बदहाली से घिरा बचपन

हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने बाल श्रमिकों को मुक्त कराने और उनके पुनर्वास की दिशा में सरकारी प्रयासों पर असंतोष जताया है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की नवीनतम रिपोर्ट कहा गया है कि विश्व में पहली बार बाल मजदूरों की संख्या में ग्यारह फीसदी की कमी आई है,लेकिन भारत सहित एशिया प्रशांत क्षेत्र में यह कमी न के बराबर है। भारत सरकार समय-समय पर बाल श्रम उन्मूलन में प्रगति के दावे करती रही है,परंतु आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने 2001 की जनगणना के बाल श्रम संबंधी आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट पिछले दिनों नई दिल्ली में जारी की। इस रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान देश के सीमांत बाल श्रमिकों की संख्या में जहां 200 फीसदी की भारी वृद्धि हुई है वहीं लगभग 71 फीसदी बाल श्रमिक अभी भी स्कूल से दूर है।

   आईएलओ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पांच से चौदह वर्ष तक की आयु के सीमांत बाल श्रमिकों की संख्या 1991 में 2203208 थी, जो 2001 में 207.10 फीसदी बढ़कर 6987386 हो गई। विनिर्माण और मरम्मत ऐसे क्षेत्र है जहां 2006 के बाल श्रम के प्रतिबंध के बावजूद लाखों बच्चों को रोजगार में लगाया गया है। हम राज्यों की बात करे तो 5 से 14 वर्ष के सर्वाधिक बाल-श्रमिकों की भागीदारी मिजोरम में है। इस आयु वर्ग की सबसे कम भागीदारी लक्षद्वीप में है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि बाल श्रमिकों की आयु सीमा को 17 वर्ष तक बढ़ा दिया जाए तो सीमांत बाल श्रमिकों की संख्या 1.32 करोड़ पहुंच जाती है, जिनमें से मात्र 28.24 प्रतिशत बाल श्रमिक ही स्कूल तक पहुंच पाते है। बाल श्रम मानवता पर एक कलंक के तौर पर देखे जाने वाली विश्वव्यापी समस्या है। इसलिए भारत में बाल श्रम के उन्मूलन में सहयोग देने के लिए आईएलओ काफी सक्रिय है।
 
इसी दिशा में उत्तर प्रदेश के पांच जिलों-अलीगढ़, कानपुर, फिरोजाबाद, इलाहाबाद और मुरादाबाद में इंडस बाल परियोजना संचालित की जा रही है। इसके लिए राज्य को आईएलओ से दस करोड़ रुपए सालाना हासिल होते है, परंतु इन जिलों में बाल श्रम उन्मूलन संबंधित प्रयास कई प्रश्नों के घेरे में खड़े है। बतौर उदाहरण अलीगढ़ में 62 सेतु शिक्षा केंद्र है, जिसमें मध्यांतर के नाश्ते पर हर बच्चे पर पांच रुपए के हिसाब से खर्च करने होते है, लेकिन ऐसा होता नहीं। पैसे के घालमेल के साथ-साथ बाल श्रमिकों के संबंध में जारी किए गए आंकड़ों में भी अंतर पाया गया। इलाहाबाद में बाल-श्रमिकों की संख्या को लेकर श्रम महकमे और सर्वे रिपोर्ट के बीच कई विभेद सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार स्कूल न जाने वाले मजदूरों की संख्या 1526 है, जबकि वास्तविक संख्या 1935 पाई गई। इंडस बाल परियोजना के सर्वे के अनुसार फिरोजाबाद में सबसे अधिक बालश्रमिक 22318 पाए गए। यहां के 1200 में से 555 बच्चे दो साल में स्कूल ले जाए गए है। इस कार्यक्रम की अब तक की प्रगति रिपोर्ट को अगर देखा जाए तो सबसे बुरी स्थिति मुरादाबाद के बाल-श्रमिकों की है। यहां पाए गए 12420 किशोर और बाल मजदूरों में 10901 मजदूर स्कूल न जाने वाले मिले। पुनर्वास हेतु इनमें से 6750 को चुना गया, परंतु इंडेक्स कार्ड केवल 2548 बाल श्रमिकों के ही भरे गए। इन आंकड़ों को दरकिनार करते हुए अगर हम खुली आंखों से देखें तो ढाबों और घरों में काम करते हुए नन्हे बच्चे नजर आ ही जाएंगे। बाल श्रम एक ऐसी समस्या है जिसके संबंध में न जाने कितनी बार चर्चाएं की जा चुकी है और कानून का निर्माण करके इस समस्या के उन्मूलन के पुरजोर तरीके से प्रयास किए जा रहे है। फिर ऐसे क्या कारण है कि स्वतंत्रता के छह दशक बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस है? बाल श्रम की मूलभूत समस्या गरीबी है।

   गरीबी को तुरंत समाप्त करना तो नामुमकिन है, परंतु बाल श्रम को रोका जा सकता है। माता-पिता आर्थिक तंगी की स्थिति में अपने बच्चों को आय अर्जित करने के साधन के रूप में देखते हैं। इस समस्या से निपटने का रास्ता भी खोजा गया है-बाल श्रम से मुक्त कराए बच्चों को विशेष स्कूलों में भेजने की योजना के जरिए। इसमें किसी हद तक सफलता भी मिल रही है, परंतु अभी भी जिस चीज की सबसे अधिक जरूरत है वह है बाल श्रम उन्मूलन संबंधी कानूनों के समुचित अनुपालन की। इसके लिए प्रत्येक राज्य में ऐसी टीम बनाए जाने की आवश्कता है जो इस बात पर निगाह रख सके कि घरेलू या विभिन्न संस्थानों में बाल श्रमिक कार्यरत न हों। अगर ऐसा हो तो उनके नियोक्ताओं को तुरंत दंडित किया जाए। जब तक बाल श्रम को रोकने के लिए कठोर कदम नहीं उठाए जाएंगे और कागजों पर ही सारे कार्य चलते रहेगे तब तक नन्हे बच्चे जीविकोपार्जन के लिए अपनी उंगलियों को घायल करते रहेगे।
- डा.ऋतु सारस्वत