चीन की भारत विरोधी चाल

एशिया के आर्थिक और सामरिक मामलों पर जब भी कोई शोध या रिपोर्ट प्रकाशित होती है या किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर कोई बौद्धिक परिचर्चा होती है तो भारत और चीन अक्सर केंद्रीय विषय का हिस्सा होते है। इन चर्चाओं में अधिकांशत: एक विरोधाभास दिखाई देता है, जिसमें एक धु्रव पर भारत-चीन मैत्री की बात आती है तो दूसरी ओर दोनों देश प्रतिस्पर्धी के रूप में नजर आते है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर सच क्या है? अर्थजगत से जुड़े अध्ययन बताते है कि 2025 तक चीन दुनिया का कारखाना बनेगा और भारत विश्व का कार्यालय। जाहिर है, एशिया की दो ताकतें समानता के आधार पर एक ऐसी बुनियाद रख सकेंगी जिसमें हिंदी-चीनी भाई-भाई जैसे विशेषणों की सार्थकता सिद्ध हो सके, लेकिन गहराई में जाने पर वास्तविकता इससे भिन्न दिखाई देती है। सच यह है कि भारत के उभरते हुए बाजार को देखकर चीन ने भारत के प्रति अपने बाहरी खोल को बदलना जरूरी मान लिया है। यहां पर मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट द्वारा किए अध्ययन का जिक्र करना यथोचित होगा, जिसमें कहा गया है कि भारत इस समय दुनिया का 12वां सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है और 2025 तक वह वैश्विक उपभोक्ता बाजार में पांचवां स्थान प्राप्त कर लेगा। इस समयावधि में भारतीय मध्यम वर्ग में 12 गुनी वृद्धि होगी। लगभग दो करोड़ तीस लाख भारतीय, जिनकी संख्या आस्ट्रेलिया जैसे देश की जनसंख्या से अधिक होगी, देश के अमीरतम लोगों में होंगे। ऐसे में चीन सरीखे देश के लिए भारत के बाजार की नितांत आवश्यकता होगी। अक्सर देखा गया है कि भारत जब भी सामरिक क्षेत्र में किसी सकारात्मक रूप से आगे बढ़ने का निर्णय लेता है तो चीन प्रत्यक्ष तौर पर या फिर पाकिस्तान को ढाल बनाकर भारत के विरुद्ध विशुद्ध आलोचक की भूमिका में आ जाता है।
 
भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते की घोषणा होते ही चीनी और पाकिस्तानी दूतावासों के अधिकारी थिंक टैक की भूमिका में आ गए और इसे हथियारों की होड़ बताते हुए दक्षिण एशिया में सामरिक असंतुलन की चेतावनी देनी शुरू कर दी। ऐसा करते समय चीन यह भूल गया कि उसके पास भारत से कई गुना अधिक परमाणु हथियार है और वह पाकिस्तान को लगातार इस दिशा में आगे बढ़ाने का कार्य कर रहा है। यहां तक कि एशिया में हथियारों की होड़ के लिए सबसे बड़ा दोषी वही है। इसके बावजूद उसने भारत और अमेरिका के बीच हुए परमाणु समझौते की बराबरी करने के लिए पाकिस्तान को यूरेनियम संवर्धन की क्षमता बढ़ाने में सहयोग के लिए समझौते को व्यवहारिक आकार देने का निर्णय किया है। जापानी समाचार एजेंसी ने पाकिस्तान परमाणु ऊर्जा आयोग के सूत्रों के हवाले से लिखा है कि पंजाब प्रांत के चश्मा में बनने वाले न्युक्लियर पावर कांप्लेक्स पर फिलहाल पाकिस्तान प्रारंभिक चरण में दो अरब अमेरिकी डालर खर्च करेगा। उसने यह भी लिखा है पाकिस्तान परमाणु ऊर्जा आयोग के अधिकारियों का कहना है कि भारत-अमेरिका परमाणु समझौते की तर्ज पर वाशिंगटन के साथ करार के लिए चल रही वार्ता फेल हो जाने के बाद इस्लामाबाद ने यह तय किया है कि वह स्वदेशी तकनीक से निर्मित 'प्रेसराइज्ड वाटर परमाणु रिएक्टर' चीन की मदद से लगाएगा। दरअसल, चीन पाकिस्तान के इस परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के माध्यम से जो रणनीति अपना रहा है उसके कुछ गौण पक्ष भी हैं। पहला गौण पक्ष यह है कि भारत-अमेरिका समझौते में एक प्रावधान यह भी है कि अमेरिका परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) को भारत के पक्ष में सहयोग के लिए तैयार करेगा। चूंकि चीन भी एनएसजी का सदस्य है इसलिए उसे भी इस पर अपना रुख स्पष्ट करना होगा। ऐसी स्थिति में उसका नकारात्मक रुख भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों के लिए प्रतिकूल साबित होगा। इसलिए अब उसकी कोशिश यह होगी कि वह अमेरिकी प्रयासों का समर्थन करे, जिससे पाकिस्तान को भी उसी प्रकार की रियायतें मिल सकें जैसी भारत को मिलेंगी। हो सकता है कि चीन यह सब इसलिए कर रहा हो कि एनएसजी भारत की मदद न करे।
चीन के रवैये से यह संभव है कि आस्ट्रेलिया, फ्रांस और कनाडा, जैसे बड़े नाभिकीय आपूर्तिकर्ताओं के साथ नाभिकीय लेन-देन संबंधी प्रयास खतरे पड़ जाएं। अब चीन अगर वास्तव में भारत के साथ मैत्री भाव से लबालब है तो फिर वह इस प्रकार का रवैया अपनाकर क्या साबित करना चाहता है? सभी जानते है कि पाकिस्तान एशिया में पनपने वाले आतंकवाद का जनक है और पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक अब्दुल कादिर खान ने परमाणु तस्करी में महती भूमिका निभाई है। अभी इस प्रकार आपूर्ति का खतरा पूरी तरह से टला नहीं है। फारेन पालिसी मैगजीन और सेंटर फार अमेरिकन प्रोग्राम ने एक संयुक्त शोध में इस खतरे को रेखांकित भी किया है। इस शोध में विदेश नीति के जाने-माने विशेषज्ञों को शामिल किया गया है, जिसमें से 35 प्रतिशत विशेषज्ञों ने माना है कि अल कायदा अपने नए ठिकाने के रूप में पाकिस्तान को चुन सकता है। शोध की रिपोर्ट के आकड़ों के मुताबिक 74 प्रतिशत विशेषज्ञों ने माना है कि अगले तीन से पांच सालों के भीतर पाकिस्तान आतंकियों को परमाणु तकनीक बेच सकता है। ऐसे में चीन द्वारा पाकिस्तान को परमाणु तकनीक विकसित करने में सहयोग देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा, खासकर भारत के लिए तो बिल्कुल नहीं। बहरहाल, चीन आज पाकिस्तान, नेपाल और म्यांमार के रास्ते भारत के खिलाफ गतिविधियों का संचालन कर रहा है। तिब्बत के रास्ते पाकिस्तान के साथ सड़क संपर्क बनाकर और खाड़ी के मुहाने पर पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में पाकिस्तान के साथ संयुक्त नौसैनिक अड्डा विकसित कर उसने भारत के पश्चिमी तट पर खतरा उत्पन्न कर दिया है। चीन ने नेपाल के रास्ते भारत की सीमा तक सड़कें बनाकर वहां माओवादियों की जड़े जमाने में भी एक हद तक मदद की है। ये सभी गतिविधियां सही अर्थो में दक्षिण एशिया की शांति के लिए खतरा है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)