आर्थिक चिंतन- डा.भरत झुनझुनवाला

रिजर्व बैंक ने अपनी वार्षिक रपट में कृषि की गिरती विकास दर पर चिंता जताई है। कृषि की विकास दर 80 के दशक में 4.4 फीसदी थी, जो नौवें दशक में 3.2 रह गई और वर्तमान में 2.3 फीसदी तक गिर चुकी है। गिरती विकास दर का अर्थ है कि कृषि उत्पादन में वृद्धि तो हो रही है, परंतु वृद्धि की दर कम होती जा रही है। रिजर्व बैंक ने इस स्थिति के लिए सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में गिरते निवेश को दोषी ठहराया है। सत्तर के दशक में देश की आय का 3.4 फीसदी कृषि की बुनियादी सुविधाओं, जैसे नहर एवं बीज अनुसंधान पर खर्च हो रहा था, लेकिन वर्तमान में यह 2.6 फीसदी रह गया है। रिजर्व बैंक ने सरकार को आगाह किया है कि कृषि में सरकारी निवेश बढ़ाए, जिससे कृषि में विकास दर ऊंची बनी रहे। रिजर्व बैंक की चिंता उचित है। निवेश बढ़ाने से कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी। उदाहरण के लिए राजस्थान नहर में सरकार द्वारा निवेश से बीकानेर एवं जैसलमेर के रेगिस्तानी इलाकों में गेहूं का बड़ी मात्रा में उत्पादन होने लगा है, पर इससे किसानों की आय में वृद्धि होना जरूरी नही है।

   किसान की आय उत्पादन और मूल्य के गुणांक से तय होती है। 100 किलो गेहूं यदि 10 रुपए में बेचा जाए तो किसान की कुल आय 1000 रुपए होती है। गेहूं का उत्पादन बढ़कर 125 किलो हो जाए, पर मूल्य घटकर 7 रुपए रह जाए तो किसान की कुल आय 875 रुपए रह जाती है। किसानों की बिगड़ती हालत का मूल कारण कृषि उत्पादों के मूल्यों में गिरावट है। यद्यपि ऐसा लगता है कि कृषि उत्पादों के मूल्य बढ़ रहे है, जैसे गेहूं का दाम 20 वर्ष पूर्व 5 रुपए प्रति किलो था और वर्तमान में 12 रुपए है, परंतु इसी अवधि में एक कार का दाम 55000 रुपए से बढ़कर 220000 रुपए हो गया है। मतलब यह कि इंडस्ट्री के माल में चार गुना वृद्धि हुई, जबकि कृषि माल में ढाई गुना। कृषि माल के मूल्यों में इस गिरावट का मूल कारण वैश्विक जनसंख्या में न्यून वृद्धि है, जिसके कारण खाद्यान्न की खपत में मामूली वृद्धि हो रही है। एक व्यक्ति एक दिन में 5-10 रोटी ही खा सकता है,जबकि वह कई गाड़ियों में सैर कर सकता है। इस प्रकार कृषि उत्पादों की मांग सीमित है। कृषि उत्पादन बढ़ता जा रहा है। जंगलों को काट कर खेत बनाए जा रहे है। नई संकर किस्म के बीजों से अन्न के उत्पादन में वृद्धि हुई है। बांध बनाने से सिंचाई का विकास हुआ है। खाद्यान्न की मांग सीमित है तो दूसरी तरफ सप्लाई बढ़ रही है। इससे कृषि उत्पादों के दाम विश्व बाजार में गिर रहे है और भारत में भी। ऐसे में सरकार को चाहिए था कि कृषि उत्पादों के घरेलू बाजार को संरक्षण देती और मूल्यों को कृत्रिम रूप से बढ़ाती, जिससे किसान अपना पेट भर सकते। ऊंचे मूल्यों से प्रेरित होकर किसान उत्पादन बढ़ाने को प्रेरित होते, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित होती। अमीर देशों ने अपनी खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए ही ऐसा किया है। वे अपने किसानों को भारी मात्रा में सब्सिडी दे रहे है, जिससे उनके किसान भारी मात्रा में उत्पादन कर रहे है। इस विशाल उत्पादन की खपत उनके देश में नहीं हो रही है, क्योंकि जनसंख्या सीमित है। इसलिए ये देश के कृषि उत्पादों को सब्सिडी देकर निर्यात कर रहे हैं।
  
  
   अमीर देशों की उत्पादन लागत ज्यादा आती है, फिर भी वे निर्यात कर रहे है। भारत में उत्पादन लागत कम आती है, पर हमें आयात करना पड़ रहा है। अमीर देशों की नीति न अपनाने का नतीजा है कि हमारे किसान आत्महत्या कर रहे है। इस परिप्रेक्ष्य में रिजर्व बैंक का कहना है कि कृषि की विकास दर बनाए रखने के लिए कृषि की बुनियादी सुविधाओं में सरकारी निवेश बढ़ाया जाए। यह नीति बिल्कुल ठीक है, बशर्ते बढ़े हुए उत्पादन का निर्यात कर दिया जाए। तब उत्पादन बढ़ने से हमारी खाद्य सुरक्षा बनेगी। साथ-साथ सरप्लस उत्पादन का निर्यात कर देने से घरेलू मूल्य उच्च बने रहेगे और हमारे किसान की आय बढ़ेगी। इसके लिए जरूरी है कि सरकार कृषि उत्पादों के निर्यात पर सब्सिडी दे। निर्यात सब्सिडी के अभाव में कृषि में निवेश का परिणाम विपरीत होता है। कृषि में निवेश से उत्पादन में वृद्धि होती है। इससे कृषि उत्पादों के मूल्य गिरते है। फलस्वरूप किसान की आय में गिरावट आती है और अधिक उत्पादन करने के बावजूद किसान आत्महत्या करने को मजबूर होते है। पिछले 60 वर्षो में बुनियादी सुविधाओं में बहुत निवेश हुआ है। इस निवेश के बावजूद हमें गेहूं, दाल एवं खाद्य तेल का आयात करना पड़ रहा है। इसका कारण मूल्यों में गिरावट है। निवेश से उत्पादन में जितनी वृद्धि हो रही है उससे ज्यादा कटौती मूल्यों के गिरने से हो रही है। सरकार को चाहिए कि रिजर्व बैंक के सुझाव के अनुरूप निवेश बढ़ाए, परंतु साथ-साथ अधिक उत्पादन का निर्यात करने की भी व्यवस्था करे। दुर्भाग्य है कि सरकार विपरीत दिशा में चल रही है। कृषि में निवेश कम किया जा रहा है और आयात को बढ़ाया जा रहा है।
 
 डा.भरत झुनझुनवाला