शरीफ का आना-जाना

परवेज मुशर्रफ ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि तानाशाही उनके स्वभाव में है और वह लोकतंत्र को कुचलने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जिस तरह कुछ ही घंटों के अंदर जबरन सऊदी अरब भेज दिया उससे इसकी भी पुष्टि हो गई कि उन्हें उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को धता बताने में कोई संकोच नहीं।
ज्ञात हो कि उच्चतम न्यायालय ने साफ तौर पर यह आदेश दिया था कि नवाज शरीफ को स्वदेश लौटने का अधिकार है और सरकार को उनकी वापसी में अड़चन नहीं डालनी चाहिए। पता नहीं परवेज मुशर्रफ ने इस आदेश की किस तरह व्याख्या की कि वह नवाज शरीफ को फिर से निर्वासित करने के अपने फैसले को जायज ठहरा रहे हैं? ऐसी व्याख्या तो वही कर सकता है जो मनमानी करने का आदी हो। यह समय ही बताएगा कि पाकिस्तान उच्चतम न्यायालय अपने राष्ट्रपति की इस हरकत पर क्या रवैया अपनाता है, लेकिन जो विश्व बिरादरी और विशेष रूप से अमेरिका परवेज मुशर्रफ की मानसिकता में लोकतंत्र का अंकुरण होता हुआ देख रहा है और इसके लिए आश्वस्त है कि वह निष्पक्ष चुनाव कराएंगे उसे सचेत हो जाना चाहिए। नि:संदेह ऐसा तभी होगा जब अमेरिका खास किस्म के तानाशाहों का समर्थन करने की अपनी आदत से बाज आएगा। अमेरिका नवाज शरीफ को पाकिस्तान आने से रोकने के लिए जिस तरह परोक्ष रूप से मुशर्रफ के पक्ष में खड़ा हुआ और उसने उन पर बेनजीर भुंट्टो से समझौता करने के लिए जैसा दबाव डाला उसकी सिर्फ और सिर्फ आलोचना ही की जा सकती है। इसका मतलब है कि अमेरिका यह चाहता है कि मुशर्रफ सत्ता में बने रहें। नि:संदेह इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि इस देश में लोकतंत्र की बहाली न होने पाए और यदि हो भी तो सब कुछ मुशर्रफ की मुंट्टी में रहे। क्या अमेरिका अभी तक यह नहीं समझा पाया है कि मुशर्रफ और लोकतंत्र तो विपरीत धु्रव हैं? 

   नवाज शरीफ के साथ हुए व्यवहार से यह स्पष्ट है कि परवेज मुशर्रफ यथासंभव वैसा कुछ भी नहीं करने वाले जो लोकतंत्र की बहाली में मददगार हो। जहां तक बेनजीर भुंट्टो के साथ उनके संभावित समझौते की बात है, यदि ऐसा कोई समझौता होता है तो भी यह तय नहीं कि उससे लोकतंत्र की राह प्रशस्त होगी। बेनजीर भुंट्टो ने परवेज मुशर्रफ से समझौता यानी साठगांठ करने के संकेत देकर अपने देश की लोकतांत्रिक शक्तियों को तो हतोत्साहित किया ही है, खुद की साख पर बंट्टा भी लगाया है। बेनजीर के आचरण से नवाज शरीफ की लोकप्रियता में वृद्धि होना स्वाभाविक है। यह लोकप्रियता मुशर्रफ का सिरदर्द बढ़ाएगी। नवाज शरीफ भले ही कुछ घंटे तक पाकिस्तान की धरती पर रह सके हों, लेकिन उनके इस क्षणिक आगमन का असर लंबे समय तक दिखेगा। यदि उनकी संक्षिप्त पाकिस्तान यात्रा इस देश की लोकतांत्रिक ताकतों को बल प्रदान कर सके तो इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता, क्योंकि मुशर्रफ तो सिर्फ अपनी हरकतों से खुद के साथ देश को संकट में डालने का काम कर रहे हैं। यदि भारत इस पड़ोसी देश को शांतिपूर्ण और स्थिर देखना चाहता है तो फिर उसे वहां लोकतांत्रिक शक्तियों की हिमायत करने में हिचकिचाहट का परिचय नहीं देना चाहिए। 

  -जागरण मुख्य संपादकीय