स्वस्ति वाचन का विज्ञान:विज्ञानसम्मत रही है मनीषियों की हर पहल

हमारे देश की यह प्राचीन परंपरा रही है कि जब कभी भी हम कोई कार्य प्रारंभ करते है, तो उस समय मंगल की कामना करते है और सबसे पहले मंगल मूर्ति गणेश की अभ्यर्थना करते है। इसके लिए दो नाम हमारे सामने आते हैं-पहला श्रीगणेश और दूसरा जय गणेश।
 श्रीगणेश का अर्थ होता है कि जब हम किसी कार्य को आरंभ करते है तो इसी नाम के साथ उस कार्य की शुरुआत करते है। जय गणेश का अर्थ होता है कि अब यह कार्य यहां समाप्त हो रहा है। प्राचीनकाल से ही वैदिक मंत्रों में जितनी ऋचाएं आई है, विवाह मण्डप पर हम जो स्वस्ति वाचन करते है, शगुन और तिलक में भी इसकी प्रथा है, या फिर जब कभी भी हम कोई मांगलिक कार्य करते है तो स्वस्तिवाचन की परंपरा रही है। यह एक गहरा विज्ञान है, जिसे समझने की आवश्यकता है।
 
 यदि हम केवल मंगल वचन का प्रयोग करे और मांगलिक शब्दों का प्रयोग उसके अर्थ को बगैर जाने हुए करे तो निश्चय ही यह हमारा अंधविश्वास माना जाएगा। मेरा मानना है कि जब तक धर्म को तथा उसके विज्ञान को हम समझ न लें, तब तक केवल अंधविश्वासी होकर उसकी सभी बातों को मानने का कोई औचित्य नहीं है। हमारा धर्म, हमारी संस्कृति,वैदिक ऋचाएं, वैदिक मंत्र, पुराण उपनिषद आदि इन सभी ग्रन्थों के पीछे एक बहुत बड़ा विज्ञान है। हमारे ऋषियों ने जिन वैदिक ऋचाओं और पुराणों की कल्पना की, उपनिषदों के बारे में सोचा था फिर मांगलिक कार्यो के लिए जैसी व्यवस्था की, वह हमारे विज्ञान से किसी भी तरह से अलग नहीं है। उनके द्वारा सोची और की जाने वाली हर एक पहल हमेशा से ही विज्ञान के साथ रही है। इनमें से यदि एक भी बात अवैज्ञानिक हो जाती है तो हमारा जो चिंतन है, हमारी संस्कृति की जो पुकार है, वह बता देगी कि यह बात गलत है और इसे हमें नहीं मानना चाहिए।
 
 विदेशी ग्रन्थों को जब आप पढ़ेंगे तो पाएंगे कि शेक्सपियर की लगभग सभी रचनाएं एवं नाटक दुखांत ही रहे। लेकिन हमारे भारतीय नाटककारों ने इस बात का निषेध किया। उनकी मान्यता यह रही कि जितने भी शास्त्र हम लिखें या पढ़ें, उनका परिणाम सुखान्त या शुभ ही होना चाहिए। इसलिए यदि हमारे जीवन में हजारों कठिनाइया भी आएं लेकिन उनका परिणाम शुभ या सुखांत होगा तो हम सभी उसे पसंद करेगे। सुखांत नाटकों को पसंद करने की हमारी परंपरा रही है, लेकिन विदेशों में इसे स्वीकार नहीं किया जाता है। विदेशों में भी लोग मांगलिक कार्य करने का विधान अपनाते है, चाहे वे इसके महत्व और अर्थ को समझें अथवा न समझें।
 
 दक्षिण अफ्रीका में बसे एक हिंदू परिवार के विवाह समारोह में जब मैं गया तो मैंने देखा कि बहुत से लोग वहां एकत्र हुए। एक चारपाई निकाली गई और उस पर लाल चादर बिछाई गई। इसके बाद उस पर एक लाल कपड़े में लिपटी एक पुस्तक रखी गई। इसके पश्चात भावी पति-पत्‍‌नी को उस पलंग पर बिठाया गया। तत्पश्चात सभी लोग भावी पति-पत्‍‌नी पर अक्षत फेंकते हुए 'सररम-सररम' का उच्चारण करने लगे। मैंने आश्चर्यचकित होकर अपने पास खड़े मित्र से पूछा कि ये लोग क्या कह रहे है? उन्होंने बताया कि जिस प्रकार भारत में सीताराम कहा जाता है, उसी प्रकार ये लोग 'सररम-सररम' कह रहे है।
 
