सरकार को फिर आई संस्कृत की याद

 रोजमर्रा की जिंदगी में तमाम तरह के तनावों व कई बीमारियों से निजात पाने के लिए लोगों के योग शिक्षा की तरफ भागता देख सरकार को फिर संस्कृत की याद आई है। वजह-योग दर्शन की सारी जानकारी संस्कृत साहित्य में ही है। इतना ही नहीं, ज्ञान-विज्ञान की भी बहुत से बातें संस्कृत में उपलब्ध है। मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने इन स्थितियों को महसूस करते हुए ही संस्कृत में शोध पर खास जोर दिया है।

   राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के दूसरे दीक्षांत समारोह में उन्होंने कहा कि संस्कृत भारत को ही नहीं, बल्कि विश्व को एक सूत्र में बांधने की ताकत रखती है। फ्रांस, जर्मनी, जापान, पोलैंड, इंग्लैंड, अमेरिका, इटली, रूस और थाईलैंड जैसे देशों में भी आज संस्कृत भाषा में अध्ययन किए जा रहे हैं। बौद्ध, जैन आदि के भी कई दर्शन संस्कृत में लिखे गए। मौजूदा दौर में भागदौड़ की जिंदगी, तनावों व बीमारियों से निजात के लिए देश-विदेश में लोग योग की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। जबकि योग दर्शन की सारी जानकारी संस्कृत साहित्य में ही है। ज्ञान-विज्ञान की भी बहुत सी जानकारियां इसी भाषा में है। लिहाजा संस्कृत विश्वविद्यालयों को शोध पर खास जोर देना देना चाहिए। खासकर उन विषयों पर जो अभी तक अछूते हैं।

   इस मौके पर उन्होंने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के लखनऊ परिसर स्थित केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ में छात्र-छात्राओं के लिए नवनिर्मित छात्रावासों और कर्मचारियों व शिक्षकों के लिए बने आवासीय भवनों का भी उद्घाटन किया। समारोह के दौरान लगभग 1200 छात्रों को स्नातक की उपाधि दी गई, जबकि मुसलिम समुदाय के उन बच्चों ने कार्यक्रम में भाग लिया, जो संस्कृत भाषा का अध्ययन कर रहे हैं। मालूम हो कि संस्कृत सीखने के इच्छुक अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों के लिए संस्थान ने अनौपचारिक संस्कृत शिक्षा कार्यक्रम शुरू किया है। कार्यक्रम के तहत संस्थान मदरसों को तीन-तीन महीने के लिए संस्कृत पढ़ाने वाले शिक्षकों को उपलब्ध कराता है।

   सिंह ने कहा कि केंद्र संस्कृत बोर्ड के बजाय राष्ट्रीय संस्कृत परिषद का गठन किया गया है। परिषद ही संस्कृत भाषा को संरक्षण, प्रोत्साहन व विकास के लिए सारे कार्य करेगी। समारोह में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के कुलपति प्रो. वी, कुटुंब शास्त्री के अलावा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के चेयरमैन प्रो. सुखदेव थोरात भी मौजूद थे। थोरात ने कहा, 'संस्कृत के ज्ञान के बिना भारत की संस्कृति और विरासत को समझा ही नहीं जा सकता'।