योग पर व्यर्थ का अभियोग

ब्रिटेन में योग पर चर्च के प्रतिबंध को अतार्किक बता रहे है हृदयनारायण दीक्षित
ब्रिटेन में पंथ और विज्ञान का द्वंद्व है। विज्ञान प्रयोग विश्वासी होता है। पंथिक आस्थाओं पर तर्क और प्रयोग नहीं होते। ईसाइयत और इस्लाम आस्थाएं हैं। भारत का धर्म दर्शन के बाद उगा। यहां तर्क-प्रतितर्क और विचार-विमर्श का गहन दौर चला। इसी में से धर्म नामक धारणा आई। पश्चिम ने विज्ञान के क्षेत्र में नए आकाश खोजे, अंतरिक्ष नापा और विश्व संहारक परमाणु तकनीक भी खोजी। वे आधुनिकता के झंडाबरदार बने, उन्होंने बाकी सारी दुनिया, खासतौर से एशिया और अफ्रीका को रूढि़वादी बताया, लेकिन उन्हीं के प्रतिनिधि मुल्क ब्रिटेन में योग-विज्ञान को लेकर तीखी बहस जारी है। चर्च खासी चर्चा में है। उसने योग को ईसाइयत विरोधी बताया है। उनकी मानें तो योग हिंदू धर्म का कर्मकांड है। लिहाजा सिल्वर स्ट्रीट बैपिस्ट और ऐंग्लिकन चर्च ने योग शिक्षाएं बंद करवा दी हैं। भारत में इसकी प्रतिक्रिया हुई है। योग का शाब्दिक अर्थ जुड़ना या जोड़ना है। योग हजारों बरस पुराना भारतीय विज्ञान है। भारत से यही शब्द यूरोप पहुंचा और योक बना।

लंदन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ए एल बाशम ने द वंडर दैट वाज इंडिया में बताया कि योग पश्चिम में सुविदित है और अंग्रेजी शब्द योक से संबंधित है। अंग्रेजी शब्दकोष में योक का अर्थ जुआ, संधि और जोड़ना, बांधना है। भारत में योग की भरमार है। मसलन बिना प्रयास जुड़ना संयोग है, अलग हो जाना वियोग है। किसी वस्तु को सहायक बनाने का योग उप-योग है और इस्तेमाल करना प्रयोग है। आरोपित करना अभियोग है। उत्पादक योग उद्योग है। शक्ति और वस्तु का गलत प्रयोग दुरुपयोग है। शक्ति का जवाबी योग प्रतियोग है। इसी तरह ज्ञान को मुक्ति का उपकरण बनाना ज्ञान-योग है, भक्ति के रास्ते मुक्ति भक्ति योग है। कर्म-प्रधानता कर्मयोग है। संसार को माया और ब्रह्म को सत्य जानना संन्यास योग है। गीता के अनुसार कर्म की कुशलता भी योग है। ज्योतिष विज्ञान में ग्रहों की स्थिति भी योग है। ग्रह स्थिति का कल्याणकारी होना सुयोग है। आयुर्वेद में औषधियों को एक साथ मिलाना भी योग है। गणित में अंकों का जोड़ भी योग है। योग भारत की आश्चर्यजनक खोज है। यहां योग के किसी भी प्रयोग में धर्म-आस्था की कोई गुंजाइश नहीं है। योग हजारों बरस पहले ऋग्वेद में है, उपनिषदों और गीता में भी है। बुद्ध ने ढेर सारी यौगिक क्रियाओं का उल्लेख किया है। योग को व्यवस्थित रूप में विज्ञान बनाने का कार्य ईसा की दूसरी सदी पूर्व पतंजलि ने किया। वह पुष्पमित्र शंुग (185-184 ई.पू.) की मंत्रिपरिषद में थे। उन्होंने पाणिनि की व्याकरण पर महाभाष्य लिखा। उन्होंने ही योगसूत्र नामक महान ग्रंथ लिखा।

भारत में आस्था पर तर्क और खोज की पुरानी परंपरा है। पतंजलि के पहले कपिल ने अपने सांख्य दर्शन में प्रकृति के तत्व समझाए और कहा कि प्रकृति के तीन गुण ही गुणों के साथ खेल करते रहते हैं। गुणों का यह खेल सिर्फ देखना चाहिए। इसमें फंस जाने से दु:ख है, इससे मुक्त हो जाने में सुख है। उन्होंने ईश्वर की सत्ता को नहीं माना। बावजूद इसके गीता में उनके दर्शन को अतिरिक्त महत्ता मिली। कृष्ण ने स्वयं को भी कपिल बताया था। असल में दु:ख संपूर्ण मानवता की समस्या है। पश्चिमी दृष्टि में दु:ख का कारण आर्थिक अभाव है। भोग सुख है, ज्यादा भोग ज्यादा सुख है। मनुष्य मूल रूप में उपभोक्ता इकाई है। भारतीय दर्शन में दु:ख का कारण अज्ञान है। भोग सुख नहीं देते, ज्यादा भोग ज्यादा लोभ देते है। लोभ में बाधा से क्रोध आता है। क्रोध बुद्धिनाशी है। बुद्धिनाश से स्मृतिक्षय होती है। मनुष्य तनावग्रस्त होता है, लेकिन पतंजलि ने दु:ख दूर भगाने की वैज्ञानिक पद्धति भी दी।

