विचित्र मोड़ पर राजनीति

परमाणु करार पर विवाद के कारण नए राजनीतिक समीकरण बनते देख रहे है मोहन सिंह

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के तीन वर्ष बीतते-बीतते उसे बाहर से समर्थन देने वाले वामपंथी दलों में बेचैनी होनी शुरू हो गई। उन्होंने सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता पर काबिज होने से रोकने के लिए ही संप्रग को समर्थन दिया था। हालांकि जिन तीन राज्यों में वामपंथियों का जनाधार है वहां कथित सांप्रदायिक दल उनके लिए कभी चुनौती खड़ी नहीं कर पाए। उन राज्यों में वामपंथियों ने कांग्रेस को ही सांप्रदायिकता के रंग में रंगा हुआ घोषित कर रखा है। 1959 में कामरेड नंबूदरीपाद के नेतृत्व वाली केरल की कम्युनिस्ट सरकार भंग कर दी गई थी। तभी से कांग्रेस के प्रति माकपा के नेताओं का नजरिया काफी तल्ख है, जबकि रूस के प्रभाव में भाकपा कांग्रेस के प्रति नरम रहती थी। बाद में भाकपा ने अपनी भूल स्वीकार की और माकपा के साथ गठबंधन का दौर शुरू हुआ।

   पिछले आम चुनाव के बाद माकपा ने अपने दीर्घ गैर-कांग्रेसी राजनीतिक इतिहास के बावजूद आनन-फानन में कांग्रेसनीत संप्रग को समर्थन दे दिया। कितनी अजीब बात है कि माकपा का दिल्ली में स्थापित नेतृत्व अमेरिकी पूंजीवाद को विश्व का सबसे बड़ा खतरा मानकर अखबारों में वक्तव्य देता है, लेकिन उसी के समर्थन से चल रही सरकार के प्रधानमंत्री ने जुलाई 2005 में अमेरिका जाकर परमाणु ऊर्जा सहयोग करार कर लिया। ऐसा पहली बार हुआ कि प्रधानमंत्री ने इतना बड़ा फैसला अकेले ही कर डाला। फैसले में भारत के विदेश मंत्री को भी साझीदार नहीं बनाया गया। प्रधानमंत्री ने सहयोगी दलों के नेताओं को करार के बारे में बाद में सूचित किया। संसद में इस मुद्दे पर दो बार धमाकेदार बहस हुई। दोनों बार वाम दलों के तेवर ढीले थे। अमेरिकी दूतावास ने करार का विरोध करने वाले एक राज्य के मुख्यमंत्री की आलोचना की तो भारत के विदेश मंत्रालय और स्वयं प्रधानमंत्री ने अमेरिकी राजदूत को कड़ी फटकार लगाई, किंतु इस करार के शिल्पी कहे जाने वाले अमेरिका में भारत के राजदूत रोनेन सेन ने जब इस करार का विरोध करने वाले भारतीय नेताओं के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणी की तो इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री आश्चर्यजनक रूप से चुप्पी साध गए। ऐसा लगता है कि विगत तीन वर्षो के वामपंथी नेतृत्व के उबाऊ अवरोधों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव के समय इनकी बयानबाजियों से तंग कांग्रेस नेतृत्व उनसे राजनीतिक हिसाब चुकता कर लेना चाहता है। इसी दौरान एक विचित्र घटनाक्रम में बाला ठाकरे का अभिनंदन करने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री गए। इसके बाद शिवसेना ने परमाणु समझौते को खुला समर्थन दे दिया। बसपा के समर्थन को अपनी झोली में डालने के बाद संप्रग नेतृत्व फारुक अब्दुल्ला, मुफ्ती मुहम्मद सईद और अजित सिंह आदि के सहयोग से अपने बहुमत के बारे में आश्वस्त है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री की दूसरी कतार की टोली ने दिसंबर में ही चुनाव कराने का शगूफा छोड़कर वामपंथियों को दबाव में ला दिया।

