अहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी

हिंदी में सृजनात्मक लेखन के निरंतर ह्रास पर चिंता जता रहे हैं डा.महीप सिंह

विश्व हिंदी सम्मेलनों में यह प्रस्ताव बार-बार पारित किया गया है कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाया जाए। यह भी सच है कि आज हिंदी विश्व के एक सौ से अधिक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। प्राध्यापकों में भारत से गए प्रवक्ता तो होते ही है, उन्हीं देशों के लोग भी हिंदी में पूरी दक्षता प्राप्त करके वहां अध्यापन कार्य करते है। प्राय: यह भी कहा जाता है कि पहले आप अपने देश में हिंदी को अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिष्ठित कर लीजिए, फिर उसे संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के विषय में सोचिए। यह एक ऐतिहासिक सच है कि हिंदी और उसका मध्यकालीन स्वरूप ब्रज भाषा कभी हिंदी पट्टी तक सीमित भाषा नहीं रही। अठारहवीं शती में ब्रज भाषा लगभग संपूर्ण देश की काव्य-भाषा बन गई थी। उन्नीसवी-बीसवीं शती में आए नवजागरण के साथ ही प्रादेशिक भाषाओं में लिखने का रुझान बढ़ता जाता है। आम जनता से सीधा संवाद स्थापित करने के लिए यह आवश्यक था। लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी ने अधिकतर लेखन कार्य मराठी और गुजराती में किया।
भाई वीर सिंह के पिता डा. चरण सिंह ब्रज भाषा में कविता लिखते थे, किंतु भाई वीर सिंह ने अपना लेखन पंजाबी में किया। राष्ट्रीयता के प्रसार और संपूर्ण देश में एक संपर्क भाषा की आवश्यकता अनुभव करते हुए विभिन्न प्रदेशों के सुधारकों और राजनेताओं ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किए जाने पर पूरा बल दिया। स्वामी दयानंद गुजराती थे और केशव चंद्र सेन बंगाली थे, किंतु राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के समर्थक थे। देश के विभिन्न भागों में राष्ट्रभाषा प्रचार समितियों की स्थापना हुई। इनके साथ जुड़ने और हिंदी का प्रचार-प्रसार करने में जिन लोगों ने सक्रिय भूमिका निभाई उनमें से अधिसंख्य की मातृ भाषा हिंदी नहीं थी। जिस प्रकार अठारहवीं शती में ब्रजभाषा में कविता लिखने वालों में उत्तार से दक्षिण भारत तक के कवि थे उसी प्रकार हिंदी में सृजनात्मक लेखन करने की प्रवृत्तिसारे देश में रही है, किंतु अहिंदी प्रदेशों के हिंदी लेखकों में यह भावना सदा विद्यमान रही है कि हिंदी साहित्य का मूल्यांकन करने वाले आलोचक उन्हे हिंदी की मुख्यधारा में शामिल करने के प्रति अनिच्छुक रहते है। अहिंदी भाषी क्षेत्रों के लेखकों को हिंदी में साहित्य-सृजन के लिए प्रोत्साहित करने के लिए 1966 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा एक पुरस्कार योजना शुरू की गई। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दस लेखकों को पुरस्कार दिया था। इनमें कन्नड़, तेलगू, मलयालम, कोंकणी, मराठी, उड़िया, बंगला और पंजाबी भाषी लेखक सम्मिलित थे। यह योजना आज भी चल रही है।
उत्तार प्रदेश हिंदी संस्थान भी प्रतिवर्ष एक अहिंदी भाषी लेखक को 'सौहार्द पुरस्कार' देता है। ऐसे अहिंदी भाषी हिंदी लेखकों की संख्या अगणित है। पुरस्कृत होने वाले लेखकों की संख्या भी पांच सौ से अधिक होगी, किंतु इनमें से ऐसे कितने है जो हमारे संज्ञान में हैं या जिनकी रचनाओं को हिंदी की पाठ्य पुस्तकों में सम्मिलित किया जाता है? मुझे कुछ लेखक याद आते है। अनंत गोपाल शेवड़े मराठी भाषी थे, किंतु हिंदी में उन्होंने स्तरीय साहित्य सृजन किया। उनके उपन्यास ज्वालामुखी का भारत की 14 भाषाओं में अनुवाद कराया गया। उनके एक अन्य उपन्यास 'मंगला' को ब्रेल लिपि में भी प्रकाशित किया गया था। अनंत गोपाल शेवड़े का महत्व इस दृष्टि से भी कम नहीं है कि उन्हीं के प्रयासों से 1976 में नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित हुआ था। मुझे दूसरा नाम याद आता है रमेश चौधरी