पतंजलि के अनुसार सभी दु:खों की जड़ मनुष्य का मन है। फ्रायड ने भी मन-कामना को सभी क्रियाओं का केंद्र माना और कामेच्छा को नया नाम दिया-लिविडो। फ्रायड ने मन का दिलचस्प विश्लेषण करते हुए उसे तीन तरह का बताया-क्षिप्त (साधारण), विक्षिप्त और मूढ़ मन। पतंजलि ने मूढ़, क्षिप्त (साधारण), विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध सहित चित्त की पांच अवस्थाएं बतार्इं। उन्होंने चित्तवृत्तियों की समाप्ति को योग का लक्ष्य बताया। मनुष्य चित्त बड़ी रहस्यपूर्ण संरचना है। यह द्रव्य नहीं है, वरना विज्ञान की पकड़ में आ जाता। यह मनुष्य शरीर का सूक्ष्मतम, मगर अदृश्य हिस्सा है। पतंजलि ने शरीर के अनुशासन की तकनीक खोजी और शरीर के जरिए मन को नियंत्रित करने का कौशल बताया। यह मानी बात है कि तबीयत (मन) खराब हो तो शरीर कष्ट पाता है शरीर में चोट हो तो मन को तकलीफ होती है। अपमान का बोध मन पर होता है, ताप शरीर में आता है। भक्ति, भजन और सिनेमा आदि मन ठीक करते हैं। योग शरीर से भीतर की ओर एक अजब-गजब अंतर्यात्रा है। योग में चित्तवृत्ति ही असली बात है।

बाइबिल में कहा गया है, धन्य हैं वे जो मन के दीन (अचंचल) हैं, स्वर्ग का राज्य उनका है। यानी स्वर्ग मन का स्वभाव है, धन का नहीं। इसके पहले मन की एकाग्रता पर जोर देकर कहा गया है कि मन फिराओ, स्वर्ग का राज्य निकट है। मन को खास दिशा में मोड़ना योगाभ्यास है। बाइबिल में इसके संकेत हैं, लेकिन चर्च के अपने पूर्वाग्रह हैं। योग तनाव को दूर करने का सहज विज्ञान है। योग और साधना किसी पंथ मत, मजहब के पेटेंट नहीं है। आइंस्टीन पश्चिम में हुए, उनके शोध विश्व संपत्ति बने, पतंजलि भारत में हुए, उनका ज्ञान विश्व तनाव दूर करने का भौतिक शास्त्र बना। पतंजलि के सूत्र बीजगणित जैसे हैं। वह आसन, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से स्वयं की असलियत का बोध (समाधि) कराते हैं। आसन और प्राणायाम सीधे सरल शब्द हैं, लेकिन ध्यान और समाधि योग की तकनीकी शब्दावली है। यहां ध्यान एकाग्रता है।

पतंजलि के अनुसार ध्यान का केंद्र मात्र उपकरण है। यहां प्रीतिकर विषय पर ध्यान की सुविधा है- यथाभिमतध्याना द्वा अर्थात जिसका जो अभिमत हो उस पर ध्यान करे। अथवा ईश्वर पर प्राण पूरा ध्यान लगाए-ईश्वर प्रणिधाना द्वा। साधना का एक विकल्प ईश्वर भी है। ईश्वर हिंदू, ईसाई, मुसलमान नहीं होता। पतंजलि ने उसे जगत का सृष्टा नहीं बताया। वह ईश्वर की परिभाषा करते हैं-क्लेश, कर्म, कर्मफल और वासना से असंबद्ध चेतना विशेष ईश्वर है। योग सूत्र के रचना काल में विष्णु और शिव की महत्ता थी। राम और कृष्ण की ईश्वर रूप में उपासना थी, लेकिन पतंजलि वैज्ञानिक थे। उन्होंने अभ्यास और वैराग्य का सिद्धांत समझाया। लगातार अभ्यास और उपलब्धियों के प्रति अनासक्ति से योग के फल मिलते हैं।

आसन, प्राणायाम से शारीरिक स्वास्थ्य मिलता है, ध्यान से मन और बुद्धि पर चमत्कारिक नतीजे आते हैं। स्मृति शुद्ध होती है। चित्त निर्विकार होता है। पतंजलि ने बुद्धि के लिए ऋतंभरा नामक बड़ा प्यारा विशेषण लगाया है-ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा। पतंजलि इस पर भी संतुष्ट नहीं होते। आगे संस्कार बाधा हैं, वे इसे भी हटाकर समाधि प्राप्त कराने के लिए वैराग्य और सतत अभ्यास पर जोर देते हैं। पतंजलि की समाधि स्थाई आनंद है। यहां कोई परमात्मा नहीं है, न कोई धर्म या संप्रदाय। योग परिपूर्ण आनंद का भौतिक विज्ञान है। स्पष्ट है कि चर्च बिना वजह ही खफा है।