मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा

वेद वैश्विक ज्ञान गंगा के उत्स (स्रोत) है। अखण्ड, अनंत, अपरिमित ज्ञान का वह बोध, जिसको तपस्वी मनीषियों द्वारा हृदयंगम किया गया वेद कहलाए। इसलिए वेद अलौकिक है और विराट सत्ता के प्रकाश का ्रद्योतक है। ईश्वर का प्रकाश कभी विभक्त नहीं होता, वह सर्वव्यापी है और सर्वहितकारी है। वेदों की वाणी में मानव कल्याण की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। वैसे सम्पूर्ण भारतीय वैचारिकी मानव मूल्यों पर आधारित है लेकिन उनकी प्रेरणा वेद ही रहे है।
वेदों का 'ऋत सिद्धान्त' मानवीय उत्पत्ति और चारित्रिक श्रेष्ठता का वाहक है। इसलिए ऋग्वेद में ऋषि कामना करते है कि प्रभु हमें ऐसी प्रेरणा प्रदान करो, जिससे हमारा मन कल्याण मार्ग का अनुगमन करे। इसके साथ-साथ वेदों में मानव आचार- विचार की शुद्धता और लोक मंगल स्वरूप पर विशेष बल दिया गया है। इसलिए ऋग्वेद में सात मर्यादाओं और सात अमर्यादाओं का उल्लेख किया गया है। भारतीय संस्कृति जड़वादी कभी नहीं रही, वह गतिमय है। इसी गति में समाज का कोई अंग पीछे न रह जाए, सबका समान विकास हो, कोई सुविधाओं से वंचित न रह जाए, इसका दायित्व वेद समाज के प्रबुद्ध वर्ग को सौंपते है। ऋषि कहते है कि हे! ज्ञानी जनों तुम पतित लोगों को ऊपर उठाओ, जिसका जीवन पाप कर्म से मलिन हो गया है,उन्हे प्रेमपूर्वक श्रेष्ठता के मार्ग पर लाओ।
   वेद साधक के मन में यह भाव उत्पन्न करने का प्रयास करते हैं कि ज्ञान, क्षमता और चारित्रिक गुणों को एक स्थान पर व्यक्ति तक सीमित नहीं होने चाहिए। उनका सर्वव्यापी होना आवश्यक है। दिव्य शक्ति के प्रभाव से हमें जो विशिष्टता प्राप्त होती है, वह हमारे अहंकार वृद्धि का कारण नहीं बननी चाहिए अपितु वह प्राणिमात्र के हित में संलग्न होनी चाहिए।
  
   इसलिए ऋषि कहते हैं कि जिस प्रकार ईश्वर सबको प्रकाश प्रदान करता है, उसमें कोई भेद नहीं होता, उसी प्रकार प्रभु आपने मुझे जो ज्ञान का प्रकाश प्रदान किया है, उसमें सम्पूर्ण प्राणी जगत के हित में प्रयोग करूं और उसे और फैलाऊँ। ऋग्वेद में ऋषि प्रार्थना करते हैं कि हे! प्रकाश स्वरूप परमेश्वर जैसा तू सबको जीवन और ज्ञान देता है, मैं भी सभी लोगों को जीवन-ज्ञान ज्योति देने वाला बनूं, मेरी यही आराधना है।
  
   मानव में ईश्वरत्व की खोज भारतीय दर्शन की विशिष्टता है। वैदिक दृष्टि से परम सत्ता सर्वव्यापी और सार्वभौमिक है। वह प्रत्येक जड़ चेतन में है। अत: प्रत्येक प्राणी ईश्वरीय अंश की मूर्ति है। इसलिए ऋषि आह्वान करते है कि परस्पर सेवाभाव से तुम सबके साथ मिलकर पुरुषार्थ करो। उत्तम ज्ञान प्राप्त करो। समान नेता की आज्ञा में कार्य करने वाले बनो। दृढ़ संकल्प और आत्म विश्वास के साथ कार्य करो। इस पवित्र मन से यह संदेश मिलता है कि समग्र मानवता के प्रति उत्तरदायित्व पूर्ण संवेदना भाव जागृत हो और बिना किसी अहंकार के सामूहिक कल्याण में सहभागी बनें। यथार्थ यह है कि वेदों में आध्यात्मिक भूमिका पर मानवतावादी आदर्श ईश्वर से मनुष्य की ओर उन्मुख हुआ है। माना गया कि ईश्वरीय शक्ति का आलोक लौकिक आचरण की शुद्धता से ही प्राप्त होगा। इसलिए सामाजिक संगठन की विशेष आवश्यकता है। आपसी वैचारिक टकराव कल्याण मार्ग में बाधा बन सकते है।
  
   अत: लोक व्यवहार में मनुष्य एकमत हो। जो भी कार्य करे, वह सामाजिक विघटन के लिए न होकर एकता के लिए हो। वेदों में यह कामना भी की गई है कि तुम सब संगठन की शक्ति से युक्त हो जाओ। स्वयं को वैचारिक भिन्नता में विभाजित मत करो। वैदिक चिन्तन में लोक कल्याण प्रधान तत्व है। मानवीय संवेदना और सात्विक आदर्शो के धरातल पर ही आध्यात्मिकता का वृक्ष अंकुरित हो सकता है। हम सभी प्राणियों से प्रेम करें और सभी हम से प्रेम करे, ऐसी व्यवस्था विकसित करें यहां तक कि पशुओं को भी हम से प्रेम हो, हमें देखकर वे भी भयभीत न हों। सम्भवत: मानवीय आचरण के सर्व हितकारी स्वरूप की अभिव्यंजना जो वेदों में है वह अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। वेदों में सर्वमंगलकारी व्यवहार को ही ईश्वरीय उपासना का अंग बताया गया है। ऋषि प्रार्थना करते है कि विश्व के समस्त प्राणी जिनमें पशु भी हैं, उनका कल्याण हो। हम परमात्मा में मानव को खोजें और मानव में परमात्मा को। घृणारहित होकर सबसे समान व्यवहार करे। यह आध्यात्मिक श्रेष्ठता का सोपान है।
  
   स्वामी चक्रपाणि