तो बात अयोध्या तक जाएगी!

 बात निकली है तो दूर तलक जाएगी !  केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को दायर हलफनामे में एक तरह से कह दिया है कि 'न राम रहे न रावन्ना, तुलसीदास गढ़ दीन्हीं पोथन्ना।'  इस स्वीकारोक्ति के बाद क्या अब यह मान लिया जाए कि राष्ट्रीय राजनीति में बवंडर लाने वाले अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो गया? क्या हम यह भी मान लें कि जिस विवाद ने देश के सामाजिक सरोकार बदल दिए थे, वह इस मायने में निरर्थक था कि उसके पात्रों ने तो कभी जन्म ही नहीं लिया.. और जब राम जन्मे ही नहीं तो काहे का राम जन्मभूमि विवाद।
जब रामायण के पात्र ही काल्पनिक हैं तो अयोध्या की सीता रसोई भी कल्पना के धनी किसी कवि का कमाल ही माना जाए। फिर यह भी मान लिया जाए कि लखनऊ को लक्ष्मण ने नहीं, किसी और ने बसाया था। चित्रकूट और विंध्याचल से लेकर रामेश्वरम तक फैली राम की कथा यदि इतिहास की परिधि में नहीं आती तो दोषी अंग्रेजों द्वारा लिखा गया इतिहास और इतिहासकार हैं या राम। क्या करेंगे आप उस लोक और उस मानस का जो अपने बच्चों को राम, लक्ष्मण नाम देता है, जिसने सीता के अयोध्या से निष्कासन के लिए राम को क्षमा नहीं किया। तुलसी कृत मानस तो उत्तर भारत के जनजीवन का हिस्सा है और रामकथा भारत की अधिसंख्य आबादी का जीवन दर्शन है।

   और फिर राम ही क्यों? ऐतिहासिकता के जिस तर्क के सहारे केंद्र ने रामायण के पात्रों को खारिज किया है, वह कृष्ण पर भी तो लागू हो सकती है। इतिहास की किताबों में रास रचाने वाले कन्हैया का भी उल्लेख नहीं है, महाभारत भी प्रामाणिक नहीं है। इतिहास तो वहां भी नहीं पहुंच पाता। अब यह बात अलग है कि द्वारिकाधीश की द्वारिका की तलाश समुद्रवेत्ता कर रहे हैं। यह भी दिलचस्प है कि राम को नकारने वाली केंद्र सरकार द्वारिका की खोज समुद्र के नीचे करा रही है और दूसरी ओर इलाहाबाद हाईकोर्ट गीता को राष्ट्रीय धर्मशास्त्र घोषित करने का सुझाव दे रहा है।

   वास्तव में केंद्र सरकार ने रामायण के पात्रों की ऐतिहासिकता पर सवाल उठाकर मुद्दों की तलाश में भटक रही भारतीय जनता पार्टी की अनजाने ही बड़ी मदद कर दी है। अक्सर वैज्ञानिक इसीलिए नास्तिक होते हैं क्योंकि वे हर बात को तथ्य की कसौटी पर कसते हैं। यही काम एएसआई ने भी किया। लेकिन कहावत है, 'वह सत्य बोलो जो प्रिय हो।' भारतीय मानस में राम हर तर्क, हर कसौटी से परे हैं इसलिए बात सिर्फ रामसेतु या सेतुसमुद्रम तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि इसके आगे भी जा सकती है।

आस्था न तोलिए विज्ञान के तराज़ू पर

इन पर सवालिया निशान लगाना ऐसा ही जैसे यह कहना कि हवा का रंग क्या होता है? या ख़ुशबू का आकार कैसा है?