अंतःकरण की शक्तियां

एक समय था जब मनुष्य भी देवता थे।लेकिन वे अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने लगे । सभी देवता परेशान होकर परमपिता के पास गये और निवेदन किया कि मनुष्य कि इन शक्तियों को छीन कर कहीं छुपा दिया जाय । देवताओं ने सुझाव दिया कि इन शक्तियों को कहीं गहरा धरती में दबा दिया जाय, परमपिता बोले, “नहीं, मनुष्य गहरा खोदकर उन्हें निकाल लेगा” । फिर सुझाव आया कि शक्तियों को गहरे सागर में छिपा दिया जाय । परमपिता संतुष्ट नहीं थे । वे बोले मैं उसकी शक्तियों को उसी के अंतःकरण में छुपा देता हूं, वहां वह कभी देखने का प्रयत्न कभी नहीं करेगा ।
और उस दिन से हम प्रभु को मंदिरों, मस्जिदों, धामों, काबा और काशी में खोजते हैं लेकिन अपने अंतःकरण में कभी झांक कर नही देखते । हम सब प्राणियों में ब्रह्म विद्यमान है, आवश्यकता है अपने अंतःकरण में उसे खोजने की । उसे पाने का कोई सीधा सरल रास्ता नहीं है, केवल ध्यान साधना से ही हम उसको पा सकते हैं । ध्यान के बिना सब व्यर्थ है । कई वर्षों की लगन, साधना और श्रम की आवश्यकता है । लक्ष्य कठिन है, लेकिन अगर एक बार आपने संधान कर लिया तो आनंद तुम्हें बहा ले जायेगा, पता भी नहीं चलेगा कि इतनी दूर चले आये।