मानवाधिकारों पर राजनीति

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग पर अपनी सुविधा और इच्छा से काम तय करने का आरोप लगा रहे हैं एस.शंकर

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एक न्यायाधिकरण या प्रशासनिक संस्था नहीं है। इसका काम न्यायालयों के काम को दोहराना नहीं है, न ही पुलिस तंत्र के कार्य को विस्थापित करना है। इसका काम तो मानवाधिकार उल्लंघन के उन मामलों को प्रकाश में लाना तथा राहत के उपाय करना है जो सामने आने से रह गए हों, किंतु इसके विपरीत आयोग का रिकार्ड देखकर लगता है कि इसने अपनी इच्छा और सुविधा से काम तय किए है। पिछले दिनों आयोग की एक टीम भागलपुर गई। वहां उसने एक अपराधी को पुलिस द्वारा मोटरसाइकिल में बांध कर घसीटे जाने की जांच की। इसके लिए किसी ने आयोग के सामने शिकायत तक नहीं की थी। आयोग स्वत: संज्ञान लेकर खुद ही सक्रिय हो गया, जबकि इस मामले की मीडिया में चर्चा के बाद संबंधित पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई तक हो चुकी थी। ऐसे में आयोग पुलिस या न्यायपालिका के काम का दोहराव ही तो कर रहा था। इसके कुछ पहले हैदराबाद में प्रसिद्ध लेखिका तस्लीमा नसरीन पर कातिलाना हमले का आयोग ने कोई नोटिस नहीं लिया। आंध्र प्रदेश के तीन मुस्लिम विधायकों ने खुलेआम यह घोषणा भी की कि अगली बार यदि तस्लीमा नसरीन हैदराबाद आईं तो जिंदा नहीं जाने दी जाएंगी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर सुनियोजित आक्रमण तथा देश की संवैधानिक मर्यादा का मजाक उड़ाना भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को चिंतित नहीं करता। यह घटना कोई अपवाद नहीं, जहां राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सोया रहता है। इससे पहले इमराना, गुड़िया, हसीना, जरीना जैसी कई विवश स्त्रियों पर अत्याचार जैसी घटनाओं पर आयोग वैसे ही निर्विकार रहा है, जबकि ये घटनाएं आयोग के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आती है। बात यहीं तक सीमित नहीं। पांच वर्ष पहले जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के सामने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष ने बयान दिया था कि आयोग भारत के आतंकवाद निरोधी कानून के विरुद्ध है।
देश के कानून के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मंच पर बयानबाजी करके आयोग क्या साबित करना चाहता था? सबसे गंभीर बात यह है कि संसद के बनाए कानूनों पर निर्णय देने का अधिकार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को कैसे मिल गया? जिन मुद्दों पर मीडिया की रुचि है या हो सकती है उनमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भी विशेष रुचि रहती है। दूसरी ओर जिनसे मीडिया या राजनीतिक दल बचते है उनसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी दूर ही रहता है। इसका उदाहरण है कश्मीरी हिंदुओं का मामला। उनके लाख सिर पटकने पर भी आयोग ने कुछ नहीं किया। कुछ करना तो दूर उन्हे कश्मीरियत का भाषण पिलाया गया। इसके विपरीत गुजरात दंगों के समय और उसके बाद भी हर तरह के सरकारी, गैर-सरकारी विभागों, एजेंसियों के सक्रिय रहने के बावजूद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को आरंभ से ही वहां स्वत: संज्ञान लेकर तरह-तरह के बयान, आदेश, टिप्पणियां करना आवश्यक लगा। यहां तक कि आयोग ने गुजरात हाईकोर्ट के किसी निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में विशेष याचिका तक दायर की। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सक्रियता पर नजर डालने से पता चलता है कि वह भी राजनेताओं की तरह मीडिया से मोहित है। जहां मीडिया हो वहां यह तुरंत पहुंचना चाहता है। यह कहा जा सकता है कि आयोग भी देश के राजनीतिक फैशन से अनुचित रूप से प्रभावित दिखता है। इसे भी 'राजनीति संगत' का रोग लग गया है, अन्यथा कोई कारण न था कि बरसों से जम्मू-कश्मीर में हिंदुओं के संगठित नरसंहार, विस्थापन अथवा बिहार एवं आंध्र प्रदेश में नक्सली गिरोहों द्वारा की गई अनगिनत हत्याओं, विध्वंस आदि पर आयोग ने कभी कोई चिंता तक नहीं दिखाई-सक्रियता तो दूर रही।
1993 से 1999 तक आयोग ने 125 ऐसे मामले हाथ में लिए जो आयोग की निगाह में मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर मामले थे। इनमें व्यक्तिगत शिकायत, एनजीओ की शिकायत, स्वयं आयोग द्वारा स्वेच्छा से किसी घटना का संज्ञान लेना, पुलिस अत्याचार, गैर-सरकारी अत्याचार, दंगे से पीड़ित व्यक्ति, किसी हुर्रियत नेता का पासपोर्ट बनने में देरी का मामला, असम की जेलों में बंद पाकिस्तानी-बांग्लादेशी कैदियों की कुशलक्षेम पूछना आदि मामले शामिल हैं। यदि कोई विषय गायब है तो वह आतंकवादी, नक्सलवादी हिंसा और अत्याचारों का विषय है। क्या उनसे पीड़ित भारतीयों की चिंता किसी दूसरे ग्रह का आयोग करेगा? ऐसा नहीं कि आतंकवादियों, नक्सलवादियों के अत्याचारों को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मुक्त कर दिया है। आयोग की एक रिपोर्ट (1999) में मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणियों में एक श्रेणी 'आतंकवादी/ नक्सलवादी अत्याचार' की भी लिखी मिलती है, किंतु आश्चर्य की बात यह है कि उस श्रेणी में आयोग को कोई मामला नहीं मिला, जबकि उसी वर्ष केवल आंध्र प्रदेश में नक्सलियों ने दो हजार से अधिक लोगों की हत्याएं की थीं तथा जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों ने एक हजार से अधिक को मौत के घाट उतार दिया था।
विदेशी मिशनरियों द्वारा भोले-भाले आदिवासियों का सामूहिक मतांतरण कराना, छल-बल से उन्हे उनके आत्मिक अवलंब से वंचित करना किस आधार पर मानवाधिकार उल्लंघन का मामला नहीं बनता? यहां तक कि आयोग ने अपने शोध-अध्ययन के लिए भी जिस तरह के विषय चुने है उनमें भी आतंकी, नक्सली हिंसा तथा पंथीय मनमानियों से होने वाले मानवाधिकार उल्लंघन का विषय सिरे से गायब है। वहां भी उन्हीं विषयों को उठाया गया है जो वामपंथी, मिशनरी, विदेशी साम्राज्यवादी संस्थानों, संदिग्ध एनजीओ आदि को प्रिय हैं। अभी भी समय है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अपने उत्तरदायित्व को गंभीरता से ले और राजनीतिक प्रवृत्ति से अप्रभावित रहे, अन्यथा स्वयं उसे अप्रासंगिक हो जाना पड़ सकता है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)