ध्यान साधना

मानव जीवन में लक्ष्य प्राप्ति के लिए एकाग्रचित्त कर्मरत रहना अनिवार्य है। हर किसी को कार्य में अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करने की संतुष्टि का मार्ग तलाशना पड़ता है। कार्य सिद्धि को ही अपनी पूजा समझने वाले सफलता पाते है। कहा जाता है कि ब्रह्मसूत्र के रचनाकार पंडित वाचस्पति टीका लेखन में इतने तन्मय हो गए कि दूसरी ओर उनका ध्यान ही नहीं गया। विवाह के बाद उनकी पत्‍‌नी भोजन आदि की व्यवस्थाएं पूर्ण करती रहीं। ब्रह्मसूत्र टीका पूर्ण होने पर एक दिन प्रात: वाचस्पति जी ने उस प्रौढ़ महिला के विषय में जानना चाहा तो उसने संकोच में उत्तर दिया, मैं आपकी धर्मपत्नी हूं महाराज। पंडित जी आश्चर्य में पड़ गए। परिणय संबंध की उन्हे स्मृति हो आई। पत्नी का नाम पूछा। नाम 'धमती' जानकर उन्होंने अपनी टीका साधना का नाम ही 'धमती' रख दिया। लक्ष्य साधने के लिए महत्वाकांक्षा जगानी पड़ती है। लक्ष्य रहित ध्यान साधना से मन अस्थिर रहता है। ध्यान के लिए लक्ष्य-उद्देश्य आवश्यक है। सब कुछ भूलकर ध्यान मग्न रहकर अपनी कार्यसिद्धि के लिए तन्मय रहने का प्रतीक माला है। निरंतर प्रयास के अलावा सफलता के लिए दूसरा मार्ग नहीं है।

   एक बार आइन्सटीन प्रयोगशाला में किसी अनुसंधान में व्यस्त थे। इसी बीच भोजन का समय होने पर उनकी पत्नी मेज पर भोजन रखकर चली गईं। आइन्सटीन काम में इतने लीन रहे कि उनका एक मित्र उनसे मिलने आया और देर तक बैठा रहा। भूख लगने के कारण वह उनका भोजन करके चला गया। समस्या समाप्त होने पर भोजन का ध्यान आने पर आइंसटीन ने खाली बर्तन देखकर सोचा कि मैं भोजन कर चुका हूं,पर ध्यान नहीं रहा। वह फिर काम करने लगे। यही तन्मयता मनुष्य को ऊंचाई देती है। अनवरत साधना से अकल्पनीय और दुरूह कार्य में भी सफलता प्राप्त होती है। निष्ठा, लगन, और धैर्य ही ध्यान साधना के उपकरण हैं। दृष्टि रहित व्यक्ति लाठी के सहयोग से अपने गंतव्य-लक्ष्य पर पहुंच जाते है। वस्तुत: मानव ऊर्जा अंतर्दृष्टि से उत्पन्न होती है। यह वह शक्ति है जो स्वयं भीतर की गहराइयों से उपजती है। चुनौतियों से जूझते हुए उत्कृष्टता की ओर एकाग्रता ले जाती है।
  
   डा. हरिप्रसाद दुबे