कट्टरता से लड़ने की राह

आतंकवाद के खिलाफ वातावरण बनाने में मुस्लिम बुद्धिजीवियों की भूमिका महत्वपूर्ण मान रहे है डा.महीप सिंह 

पिछले दिनों हैदराबाद में और फिर पाकिस्तान के दो नगरों-रावलपिंडी तथा इस्लामाबाद में हुए बम धमाकों ने ऐसा वातावरण उत्पन्न कर दिया है जिसमें अनेक देशों के मुस्लिम बुद्धिजीवी आतंकवाद और इस्लाम के संबंधों को लेकर विश्वव्यापी धारणाओं के स्पष्टीकरण के लिए प्रेरित हुए है। सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि इस्लाम की वहाबी धारा कट्टरता को बहुत प्रोत्साहित करती है और जेहाद के नाम पर संसार के विभिन्न भागों में जो आतंक फैलाया जाता है उसकी प्रेरणा इस विचारधारा से प्राप्त होती है। जमात-ए-इस्लामी हिंद के संरक्षण में प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक 'रेडियंस' में मैंने एक लेख 'ह्वाट इज वहाबिज्म' पढ़ा। इस लेख में लेखक खालिद कासमी ने इस विचारधारा के स्वरूप की व्याख्या की है।
 
  
दो सौ वर्ष पहले नज्द नामक अरब प्रदेश से मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब (1703-1792) ने इस्लाम के मूलभूत सिद्धांतों को लेकर एक आंदोलन प्रारंभ किया था। इसका उद्देश्य था कुरान और सुन्नाह की ओर मुसलमानों को मोड़ना और उन्हे गैर-इस्लामी रिवायतों के प्रति जागरूक करना। वहाबी आंदोलन अंधविश्वासों, कपोल-कल्पित कथाओं और इस्लाम को लेकर नई-नई अवधारणाओं का विरोधी था इसलिए उसे मुसलमानों के ही कुछ पक्षों का विरोध सहना पड़ा। आम मुस्लिम जनता में पीरों, फकीरों, औलियों और उनकी दरगाहों का बड़ा महत्व है। लाखों लोग इस दरगाहों की जियारत करते है और पीरों-औलियों से दुआएं मांगते हैं। वहाबी इसे पूरी तरह गैर-इस्लामी मानते है। उन्होंने अपने स्वच्छ मजहबी मान्यताओं को लेकर पीरों, फकीरों, सूफियों और उनकी दरगाहों पर जाकर सजदा करने वालों के प्रति आक्रामक रुख अपनाया और इसे कुफ्र तक घोषित कर दिया। मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने जेहाद की उस अवधारणा का कभी समर्थन नहीं किया जिस पर इन दिनों इस्लामी कट्टरपंथी इतने आग्रह से बोलते है। उनके लिखित दस्तावेजों और सभी ऐतिहासिक वक्तव्यों में इस्लाम की शुद्धता की चर्चा तो है, किंतु शहादत की परिकल्पना पर कोई चर्चा नहीं है। इस्लामी आतंकवाद में 'फिदायीन' की बहुत चर्चा होती है और कुछ कट्टरपंथियों द्वारा यह दावा किया जाता है कि जिस मकसद के लिए ये फिदायीन अपनी जान-कुर्बान करके आत्मघाती हमले करते है वह पूरी तरह इस्लामी परंपराओं के अनुरूप हैं।
  