 इसी प्रकार एक घटना न्यूयार्क की है। वहां लगभग 20 वर्षो से बसे हिंदू परिवार ने भारत से लाई गई मिट्टी के एक ढेले को अपने पूजा के कमरे में रखा था। जब भी इस परिवार का कोई सदस्य भारत जाता तो वहां से गंगा जल भी लेकर आता और उसी से अपने सभी पूजा-पाठ से संबंधित कार्य करता था। मांगलिक कार्यो में स्वस्ति वाचन केवल यज्ञ में ही नहीं बल्कि हमारे जीवन के हर एक पहलू में इस प्रकार की मंगल कामना की प्रथा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। विवाह की परंपरा हमारे देश में प्राचीन काल से चली आ रही है, यह कोई साधारण बात नहीं है, बल्कि यह तो दो हृदयों के मिलन का महोत्सव होता था। वह आयोजन तो कोई त्योहार जैसा होता था, जिसमें हमलोग एक-दूसरे से मिलते थे, और आपस में प्रेम-भाव का प्रदर्शन करते थे।
 
   हमने अंग्रेजों से उनके काम करने का तरीका सीखा, साथ ही कुछ बुरी बातें भी हमने उनसे सीख ली है। लेकिन अंग्रेजों की जो कार्य संस्कृति और व्यवस्था थी, उसे हमने अभी तक नहीं सीखा है। इसका परिणाम यह हुआ कि हम विदेशी परम्परा को पूर्ण रूप से तो सीख नहीं सके मगर अपनी संस्कृति को अवश्य भुला बैठे है। प्राचीनकाल के पत्रों में पत्र पाने वाले का नाम कुछ विश्लेषणों के साथ लिखा जाता था, जैसे स्वस्तिक श्री उपमहायोग्य, भाग्य मर्यादा 108, श्री रामबाबूजी अथवा अन्य कोई नाम। साधारण मनुष्य के नाम से पहले हम 108 लगाते है लेकिन किसी संत महात्मा के नाम से पहले 1008 लगाया जाता है। स्वास्तिक का अर्थ होता है कि मैं आपकी मंगल कामना करता हूं। 108 का अर्थ होता है कि 24 अक्षरों का गायत्री मंत्र में चार से गुणा करके हमारे जो 12 नक्षत्र है उन्हे जोड़ देना। इस प्रकार हमें 108 अंक प्राप्त होता है। 108 अंक तमाम शुभ संकल्पों का एक युग्मक है। इसलिए हम किसी भी मंत्र के जाप या कोई मांगलिक कार्य 108 जैसे शुभ अंकों के साथ अथवा इतनी ही बार करते है। इसके बाद श्री-श्री का अर्थ होता है श्रेय, अर्थात् आपके जीवन में श्रेय की उत्पत्ति हो।
  
   यश की उत्पत्ति हो,आपकी यश और कीर्ति बढ़े। नाम भी कुछ ऐसा हो जिससे परमात्मा का आभास हो। क्या आप जानते है कि अजामिल ने तो अपने पुत्र का नाम लेते-लेते मोक्ष की प्राप्ति की थी। परमात्मा ने कहा कि जो व्यक्ति मेरा नाम दिन में हजारों बार लेता हो, उस व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिलेगा तो फिर कौन होगा मोक्ष का हकदार? क्योंकि अजामिल के पुत्र का नाम था-नारायण। वह प्रत्येक दिन लगभग सौ बार अपने बेटे का नाम तो ले ही लेता था।
  
   श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लिखा है-
  
   भायँ कुभायँ अनख आलसहूं।
   नाम जपत मंगल दिसि दसहूं॥
  
   हम तो नामों को श्रद्धावाचक और गुण वाचक बनाते है, ताकि हमारे जीवन में वैसे ही गुण आ जाएं।
  
   उलटा नामु जपत जगु जाना।
   बालमीकि भए ब्रह्म समाना॥
  
   वाल्मीकि को राम-राम का जाप करने को कहा गया, लेकिन उन्होंने इसका उलटा-मरा-मरा का जाप किया। आपको जो उत्पत्ति करना है, वह करे। सभी तो उस परमात्मा के ही शब्द है। सभी शब्द परमात्मा तक ही तो जाते है। दुनिया का प्रत्येक शब्द परमात्मा का है, दुनिया का प्रत्येक नाम परमात्मा का नाम है। इस दृष्टि से प्रत्येक नाम से पहले स्वस्तिक अर्थात् आदरसूचक शब्द तो होना ही चाहिए।
  
   आचार्य सुदर्शन जी