विभाजन की भारी भूल

भारत में अंग्रेजी राज समाप्त होने के बाद सत्ता हस्तांतरण में की गई हड़बड़ी को याद कर रहे है डा.महीप सिंह 
 
ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्लासी की लड़ाई (1757) से लेकर द्वितीय सिख युद्ध तक कुल 92 वर्ष में लगभग संपूर्ण भारत को अपने अधिकार में ले लिया था। 1857 के सैनिक विद्रोह के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने महारानी विक्टोरिया के समय में इसे सीधे-सीधे अपने अधिकार में ले लिया और यह देश विशाल ब्रिटिश साम्राज्य का एक भाग बन गया। विदेशी राज का विरोध किसी न किसी रूप में यहां निरंतर चलता रहा। अंग्रेज भी जानते थे कि एक न एक दिन उन्हे इस देश को छोड़कर जाना होगा, इसलिए 19वीं शती के उत्तरा‌र्द्ध से ही कुछ पश्चिमी विद्वान यह सोचने लगे थे कि जब अंग्रेज भारत छोड़कर जाएंगे तो भारत का राजनीतिक भविष्य कैसा होगा? एक ब्रिटिश अधिकारी जान ब्राइट ने 1877 में यह विचार व्यक्त किया था कि अंग्रेजों के जाने के बाद यह देश पांच या छह राज्यों में बंट जाएगा। 1946 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लार्ड एटली ने जो कैबिनेट मिशन भारत भेजा था उसने भी इसे देश को तीन भागों का एक महासंघ बनाने की योजना दी थी।
 
   1971 के बाद जो रूप इस उपमहाद्वीप का बना वह भी तीन स्वतंत्र राज्यों-भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का बना। एक अन्य ब्रिटिश अधिकारी विल्फ्रेड सीवन ब्लंट ने 1883 में कलकत्ता में यह कहा था कि उत्तर भारत के सभी प्रांतों को मुस्लिम सरकार के अधीन और दक्षिण भारत के सभी प्रांतों को हिंदू शासन के नीचे दे देना चाहिए। सैनिक शक्ति के सहारे पूरे देश पर ब्रिटेन का नियंत्रण रहे। 1919 में भारत सरकार का अधिनियम पारित होने के पश्चात यह लगने लगा था कि अंग्रेज भारतीयों के हाथों में धीरे-धीरे सत्ता सौंपने के प्रति गंभीर है। प्रथम विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं से युद्ध में ब्रिटेन की सहायता करने का आग्रह किया और यह आश्वासन दिया कि युद्ध की समाप्ति पर भारतीयों को स्व-शासन में अधिक भागीदारी दी जाएगी, किंतु इस समय तक यह आशा किसी को नहीं थी कि अंग्रेज भारत को पूर्ण स्वतंत्रता देकर यहां से चले जाएंगे। देश का सबसे बड़ा राजनीतिक दल कांग्रेस भी औपनिवेशिक स्व-राज्य की ही मांग करता रहा था। 31 दिसंबर 1929 को नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में कांग्रेस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित हुआ। इस देश की राजनीति में चौथे दशक की कुछ बातें बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई, जैसे विभिन्न संप्रदायों को प्रतिनिधित्व देने वाली चुनाव प्रणाली यानी कम्युनल अवार्ड, ब्रिटिश संसद द्वारा पारित गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट, 1937 के प्रांतीय चुनाव और 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध का आरंभ। 1937 के चुनावों में अनेक प्रांतों में कांग्रेस को सफलता प्राप्त हुई थी। इन्हीं वर्षो में कांग्रेस और मुस्लिम लीग का आपसी विरोध भी अधिक बढ़ा। चौथे दशक के अंतिम वर्ष में प्रारंभ हुए विश्व युद्ध से संसार की बड़ी साम्राज्यवादी शक्तियों की उपनिवेशवादी नीति में परिवर्तन आना प्रारंभ हुआ। 1940 से लेकर 1947 तक के इतिहास में ब्रिटिश सरकार की इस दिशा में सक्रियता बहुत स्पष्ट दिखाई देती है कि किस प्रकार वे इस देश के लोगों को स्व-शासन देकर अपनी सत्ता को यहां से हटा लें। वे मानसिक रूप से यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि किसी प्रकार के आंदोलन (अहिंसात्मक या हिंसात्मक) के कारण उन्हे यहां से उखाड़ फेंका गया है। यही कारण है कि अंग्रेज सरकार ने 1942 में कांग्रेस द्वारा नियोजित 'भारत छोड़ो आंदोलन' को कठोर हाथों से दबा दिया था, किंतु वे दीवार पर लिखा पढ़ सकते थे। सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में गठित आजाद हिंद फौज का उदाहरण उनके सामने था। द्वितीय विश्व युद्ध में विंस्टन चर्चिल के प्रधानमंत्रित्व में ब्रिटेन की जीत अवश्य हुई थी, किंतु मित्र राष्ट्रों के मुखिया अमेरिका का ब्रिटेन पर यह दबाव बहुत बढ़ गया था कि उसे अति शीघ्र भारत को स्वतंत्र कर देना चाहिए। 1940 के बाद भारत में उत्पन्न हुई सांप्रदायिक समस्या, पाकिस्तान के रूप में एक पृथक मुस्लिम राज्य बनाए जाने की मांग और विभिन्न पक्षों की आपसी असहमति को लेकर अंग्रेजों की यह चिंता स्वाभाविक थी कि यदि उन्हे इस देश से अपना सत्ता हटानी है तो वे किस पक्ष को यह दायित्व सौंपे? ब्रिटेन की संसद के आम चुनाव में चर्चिल की कंजरवेटिव पार्टी पराजित हो गई और क्लीमेंट एटली के नेतृत्व में लेबर पार्टी सत्ता में आ गई। एटली भारत को स्वाधीनता देना चाहते थे। उस समय भारत के गवर्नर जनरल और वायसराय लार्ड वावेल ने अपनी लंदन यात्रा में एटली से कहा था कि भारत में ब्रिटिश शासन के सम्मुख दो ही रास्ते है-या तो भारत पर पूरी कठोरता से शासन किया जाए या जनता के प्रतिनिधियों को सत्ता सौंप दी जाए। 