  
दूसरी ओर कुछ इस्लामी विद्वान मानते है कि यदि शेख मुहम्मद होते तो कभी इसका समर्थन नहीं करते। कुरान के अनुसार अल्लाह ने जो जिंदगी दी है, आत्महत्या करके उसे नष्ट करना गुनाह है। इस लेख के लेखक खालिद कासमी का कहना है कि जिस ढंग से इस सुधारवादी आंदोलन का प्रसार हो रहा था उसने कुछ गलत फहमिया उत्पन्न कर दीं। परिणाम यह हुआ कि इसके विरोधी यह छवि बनाने में लग गए कि यह आंदोलन बहुत खतरनाक और विद्वेष फैलाने वाला है। संसार में यह माना जाने लगा कि वहाबी मुसलमान ही सभी प्रकार के आतंकवाद में भाग लेते है, किंतु जिन्होंने अब्दुल वहाब के लेखन का अध्ययन किया है वे जानते है कि उन्होंने दूसरे समुदायों के प्रति घृणा की शिक्षा नहीं दी। उनकी शिक्षाएं उन मुस्लिम संगठनों के एकदम विपरीत है जो राजनीतिक इस्लाम में विश्वास रखते है। सऊदी अरब के इस्लामी विद्वान शेख अब्दुल अजीज बिन बाज ने स्पष्ट रूप से यह कहा कि जो लोग इस्लाम के नाम पर लोगों की हत्याएं करते है वे वास्तव में आतंकवादी है। सऊदी अरब के एक अन्य प्रतिष्ठित विद्वान शेख मुहम्मद ओथिमीन का मानना है कि ये आतंकवादी किसी मुसलमान को इसलिए स्वीकार नहीं हैं, क्योंकि वे कुरान और सुन्नाह की हिदायतों को पूरी तरह नकारते है और इस्लाम की छवि को बहुत नुकसान पहुंचाते है। सऊदी अरब के वरिष्ठ उलेमाओं के संगठन ने कुछ समय पूर्व वहां एक सम्मेलन कर एख प्रस्ताव पारित किया, जिसके अनुसार निर्दोष लोगों की हत्या, संपत्ति की बर्बादी, लोगों को आतंकित करने का प्रयास मुसलमानों के लिए पूरी तरह वर्जित है। कुछ स्थानों पर ऐसे कर्म करने वालों के खिलाफ फतवे भी जारी हुए है। इस्लामी विद्वान अब यह स्वीकारने लगे है कि कुछ कट्टरपंथियों ने इस्लाम का अपहरण कर लिया है और वे अपने ढंग से इसे चलाना चाहते है। ओसामा और जवाहरी जैसे लोगों की नजर में फिदायीन हमले उस जेहाद का एक भाग है जो उनके अनुसार कुरान और सुन्नाह की हिदायतों के अनुसार हैं। इस्लामी संसार में यह अंतर्विरोध क्यों है? इस अंतर्विरोध का ही परिणाम है कि जिस दिन लादेन का कोई नया वीडियो टेप प्रदर्शित होता है, सारे संसार में हड़कंप सा मच जाता है।
  

   अपने नए टेप में ओसामा ने फिर अमेरिका के विरुद्ध व्यापक हिंसा की धमकियां दी है। इस टेप में उसने एक बड़ी हास्यास्पद बात भी कही है कि यदि अमेरिका इस्लामी कोप से बचना चाहता है तो उसे इस्लाम स्वीकार का लेना चाहिए। क्या उसके कथन से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस्लाम के प्रचार में हत्याओं और धमकियों की बहुत बड़ी भूमिका है? सही दिशा में सोचने वाले मुसलमान बुद्धिजीवी अपनी सीमित शक्ति से यह बात कितने ही तर्क पूर्ण ढंग से कहे कि ओसामा जैसे लोगों की कही हुई बातें इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार नहीं है, किंतु इस्लाम की छवि तो ओसामा जैसे लोग ही बना रहे है। इस स्थिति में मुसलमान बुद्धिजीवियों की भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। जो कार्य आतंकी और कथित जेहादी कर रहे है वह इस्लाम की भावना के अनुकूल नहीं, वह इस्लाम को लांछित करती हैं और घृणित गतिविधियों में लगे आतंकी संगठन इस्लाम का प्रतिनिधित्व नहीं करते, इस बात को प्रभावशाली ढंग से उभरना चाहिए। यह बात भी पूरे मुस्लिम समाज के सामने आनी चाहिए कि ऐसी गतिविधियों से आम मुसलमान का कोई हित साधन नहीं होता, बल्कि वे पीड़ित होते हैं।