   भारतीय समाचार पत्र और न्यूज चैनल इसे संप्रग का राजनीतिक संकट घोषित कर रहे हैं। वस्तुत: यह वामपंथ का संकट है। उसका नया नेतृत्व संकट खड़ा कर देता है, लेकिन समाधान का रास्ता भूल जाता है। संविधान का अनुच्छेद 363 सरकार द्वारा किए गए करारों से उत्पन्न किसी भी विवाद के लिए न्यायालय तक के अधिकार को वर्जित करता है। सभी अंतरराष्ट्रीय संधियां सरकार करती है, जिसके लिए संसदीय अनुमोदन की जरूरत नहीं होती। 1971 में बांग्लादेश की आजादी से पहले भारत सरकार ने रूस के साथ संधि की थी। भारत की विपक्षी पार्टियों ने करार की कड़ी आलोचना की। उस दौर में वामपंथी और समाजवादियों का मोर्चा था। भारतीय कम्युनिस्ट इस करार का ढिंढोरा पीट रहे थे। समाजवादी इसके विरोध में खड़े हो गए। इस कारण माकपा ने समाजवादियों से रिश्ते तोड़ लिए। 1977 में जनता पार्टी की सरकार के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चीन गए। 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद भारतीय विदेश मंत्री की यह पहली चीन यात्रा थी। जनता पार्टी के कई नेताओं ने उनकी यात्रा का विरोध किया, किंतु सहयोगी माकपा नेतृत्व ने इसका स्वागत किया। प्रधानमंत्री की हैसियत से वाजपेयी फिर चीन गए। उन्होंने 'एक चीन' सिद्धांत को मान्यता दी तथा नाथुला के रास्ते व्यापार खोलने के करार पर हस्ताक्षर किए। वामपंथी मित्रों ने इस पहल को राष्ट्र-हित में घोषित कर दिया। अमेरिका के दबाव के बावजूद इराक में भारत की पलटन नहीं गई और भारत की संसद ने प्रस्ताव पास कर इराक पर अमेरिकी आक्रमण का विरोध किया। इसके विपरीत अमेरिका ने इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के खिलाफ झूठा मुकदमा चलाकर रमजान के पाक महीने में फांसी पर लटका दिया। भारत सरकार ने इसका विरोध करने के बजाय चुप्पी साध ली।
 
  
   पेट्रोलियम मंत्री के रूप में जब मणिशंकर अय्यर ईरान जाकर भारत के साथ गैस पाइपलाइन लाने का प्रयास कर रहे थे तब अमेरिका के प्रभाव में आकर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में भारत ने ईरान के खिलाफ वोट दिया। अमेरिका के इशारे पर मणिशंकर अय्यर का विभाग बदल दिया गया और अमेरिका समर्थक भारत के संसदीय मंच के अध्यक्ष को पेट्रोलियम मंत्री बना दिया गया। परिणामस्वरूप ईरान के साथ पाइपलाइन परियोजना ठप हो गई। ऐसे अनेक अवसर हैं जब भारत अमेरिका के समक्ष नतमस्तक होता नजर आया। अभी-अभी अमेरिका के साथ सैन्य इतिहास का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास समाप्त हुआ है। राजनीतिक अर्थ में कहे तो यह संप्रग का वामपंथ के साथ युद्धाभ्यास था। अमेरिकी संविधान वहां के राष्ट्रपति को इस बात की अनुमति नहीं देता कि वह किसी देश के साथ कैसा भी करार कर लें। अमेरिकी कांग्रेस से अनुमोदन के बाद ही कोई करार लागू होता है। जुलाई 2005 में समझौते के समय अमेरिकी कांग्रेस में 23 सांसदों ने यह कहकर इस करार का विरोध किया था कि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए ईधन की आपूर्ति से संबंधित प्रतिबंध न हटाए जाएं। सांसदों की चिंता के निवारण के लिए दिसंबर 2006 में हाइड एक्ट पारित कर अमेरिकी सरकार ने तय किया कि भारत के परमाणु रिएक्टर अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी की निगरानी में होंगे और जैसे ही भारत परमाणु ईधन का उपयोग नागरिक सुविधाओं के बजाय रक्षा तैयारी के लिए करेगा उसे दिया हुआ ईधन वापस ले लिया जाएगा। अमेरिका में नवंबर में राष्ट्रपति पद का चुनाव है।
  
   जनवरी 2008 में अमेरिका में नया राष्ट्रपति चुना जाएगा। अत: इस करार को अमली जामा फरवरी 2008 में अमेरिकी अनुमोदन के बाद ही पहनाया जाएगा। अभी भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और दुनिया के 45 परमाणु ईधन आपूर्तिकर्ता देशों से स्वीकृति लेनी है। दरअसल एशिया के सामरिक शक्ति संतुलन को दुरुस्त करने के लिए अमेरिका भारत और जापान को सामरिक साझीदार बनाने का पक्षधर है। यह करार उसी दिशा में पहल है। इससे चीन, म्यांमार, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया परेशानी महसूस कर रहे हैं। किसी देश की विदेश नीति का मूल आधार उस देश का राष्ट्रीय हित है। कहीं भारत अपनी परंपरागत नीति को झटका देकर अमेरिका के खूंटे में तो नहीं बंध रहा है? ऐसे में भारतीय वामपंथ की भी सोच पूर्ण निरपेक्ष नहीं रही। वह भी तो अमेरिका विरोधी खेमे में लामबंद होने के पैरोकार रहे हैं। अभी भी जरूरत है गुट निरपेक्ष आंदोलन की।