त्रिपुरा- सुभाषिनी अली सहगल

जब भी कहीं बम विस्फोट होता है या किसी आतंकवादी घटना की खबर आती है तो मरने वालों के शरीर के छितराए अंग, उनके परिवार वालों का असहनीय दु:ख और घायलों की दहशत भरी आंखें देखी नहीं जातीं। हर ऐसी घटना के बाद यह सुनने को मिलता है कि आगे ऐसा नहीं होने दिया जाएगा। यह दुर्भाग्य है कि आतंकी घटनाएं रोकने की बहस अक्सर ज्यादा सख्ती बरतने, सख्त कानूनों को पारित करने, मानवाधिकारों को ताक पर रखने की आवश्यकता के इर्द-गिर्द ही सिमट जाती है। दुनिया के अन्य हिस्सों या अपने ही देश के अंदर अगर इस समस्या से निबटने के लिए कोई सफल प्रयास किए गए है तो उन पर बहस बहुत कम होती है। त्रिपुरा देश के एक कोने में बसा एक छोटा सा राज्य है। वह चारों तरफ से बांग्लादेश से घिरा है और उसकी आबादी का 67 फीसदी हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे है। कुछ दिन पहले जनवादी महिला समिति की त्रिपुरा राज्य इकाई का सम्मेलन हुआ। किसी को भी यह जानकर आश्चर्य होगा कि आजादी के साठ साल बाद भी त्रिपुरा में रेलसेवा नहीं है। वहां से देश के किसी दूसरे हिस्से में जाने के लिए दो ही रास्ते है-या तो अगरतला से हवाई जहाज पकडि़ए या फिर असम के लिए बस पकड़िए, जो 24 घंटे से भी ज्यादा समय लगाती है। उत्तर-पूर्व के पूरे क्षेत्र की तरह त्रिपुरा को भी तरह-तरह के आतंकी संगठनों के हमलों का सामना करना पड़ा है।

   त्रिपुरा में विभिन्न आदिवासी समुदायों पर आधारित निजी सेनाएं और गुट पहाड़ियों और जंगलों में घूमते है, लोगों का फिरौती के लिए अपहरण करते है और जो उनका विरोध करता है या जिन संगठनों को वे पसंद नहीं करते उन्हे धमकी देते है और मार भी डालते रहे है। कुछ साल पहले तक यह समस्या इतनी विकट थी कि कई इलाकों में सरकार या प्रशासन के लोग पहुंच भी नहीं सकते थे, लेकिन पिछले तीन सालों में स्थिति में बहुत सुधार आया है। पूरे उत्तर-पूर्व में त्रिपुरा ही एक ऐसा राज्य था जहां आदिवासी-गैर आदिवासी एकता तब भी टूटी नहीं थी जब आतंकी गतिविधियां चरम पर थीं। त्रिपुरा में आतंकवादी गतिविधियों पर काबू पाने के लिए पहला और सबसे अधिक महत्वपूर्ण काम था जनता की एकता को बनाए रखने का अथक प्रयास, लेकिन इससे ही काम नहीं चल सकता था। आदिवासी जनता की अपनी ख्वाइशें, अपनी पहचान, संस्कृति और महत्वकांक्षाएं भी होती है। त्रिपुरा में आदिवासी इलाकों को स्वायत्त सत्ता सौंपी गई है। उनके अलग से चुनाव होते है और उनके विकास के लिए अलग से बजट भी होता है। पिछले चुनावों में इन इलाकों की सीटों पर 42 फीसदी आदिवासी महिलाएं जीत कर आई थीं। इन आदिवासी स्वायत्त समितियों ने बहुत सारे विकास कार्य किए है। अब दूर-दराज के इलाकों तक काफी सड़कें बन गई है, एक भी स्कूल पेड़ों के नीचे नहीं है, तमाम स्कूलों की अपनी पक्की इमारतें और बड़े खेल के मैदान है। त्रिपुरा जैसे पिछड़े और गरीब राज्य में अब साक्षरता की दर 82 फीसदी से कुछ अधिक है। हर तरह का पशु पालन, छोटे उद्योग, मछली के पोखरों के ठेके, उन मछलियों को बाजार में बेचने के लिए ट्रकों की खरीदारी, नगर पालिका के सफाई कार्यो का ठेका लेना आदि काम सफलतापूर्वक किए जा रहे है। त्रिपुरा के 4 जिलों में से तीन में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लागू है और इसके माध्यम से हजारों औरतों को जहां काम मिल रहा है वहीं विकास के कार्य भी तेजी के साथ किए जा रहे है।
  
  
   त्रिपुरा की आबादी 34 लाख है। अगर हम यह मानकर चलें कि इसमें 10 लाख बच्चे और बूढ़े होंगे तो फिर बचे 24 लाख लोगों में लगभग 12 लाख महिलाएं होंगी। त्रिपुरा की महिला समिति की सदस्य-संख्या 4.75 लाख है, जिसका मतलब है कि हर दूसरी या तीसरी महिला समिति की सदस्य है। घर और परिवार तक इस पहुंच का फायदा महिला समिति ने आतंकवादियों की घर-वापसी की योजना को सफल बनाने के लिए उठाया और पिछले पांच सालों में करीब 25000 आत्मसमर्पण हो चुके है। अब वे लोग भी अपना रास्ता बदल रहे है जो गलत राह पर चल पड़े थे। आतंकवादियों को घर वापसी के लिए प्रेरित करने का तरीका कितना सरल लगता है, लेकिन उसकी सफलता के लिए बहुत सारी चीजों का होना जरूरी है। सबसे अधिक जरूरी है एक ऐसी मजबूत राजनीतिक ताकत जो जनता की एकता कायम रखना ही अपना सबसे बड़ा काम समझती हो। विकास कार्यो को प्राथमिकता देने और ईमानदारी से बिना भेद-भाव काम करने से लोगों में असंतोष पैदा नहीं होता और वे एकजुट रहते है। त्रिपुरा के लोगों, विशेषकर महिलाओं ने विपरीत परिस्थितियों में जो कर दिखाया वह पूरे देश के लिए मिसाल है। उनकी कुर्बानियों ने उनके चारों तरफ शांति और खुशहाली पैदा कर दी है।
  
  
   (लेखिका लोकसभा की पूर्व सदस्य है)