परमाणु करार:वाम दलों की अंध दृष्टि

भारतीय कम्युनिस्टों के बारे में ऐतिहासिक अनुभव यह है कि जब वे देशहित की बात करतें है तब वे वास्तव में देश को क्षति पहुंचाते नजर आते है, जब वे अर्थव्यवस्था या आम आदमी की स्थिति पर चिंता जताते है तब उसे और दरिद्र व असहाय बनाने का प्रबंध कर रहे होते है। पश्चिम बंगाल में मदरसों के साथ पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की कुटिल साठगांठ पर जब स्वयं मुख्यमंत्री बुद्धदेव त्राहि-त्राहि कर उठे तब मा‌र्क्सवादी नेतृत्व ने उन्हे डांटकर चुप करा दिया था। ऐसे कम्युनिस्ट जब देशहित के नाम पर अमेरिका के साथ परमाणु संधि का विरोध कर रहे है तो एकदम सावधान हो जाना चाहिए कि वे निश्चय ही कुछ उल्टा करने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा है कि प्रस्तावित परमाणु संधि से देश की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति में मदद मिलेगी। इसके विरुद्ध कम्युनिस्टों का तर्क है कि इससे आम आदमी के बजाय कारपोरेट क्षेत्र को लाभ होगा। स्मरण करे, इन्हीं कम्युनिस्टों ने राजीव गांधी द्वारा कंप्यूटर तकनीक के विकास के आह्वान के विरुद्ध ठीक यही तर्क दिया था। आज वही माकपा अमेरिकी माइक्रोसाफ्ट को बंगाल में निमंत्रण देकर कंप्यूटर तकनीक के विकास का उपाय कर रही है। 

   आम आदमी की चिंता के मा‌र्क्सवादी शब्द जाल का अर्थ पिछले तीन दशक में हुई बंगाल की अधोगति से स्पष्ट है। हाल में लेखिका महाश्वेता देवी तक यह कहने को विवश हुई कि बंगाल में सड़क, अस्पताल, सफाई, बिजली आदि सुविधाएं बदहाल हैं, जबकि गुजरात में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति काफी अच्छी है। यह तब है जब गुजरात में भाजपा या नरेद्र मोदी केवल सात-आठ वर्ष से सत्ता में हैं। दूसरी तरफ माकपा पिछले तीस वर्ष से बंगाल पर एकछत्र राज कर रहे हैं। यदि ऐसे कम्युनिस्ट अभी शिक्षा दे रहे है कि अमेरिका के साथ परमाणु समझौते से ऊर्जा क्षेत्र में भारत के आम आदमी को कोई लाभ नहीं होगा तो अनुभव से यही समझना चाहिए कि निश्चय ही समझौता उपयोगी है। वैसे भी क्या इस मुद्दे पर हमें परमाणु वैज्ञानिक और पूर्व-राष्ट्रपति कलाम के विचारों से अधिक महत्व कम्युनिस्टों को देना चाहिए? कलाम ने इस समझौते को अनूठा बताया है। दूसरी ओर कम्युनिस्टों के सभी तर्को का ध्यान से अध्ययन करें तो स्पष्ट हो जाता है कि वे तथ्यों से अधिक बयानबाजी का सहारा ले रहे है। माकपा ने इस विषय पर चार पुस्तिकाएं प्रकाशित की है-'परमाणु समझौता रोको', 'परमाणु ऊर्जा और विद्युत क्षेत्र: झूठे वायदे', 'भारतीय अर्थव्यवस्था को बंधक न बनाओ' तथा 'अमेरिका के साथ सामरिक सहयोग न करो'। चारों का अध्ययन स्पष्ट करता है कि मुख्य बल अंतिम बात पर है। ध्यान रहे कि इसी जड़ दृष्टि ने स्वतंत्र भारत के प्रथम 20 वर्षो में भारत को सामरिक, वैचारिक रूप से इतना मूढ़ बना दिया था कि उसे कम्युनिस्ट चीन के हाथों बुरी तरह मार खानी पड़ी। हर बात पर अमेरिका-विरोध तथा सोवियत संघ व चीन के साथ मैत्री की माला जपने की इसी अंधदृष्टि के साथ नेहरूवादी विदेश नीति आरंभ हुई थी। फलस्वरूप कथित मित्र चीन ने चुपचाप लद्दाख में घुसपैठ कर भारत की हजारों वर्ग-मील भूमि हथिया ली और अंतत: 1962 में सीधा आक्रमण कर हमें बुरी तरह अपमानित किया तो भारत के पास लज्जा से लाल होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचा था। यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि चीन के हाथों हुई भारत की पराजय, कश्मीर के प्रश्न को संयुक्त राष्ट्र ले जाकर उलझाने और इस्लामी अलगाववाद को प्रश्रय देने जैसी असंख्य भूलें मुख्यत: उन कम्युनिस्ट प्रचारकों पर विश्वास के कारण हुई जिनमें अनेक मा‌र्क्सवादी और स्वयं नेहरू आरंभ से ही विश्वास करते थे। 

   मिथ्या प्रचार से कम्युनिस्टों ने न केवल भारत को निर्बल और असहाय बनाया, बल्कि वे सचेत रूप से कम्युनिस्ट रूस और चीन के हित-साधन में लगे रहे। उनके लिए अपने अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट बंधुओं की इच्छा और निर्देश के समक्ष देशहित का कभी कोई महत्व नहीं था। आज भी वे उसी दृष्टि से परिचालित है। संभाव्य भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से अभी सबसे अधिक चिंतित देश चीन और पाकिस्तान हैं। विचारणीय है कि अमेरिका के साथ चीन के जिन समझौतों को हमारे कम्युनिस्ट कभी निंदनीय नहीं समझते, वैसे ही समझौते यदि भारत करे तो वे प्राण-पण से विरोध क्यों करने लगते है? यही प्रश्न आर्थिक सुधारों के संबंध में भी है। उत्तर स्पष्ट है-कम्युनिस्ट यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि चीन की तुलना में भारत की शक्ति और क्षमता न बढ़े। माकपा द्वारा प्रकाशित उपर्युक्त चौथी पुस्तिका इसे स्पष्ट कर देती है कि उनका सबसे अधिक विरोध अमेरिका के साथ साझेदारी बढ़ाने पर है। इसमें कहीं इसकी चर्चा नहीं कि चीन ने तो अमेरिका के साथ 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' के सर्वोच्च स्तर तक साझेदारी बनाई है। इसके विपरीत पुस्तिका में सपाट घोषणा है कि अमेरिका के साथ साझेदारी के भारतीय अर्थव्यवस्था और आम लोगों को दुष्परिणाम भुगतने होंगे। 

   एस.शंकर