स्मरण:आचार्य विनोबा भावे

विन्या, विनोबा, नरहरि भावे, विनायक और बाद में बाबा के नाम से विख्यात आचार्य विनोबा भावे भारतीय संस्कृति के उन्नायक थे। उन्होंने अपनी माता रघुमाई देवी के सुझाव पर गीता का मराठी अनुवाद तैयार किया। मां से ब्रह्मचर्य की महत्ता जब सुनी तो उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए विवाह नहीं किया। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन स्वतंत्रता लाने के प्रयत्नों में लगा दिया। गांधी जी के अनुयायी बने रहे। जेल यात्राएं भी कीं। वहां भी उन्होंने काम के बाद पढ़ने के लिए समय निकाला। गुण और अनुभव के प्रमाणपत्रों तक ही शिक्षा और सेवा को उन्होंने महत्व नहीं दिया। मां के सामने अपनी पढ़ाई के प्रमाणपत्रों को आग में जलाने के बाद विनोबा जी आगे की पढ़ाई के लिए वाराणसी चले गए। वहां उन्होंने संस्कृत, हिंदी सीखी और पुराणों का अध्ययन किया। 

   विनोबा जी बहुभाषा-विद् थे। उन्होंने देश की प्राय: सभी भाषाएं और विदेशी भाषाओं में अंग्रेजी, अरबी, चीनी, जापानी आदि सीखीं। पवनार से 325 किलोमीटर चलकर विनोबाजी आंध्रप्रदेश के तेलंगाना गए। वहां उन्हे ऐसे किसान मिले जिनके पास जमीन नहीं थी। उनकी दशा अत्यन्त दयनीय थी। पोच्चंपल्लि के भू स्वामी रामचंद्र रेड्डी से विनोबा जी ने भूदान करने का आग्रह किया ताकि बटाई पर किसानी करने वाले आजीविका अर्जित कर सकें। वह तैयार हो गए। विनोबा जी ने लिखापढ़ी कराने के बाद 100 एकड़ भूमि वहीं के भूमिहीन किसानों को दे दी। अन्य लोगों ने भी श्री रेड्डी का अनुसरण किया, जिससे भूदान आंदोलन चल पड़ा। विनोबा जी ने किसानों से छठा भाग देने का अनुरोध किया। पैदल यात्रा करते उन्होंने सारे देश में एक क्रांति का प्रवर्तन किया। उन्होंने राजनीति में जाना स्वीकार नहीं किया और ऋषि परंपरा में संपूर्ण पृथ्वी को 'सर्व भूमि गोपाल की' कहा और पृथ्वी के निवासियों को अपना कुटुंब बताया। उन्होंने भूदान आंदोलन के लिए समर्पित कार्यकत्र्ता प्रस्तुत किए। इनमें जयप्रकाश नारायण भी थे। विनोबा जी ने डाकुओं का समर्पण कराया। उन्हे मैगसेसे सम्मान से सम्मानित किया गया। 1983 में उन्हें मरणोपरांत भारतरत्न की उपाधि दी गई।