   
   एटली का यह दृढ़ मत था कि हमें भारतीय हाथों में सत्ता सौंप देनी चाहिए। इस कार्य को संपन्न करने के लिए लार्ड एटली ने लार्ड वावेल के स्थान पर लार्ड माउंटबेटन की वायसराय के रूप में नियुक्ति कर दी। उन्हे विशेष रूप से कहा गया कि वे जून 1948 तक सत्ता एक-दो या अधिक पक्षों के हाथों में सौंप दें। माउंटबेटन ने 24 मार्च 1947 में दिल्ली पहुंचकर अपना ओहदा संभाला। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने उन्हे 15 महीने का समय दिया था, लेकिन माउंटबेटन को पता नहीं क्यों इतनी उतावली हुई कि उसने और अधिक समय मांगने के बजाय समयसीमा को 15 महीने से घटा कर 5 महीने से भी कम कर दिया और जून 1947 में घोषणा कर दी कि दो महीने बाद 15 अगस्त को ब्रिटिश सरकार इस देश से अपनी सत्ता समाप्त कर देगी और भारत और पाकिस्तान के रूप में दो देश अस्तित्व में आ जाएंगे। इस घोषणा से सारे देश में भयंकर हड़बड़ाहट पैदा हो गई। आखिरी समय तक सीमा के निकट रहने वाले बहुत से लोगों को यह पता नहीं लग सका कि उनका क्षेत्र भारत में रहेगा या पाकिस्तान में? यदि अंग्रेज सरकार ने कुछ संयम से कार्य किया होता और अपने नेताओं ने भी कुछ दूरदर्शिता दिखाई होती तो विभाजन की त्रासदी कुछ कम हो सकती थी। 

   (लेखक जाने-माने साहित्यकार है)