सांप्रदायिक जहर

पिछले दो-एक महीने में तीन भारतीय उपन्यासकारों ने एक ही विषय पर अत्यधिक पढ़ी जाने वाली कृतियां प्रस्तुत की है। यह विषय है- अपने वतन में सांप्रदायिकता का जहर। एक तो बिहारी तबीश खैर हैं, जो डेनमार्क में बसे है। उनका उपन्यास 'फिल्मिंग ए लव सांग' आर एस एस के उग्रवाद का विस्तार है जो मुसलमानों पर हमले और उनकी संपत्तिनष्ट करने से लेकर महात्मा गांधी की हत्या पर खत्म होता है। केन्या में जन्मे गुजराती एमजी वासनजी ने 'द एसासिन सांग' लिखी है। इसका विषय अहमदाबाद के निकट दरगाह को हिंदू कट्टरपंथियों की भीड़ द्वारा नष्ट किया जाना है, जिसमें मुसलमान और हिंदू, दोनों रहते थे। तीसरे उपन्यासकार देवीदार है, जो तमिल कैथोलिक है, पेंग्विन वाइकिंग के फाउंडर एडीटर है और इस समय कनाडा में इसी पब्लिशिंग हाउस के प्रमुख है। उनकी पुस्तक 'सोलीट्यूड आफ एम्परर' में हिंदू कट्टरवाद के फिर से पैदा होने की खोज-खबर ली गई है। इसमें मुंबई में शिव सैनिकों द्वारा मुसलमानों के खिलाफ की गई कार्रवाई और तमिलनाडु के नीलगिरी पर्वतों में सांप्रदायिक जहर फैलाना शामिल है। तीनों उपन्यास विदेशों में रह रहे भारतीयों ने लिखे है, जो महात्मा गांधी द्वारा सांप्रदायिक सद्भाव रूपी आशा की ज्योति को बुझाने की कोशिश से बहुत दु:खी है। 

   देवीदार का उपन्यास सूत्रधार पर आधारित है। सूत्रधार एक युवा तमिल ब्राह्मण विजय है, जिसने मुंबई के अखबार 'द इंडियन सेकुलरिस्ट' में रिपोर्टर के रूप में अपना कैरियर शुरू किया है और जिसका संपादन पारसी सोहराबजी करते है। इसकी सीमित प्रसार है, लेकिन प्रभाव जबरदस्त है, क्योंकि इसकी देशभक्ति से सभी परिचित है। सोहराबजी के आदर्श अशोक, अकबर और गांधी है। इन तीनों में सबसे महान हैं गांधी। इन तीनों के जीवन में उतार-चढ़ाव आते है। अशोक के जीवन में कलिंग के युद्ध में हुए रक्तपात से परिवर्तन हुआ। अकबर के जीवन में परिवर्तन झेलम नदी के तट पर हुआ, जहां हिरणों के झुंड को इसलिए खदेड़ कर इकट्ठा किया गया था ताकि वह उनका शिकार कर सकें। उन्होंने चिंतन किया कि वह करने क्या जा रहे हैं? उन्होंने अपने अस्त्र नीचे रख दिए और प्रण किया कि अपने पेट को जानवरों का मकबरा नहीं बनाएंगे और वह शाकाहारी हो गए। अकबर ने एक नया मजहब दीन-ए-इलाही भी शुरू किया, जिसमें सभी मजहब के लोग शामिल थे। वह पहले मुगल साम्राज्य थे जिन्होंने अपने को भारतीय कहा। गांधीजी के जीवन में परिवर्तन तब आया जब उन्हे रेलवे कंपार्टमेंट से बाहर फेंक दिया गया, क्योंकि वह गोरों के लिए था। उन्होंने जातिवादी भेदभाव और अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए अहिंसक सत्याग्रह की एक अलग नस्ल का ही निर्माण कर दिया। इन लोगों ने अपने ये सब निर्णय खुद अपने साथ घटी घटनाओं को लेकर किए। इसीलिए इसका शीर्षक 'सोलीट्यूड आफ एम्परर' है। तीनों इससे सहमत थे कि मनुष्यों या पशुओं के साथ किसी भी प्रकार काहिंसात्मक व्यवहार करना सबसे बड़ा पाप है। 

   रिपोर्टर विजय का पहला काम शिवसेना के संरक्षण में मुसलमानों की हत्याओं का आंखों देखा हाल लिखना था। उसकी अपनी जान केवल इस बात से बच जाती है कि जिसने उस पर हमला किया उसे उसकी फटी हुई कमीज के नीचे पहना हुआ धागा दिखाई दे जाता है। यह अनुभव नए-नए रिपोर्टर के लिए बहुत कुछ सीख दे जाता है। वह कुछ सप्ताह तक बिस्तर से भी नहीं उठ पाता। उसका दयालु मालिक उसकी देखभाल करता है और उसे नीलगिरी में मेहम नामक स्थान पर एक दोस्त के घर भेज देता है। विजय को पता चलता है कि चाय बागानों के बीच बसे इस छोटे से शहर में सांप्रदायिक द्वेष फैलाने की साजिश हो रही है। यहां ईसाई निशाने पर है,जो हिंदू कट्टरपंथियों की सूची में मुसलमानों के बाद दूसरे नंबर पर आते है। भड़काने वाला एक तमिल राजन है, जो मुंबई की हत्याओं में भी शामिल था। उसकी कहानी गरीब से अमीर बनने की है। वह पुलिस को रिश्वत दे सकता है, छोटे अफसरों को डांट सकता है और ताकतवरों के साथ साठगांठ कर सकता है। उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं है। राजन का निशाना एक पहाड़ी है, जो मेहम में एक मीनार की तरह काफी ज्यादा ऊंचाई तक है और जिसे शिवलिंग से मिलता-जुलता बताया जा सकता है। ऊपर तक जाने के लिए 108 सीढि़यां बनी है। हालांकि लेखक ने इस बात का जिक्र नहीं किया है फिर भी हिंदू मान्यता में यह एक महत्वपूर्ण संख्या है। इस मीनार जैसी पहाड़ी चोटी को ईश्वर की मीनार कहा जाता है और यहां एक शहीद का मकबरा है। हिंदू, मुसलमान और ईसाईयों का तीर्थस्थल रहे इस स्थान की देखभाल एक ईसाई पादरी ने की। राजन इस पर कब्जा करने की योजना बनाता है। वह चुपचाप वहां रखे क्रास को शिवलिंग से बदल देता है और इसे शिव मंदिर नाम दे देता है। उसकी योजना एक मामूली से व्यक्ति नोवा की वजह से ध्वस्त हो जाती है, जो ईसाई है, लेकिन बहुत ही आजाद ख्याल है। जब राजन मीनार की फिसलन भरी सीढि़यों पर चढ़ जाता है और शिवलिंग को अपने सीने में छुपाकर साथ वाले दरवाजे से अंदर जाता है तो उसका सामना नोवा से हो जाता है। दोनों में लड़ाई होती है और दोनों 6 हजार फीट की ऊंचाई से गिर जाते है। यह बहुत ही हृदयस्पर्शी कहानी है। इसमें बहुत सी मनोरंजक घटनाएं भी है।
 
न काहू से दोस्ती न काहू से बैर - खुशवंत सिंह