धर्म एवं अध्यात्म

धारयते इति:धर्म: जो धारण किया जाए वह धर्म है अर्थात जिस परमसत्ता के बनाए नियमों के अनुरूप इस जगत का धारण पोषण हो रहा हो और उसके अनुशासनों के अनुरूप अपनी जीवनचर्या का निर्धारण हो रहा हो उसे धर्माचरण कहते है।
संक्षेप में,जो व्यक्ति, समाज, जनसामान्य को धारण करे उसे धर्म कहते है। धर्म शब्द के मुख्य तीन अर्थ है: धारण करने वाला जीव, पालन करने वाला ईश्वर, अवलंबन देने वाला जगत। मानव की संवेदनशीलता का विकास ही धर्म है। धर्म जीव के व्यक्तित्व के परिष्कार की व उस माध्यम से उसके सारे समाज पर पड़ने वाले प्रभाव की विधा का नाम है। धर्म के तीन अंग है: पहला है, नीति विज्ञान यानी नैतिकता पर आधारित ऐसा अनुशासन जो व्यक्ति की चेतना में संवेदना को जन्म दे। दूसरा है,आस्तिकता प्रधान तत्व दर्शन यानी मानव-मानव में पारस्परिक सामंजस्य एवं अनिवार्य घनिष्टता स्थापित करने वाला तर्क संभव विवेचन। तीसरा है, अनगढ़ मानव को देवमानव बनाने और उसे सही दिशा देने वाला गहन विज्ञान। धर्म के लक्षण है-धृति, धैर्य, संतोष, आत्मावलंबन्। क्षमा-औचित्य के प्रति उदारता, दम-मन का संयम्। अस्तेयम्- न्यायपूर्ण जीवन। शौच- बहिरंग व अंतरंग की पवित्रता। इंद्रिय निग्रह- इंद्रियों का संयम, एकाग्रता। धी-विवेक बुद्धि। विद्या-आत्मज्ञान, पारलौकिक फल वाले सत्कर्मो। सत्य- मन, वचन, कर्म से सत्य बोलना। अक्रोध- आत्मनियंत्रण। 

   अध्यात्म है आत्मा का अध्ययन, आत्मा का विज्ञान। जीव में आत्मा के कारण ही चेतना है। ब्रह्मांड में ब्रह्म के कारण ही चेतना है। इस चेतना विज्ञान के दो हिस्से है- तथ्यपरक एवं क्रियापरक। ईश्वर समस्त सद्गुणों का भंडार है और वह पूर्ण है। सृष्टा ने मनुष्य को असाधारण सफलताएं उपलब्ध कर सकने की संभावनाओं से भरा पूरा बनाया है। सभी प्रतिभाशाली लोगों में विशेष तत्व एक ही है कि वह अपने में निहित संभावनाओं को पहचानते है और उन्हे विकसित करने का प्रयास करते है। आत्मिक रूप से उन्नत व्यक्तियों में दूरदर्शिता, सात्विकता, श्रमशीलता एवं सद्भावना के गुण विशेष होते है। दैवी चेतना जब जिसमें उतरती है उसके जीवन को बदलकर रख देती है और उसके स्वभाव में व्यापक परिवर्तन ला देती है।