आस्था के प्रति अनास्था

भारतीय संस्कृति और सनातन आस्था के प्रति सत्तापक्ष के दृष्टिकोण पर प्रश्नचिह्न लगा रहे है हृदयनारायण दीक्षित
 
भारतीय प्रतीकों के अपमान का इतिहास पुराना है। हलफनामा और श्रीराम सिर्फ बहाना है। भारत आर्यावर्त है, लेकिन अपमान के उद्देश्य से आर्यो को विदेशी हमलावर बताया गया। सिंधु सभ्यता वैदिक सभ्यता का अंग थी, उसे तहस-नहस करने का आरोप आर्यो पर जड़ा गया। इस सभ्यता के विकास का श्रेय भी भारत के बजाय सुमेरियों को दिया गया। आर्यो को बर्बर बताया गया। गाय भारतीय संस्कृति में मां है, लेकिन इसे पूर्वजों की खाद्य सामग्री बताया गया। शिव वैदिक देवता है, लेकिन उन्हे भी 'आयातित देव' बताया गया। विवाह संस्था हजारों वर्ष पहले ऋग्वेद में है, लेकिन इसे भी बाहरी बताया गया। भगत सिंह इतिहास सिद्ध क्रांतिकारी देशभक्त हैं, उन्हे आतंकवादी पढ़ाया गया। होली भारत का उल्लास पर्व है, लेकिन होली को भी मिस्त्र और यूनान का आयात बताया गया। ज्योतिष के सूत्र ऋग्वेद में है, लेकिन इसका श्रेय भी यूरोप को दिया गया। राम और कृष्ण को काल्पनिक कथा नायक पढ़ाया गया, बच्चे पढ़ते गए। सत्ताधारी कांग्रेस और वामदलों ने बीते 57 बरस से हिंदू आस्था के अपमान का अभियान लगातार चलाया है। हलफनामा आस्था अपमान का ही हिस्सा था, लिहाजा सरेआम निंदा का विषय बना। हलफनामा कोई साधारण कागजी टुकड़ा नहीं होता। संपूर्ण विश्वास और आस्था के साथ प्रकट वचन ही शपथ पत्र/ हलफनामा कहलाते है। सरकार ने हलफनामे के समय किसी सर्वोच्च आस्था को याद किया होगा। सरकार ईश्वरवादी नहीं है, विकल्प रूप में सत्यनिष्ठा है। उसने न्यायालय के समक्ष पूरी सत्यनिष्ठा के साथ राम का अस्तित्व नकारा। सरकारी सत्यनिष्ठा और राष्ट्रीय सत्यनिष्ठा में टकराव हो गया।
 
   सरकार हलफनामा वापसी पर मजबूर हुई,लेकिन हलफनामा वापसी से कई नए सवाल खड़े हो गए। क्या सरकारी सत्यनिष्ठा में कोई बदलाव आया है? क्या सरकार ने श्रीराम का अस्तित्व मान लिया है? क्या पहले वाला शपथपत्र परिपूर्ण सत्य नहीं था? क्या नया हलफनामा राष्ट्रीय नाराजगी को दूर करने के लिए ही है? लालकृष्ण आडवाणी ने सरकार से माफीनामा मांगा है, लेकिन जो सरकार हलफनामे में भी सत्यनिष्ठ नहीं है उससे माफीनामे में किसी सत्यनिष्ठा की उम्मीद कैसे की जा सकती है? आस्थाएं एक दो दिन में नहीं बनती-बिगड़तीं। लोकजीवन प्रयोगशाला बनता है। प्रश्न-प्रतिप्रश्न उठते है। तर्क-प्रतितर्क चलते है। विचार-विमर्श होते है। निष्कर्ष विश्वास बनते है। तब कहीं विश्वास आस्था की शक्ल लेते है। हजरत मुहम्मद की बातों पर भी पहले यकीन नहीं हुआ। काफी घमासान हुआ, तकरार हुई, तब आस्था बनी। ईसा के साथ भी यही हुआ, उन्हे सलीब मिली, तर्क-प्रतितर्क चले, ईसाइयत आस्था हो गई। भारतीय आस्थाएं हजारों वर्ष के तर्क-प्रतितर्क से बनीं। रामायण और महाभारत, सांख्य, वैशेषिक, योग और वेदांत सहित हजारों दृष्टिकोणों, पद्धतियों से 'भारत की बुद्धि' बनी। इसलिए सरकारों को भारत की बुद्धि का अतिक्रमण करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। आखिरकार राज्य व्यवस्था राष्ट्र की सहायक एजेंसी ही होती है। जैसे संस्कृति राष्ट्र की धारक होती है वैसे ही संविधान राज्य की सर्वोच्च आस्था है। संविधान निर्माता संस्कृति के प्रति आस्थावान थे। संविधान की मूल प्रति पर श्रीराम और श्रीकृष्ण के चित्र है। राम और कृष्ण संविधान का चेहरा है। संविधान के सभी भागों में भी संस्कृति मूलक चित्र है। मौलिक अधिकार वाले भाग 3 में श्रीराम की लंका विजय का चित्र है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एजेंसी तब भी थी। संविधान सभा ने उससे राम और कृष्ण की जांच नहीं करवाई। संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद, प्रधानमंत्री नेहरू और संविधान मसौदे के मुख्य शिल्पी डा. अंबेडकर ने सीताहरण और लंका विजय की गाथा की जांच के लिए एएसआई की सेवाएं नहीं लीं। उन्होंने महाकाव्यों और लोकस्मृति को ही साक्ष्य माना। 

