनकी पसलियां टूट गयी। लोकसभा मे पूर्व प्रस्ताव फिर (11.01.1990) दोहराया गया।

   
   ज्ञानी जैलसिंह, वी. पी. सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, देवीलाल आदि धरने (12 मई, 1994) पर बैठे। एक साल बाद (12.05.1995) लालकृष्ण आडवाणी और वीरेन्द्र वर्मा ने धरना दिया। सारे नेताओ ने सत्ता से बाहर रहकर अंग्रेजी हटाओ की मांग लेकर धरना दिया, लेकिन सत्ता मे आकर चुप्पी साधी। अंग्रेजी का बाल भी बांका नही हुआ। हिंदी दलित, शोषित, उत्पीडि़त रही। सरकारे बेशक पिद्दी साबित हुई, लेकिन भारत अब अंतरराष्ट्रीय बाजार का खास हिस्सा है। सो हिंदी की पौ बारह है। हिंदी आम उपभोक्ता की भाषा है। रामनिवास शर्मा जैसे मा‌र्क्सवादी विद्वान खड़ी बोली की ताकत का श्रेय बाजार को ही देते थे। भाषा का भविष्य अब बाजार ही तय कर रहा है। हिंदी सारे देश की मजबूरी होगी। गांधीजी ने लखनऊ मे कहा भी था टूटी फूटी हिंदी मै बोलता हूँ, क्योकि अंग्रेजी बोलने मे मानो मुझे पाप लगता है।
 
   (हृदयनारायण दीक्षित-लेखक उप्र सरकार के पूर्व मंत्री है)