न दर्शक, न प्रोत्साहन फिर भी चक दे इंडिया

भोपाल। खाली पड़ा स्टेडियम, स्वर्ण पदक हासिल करने के बावजूद दर्शकों की तालियों के लिए तरसते एथलीट, इसके बावजूद उम्मीद ये कि 'चक दे इंडिया'।
   चार दिवसीय 47वीं राष्ट्रीय एथलेटिक्स चैंपियनशिप के दौरान यहां तात्या टोपे स्टेडियम का यह मंजर बताता है कि हमारे यहां खेलों का ककहरा क्रिकेट के इर्द-गिर्द ही घूमता है। स्पर्धा में दांव पर कुल 132 पदक हैं लेकिन सोने, चांदी और कांस्य के पदक बटोरने वाले इन खिलाड़ियों की उपलब्धि पर न सुनाई देने वाली कुछ तालियां बजती भी हैं तो वह उन्हीं के साथी खिलाड़ियों और कोच की होती है। प्रतियोगिता के पहले दिन से लेकर बृहस्पतिवार को अंतिम दिन तक दर्शकों की यह बेरुखी बदस्तूर जारी रही।
  
   एथलीट और उनके कोच इस तथ्य को आत्मसात कर चुके हैं कि इस देश में एथलेटिक्स को दर्शक नहीं मिलते हैं। इस सवाल पर कि खाली पडे़ स्टेडियम का सन्नाटा उन्हें चुभता नहीं है, स्पर्धा में तिहरी कूद में स्वर्ण पदक जीतने वाले केरल की रंजीत माहेश्वरी कहते हैं कि अब तो आदत पड़ चुकी है। बेहद तल्खी से एक कोच कहते हैं कि भले ही हमें प्रायोजक, दर्शक और प्रोत्साहन न मिले लेकिन हर एशियाड और ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन के बाद यह तुमुल गान जरूर शुरू हो जाता है कि एक अरब से अधिक की आबादी वाला यह देश इन प्रतियोगिताओं में पदक क्यों नहीं जीत पाता है।
  
   क्रिकेट की लोकप्रियता की आंधी में अन्य खेलों का अक्स धुंधलाने की पीड़ा इन खिलाड़ियों को सालती जरूर है लेकिन साथ ही यह बेचारगी भी झलकती है कि कुछ किया नहीं जा सकता है। प्रतियोगिता में महिलाओं की 100 मीटर बाधा दौड़ में स्वर्ण जीतने वाली कर्नाटक की पूनम बोईजाना कहती हैं कि आखिर हम कर ही क्या सकते हैं। पूर्वाेत्तर में असम और दक्षिण में केरल सहित कुछ अन्य राज्यों में जरूर ऐसी स्पर्धाओं के आयोजन के समय दर्शक मैदान में आते हैं लेकिन वह भी कोई ऐसी संख्या नहीं होती जिस पर प्रसन्नता जताई जा सके। मध्य प्रदेश एमेच्योर एथलेटिक्स एसोसिएशन के सचिव मुमताज खान कहते हैं, 'नि:शुल्क प्रवेश के बावजूद अगर दर्शक स्टेडियम न आएं तो इसे अफसोसनाक ही कहा जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए बेहतर प्रशिक्षण और कोच के साथ प्रोत्साहन तथा पैसा मिलना भी बहुत जरूरी है लेकिन हालत यह है कि स्पर्धा की मेजबानी के लिए प्रायोजक जुटाने में पसीने छूट जाते हैं।' उनका कहना है कि जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए उत्साहवर्धन बहुत जरूरी है। खचाखच भरे स्टेडियम में प्रदर्शन और फिर तालियों की जबर्दस्त गड़गड़ाहट के बीच मेडल लेने के लिए पोडियम की ओर बढ़ने की इच्छा हर खिलाड़ी के मन में होती है लेकिन इस मामले में एथलीट क्रिकेटरों की तरह भाग्यशाली नहीं हैं।
  
   कई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में भारत के लिए महत्वपूर्ण सफलताएं अर्जित करने वाली आंध्र प्रदेश की एथलीट जे. जे. शोभा कहती हैं कि शुरू-शुरू में राष्ट्रीय स्पर्धाओं में खाली पड़े स्टेडियम में प्रदर्शन करना अजीब लगता था लेकिन अब आदत हो गई है। सिर्फ दर्शक ही नहीं एथलेटिक्स को लेकर सरकार का दोयम दर्जे का व्यवहार भी इन खिलाड़ियों को बहुत चुभता है। शोभा कहती हैं कि जिस तरह की सुविधाओं की हमें जरूरत है वह नहीं मिल पाती हैं। किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा के चंद महीनों पहले ही मांगी गई सुविधाएं इस गहरे दबाव के साथ दी जाती हैं कि प्रतियोगिता में पदक जरूर लाना है। मुमताज खान इस सवाल पर लाचारी जताते हुए कहते हैं कि हम क्या करें। सरकार से जितनी मदद मांगी जाती है उसके बदले जो मिलता है उससे सिर्फ काम ही चलाया जा सकता है।
  
   इन खिलाड़ियों को मीडिया की उपेक्षा भी खलती है। पूनम बोईजाना कहती हैं कि राष्ट्रीय स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने के बावजूद मीडिया से जुडे़ लोग पास आने के बाद पहला सवाल यही करते हैं कि आपका नाम क्या है और आप किस खेल से जुड़ी हैं। इस प्रतियोगिता का सीधा प्रसारण दूरदर्शन जरूर कर रहा है लेकिन निजी टेलीविजन चैनलों का कोई प्रतिनिधि स्टेडियम में नजर नहीं आया। खान कहते हैं कि स्पर्धा के उद्घाटन वाले दिन जरूर कुछ चैनलों के प्रतिनिधि आए थे।