   
   भारत के तमाम लोग 15 अगस्त और 26 जनवरी का फर्क नहीं जानते, लेकिन सभी राम के पिता दशरथ का नाम जानते है। संविधान निर्माताओं ने लोकस्मृति और लोकआस्था को वरीयता दी। चित्रमय संविधान की प्रति का उल्लेख संविधान सभा की कार्यवाही में है, लेकिन केंद्र ने संविधान निर्माताओं की आस्था का भी अपमान किया। डरी कांग्रेस सोनिया की छवि बचा रही है कि उन्होंने हस्तक्षेप किया। सत्तापक्ष की बयानबाजी भी हलफनामे की ही तरह नया जालबट्टा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री राम विरोधी नए प्रवक्ता है। वह संप्रग सरकार का एक प्रमुख अंग हैं। उनके सवाल हास्यास्पद है। वह राम की इंजीनियरी डिग्री पूछ रहे है। चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य भी इसी तमिल प्रांत के थे तथा कंबन और सुब्रमण्यम भारती जैसे महाकवि भी। करुणानिधि अपनी विरासत नहीं मानते, न मानें। कंबन की रामकथा करुणानिधि की क्षेत्रीय पार्टी की तुलना में अखिल भारतीय लोकप्रिय है। राजगोपालाचार्य ने रामकथा पर तमिल में 'चक्रवर्ती तिरुमगन' लिखा। उनकी पुत्री और महात्मा गांधी की बहू लक्ष्मी देवदास गांधी ने हिंदी अनुवाद किया। करुणानिधि बिना वजह सिर पीट रहे है। भारतीय इतिहास, वेद, उपनिषद, महाकाव्य और पुराण कर्मकांडी ब्राह्मणों या पुरोहितों की कपोल कल्पित रचनाएं नहीं हैं। राम या कृष्ण गढ़े गए चरित्र नहीं हैं। वे इतिहास है, पुराण है, काव्य और आस्था है। रावण बेशक विद्वान ब्राह्मण था,पर उसके कर्म से खफा भारतवासी हर बरस उसका पुतला जलाते है। भारत ने अपना इतिहास यूरोपीय तर्ज पर नहीं लिखा। यहां जो शुभ था उसे लोक ने गाया, स्मृति बनाया, वही पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित हुआ। यही इतिहास, संस्कृति और आस्था भी बना, लेकिन केंद्र एएसआई से साक्ष्य मांगता है। एएसआई क्या करे? उसके काम करने का अपना तरीका है। बुनियादी सवाल सनातन आस्था के बारे में सत्तापक्ष के दृष्टिकोण का है। आस्था के प्रति अनास्था ही उसकी आस्था है। राष्ट्र अपनी एकजुटता दिखाए, अन्य कोई विकल्प नहीं।
-हृदयनारायण दीक्षित