अरिगपूडि का। उनकी मातृभाषा तेलगू थी। शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रथम बार जो अहिंदी भाषी हिंदी लेखक पुरस्कृत हुए थे उनमें अरिगपूडि भी थे। हिंदी में उनका विपुल साहित्य प्रकाशित हुआ। उन्होंने अनेक उपन्यास, नाटक और कहानियां लिखीं। आंध्र प्रदेश की साहित्य अकादमी और उत्तार प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा वह पुरस्कृत भी हुए थे। चेन्नई में रह रहे बाल शौरि रेड्डी और शौरिराजन आज भी अपने लेखन में सक्रिय है, किंतु ये सभी लेखक हिंदी संसार द्वारा या तो भुला दिए गए है या हाशिए पर चले गए है। वर्धा में स्थापित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय इस दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य कर सकता था, आज भी कर सकता है। इस समय इस विश्वविद्यालय के कुलपति गोपीनाथन स्वयं मलयालम भाषी है। केरल में हिंदी अध्यापन का उनका लंबा अनुभव है। इस विश्वविद्यालय को सही अर्थो में संपूर्ण हिंदी लेखन का केंद्र बनना चाहिए। देश के किस भाग में किनके द्वारा, किस विधा में, किस प्रकार का सृजन हो रहा है, इसकी विस्तृत जानकारी इस विश्वविद्यालय में उपलब्ध होनी चाहिए। इसी के साथ विश्व के अन्य देशों में कौन से लेखक हिंदी में सृजन-कार्य कर रहे है, उनकी क्या कठिनाइयां है, इसका पूरा संज्ञान इस विश्वविद्यालय को होना चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि आज हिंदी में जिसे मुख्यधारा का लेखन माना जाता है वह कुछ क्षेत्रों और कुछ आलोचकों की पूरी जकड़ में आ गया है।
इस समय हिंदी साहित्य की ट्रेन वाराणसी से चलकर गोरखपुर, लखनऊ और इलाहाबाद होती हुई नई दिल्ली पर आकर रुक जाती है। अब न वह पंजाब की ओर जाती है, न बिहार की ओर, न राजस्थान की ओर, न मध्य प्रदेश की ओर, न गुजरात की ओर, न महाराष्ट्र की ओर। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल की तो बात ही मत करिए। एक समय कोचीन से मलयालम मनोरमा की ओर से 'युग प्रभात' नाम से साप्ताहिक हिंदी पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। अनेक वर्षो तक उसने हिंदी के अखिल भारतीय स्वरूप को उभारने का प्रयास किया। फिर उसका प्रकाशन बंद हो गया। आज भी हिंदी विद्यापीठ (केरल) से 'संग्रथन' मासिक पत्रिका गत बीस वर्ष से प्रकाशित हो रही है। कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति की ओर से हिंदी प्रचार वाणी (मासिक) अनेक वर्षो से नियमित प्रकाशित हो रही है। इन प्रदेशों में सभी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हिंदी के प्रचार में लगे लोगों का अभाव नहीं है, किंतु इन सभी प्रदेशों में हिंदी में सृजनात्मक लेखन का निरंतर ह्रास हो रहा है।
मुझे लगता है कि अहिंदी भाषी प्रदेशों में हिंदी में किया गया मौलिक लेखन आने वाले कुछ वर्षो में थम जाएगा। वहां के लेखक अपनी-अपनी भाषाओं की ओर झुकते चले जाएंगे, क्योंकि वहां उन्हे अपनी पहचान और स्वीकृति प्राप्त करने में उन व्याधियों में से नहीं गुजर पड़ेगा जो हिंदी में लिखकर मिलती है। हिंदी का प्रकाशन व्यवसाय भी बुरी तरह सिमटता जा रहा है। इस समय पूरा प्रकाशन-व्यवसाय दिल्ली में केंद्रित हो गया है। एक समय वाराणसी, इलाहाबाद, लखनऊ, कानपुर, पटना, भोपाल और नागपुर जैसे नगरों में बहुत अच्छे प्रकाशन-गृह थे। आज इन नगरों में अच्छे प्रकाशकों की संख्या गिनी-चुनी रह गई है। अहिंदी भाषी प्रदेशों में यह संकट और गहरा है। पता नहीं पुस्तक विक्रेताओं की स्थिति इतनी विषम क्यों हो गई है? विक्रेताओं की शिकायत यह है कि हिंदी में खरीद कर पुस्तक पढ़ने वाला पाठक नहीं है। दूसरी बात यह है कि पुस्तकें इतनी महंगी हो गई है कि पाठक की क्रयशक्ति जवाब दे जाती है। तर्क-वितर्क में कितने ही कारण दिए जा सकते है, किंतु इतना तय है कि हिंदी का संसार निरंतर सिकुड़ता जा रहा है। इसका विस्तार कैसे होगा, इस पर गंभीर विचार किया जाना चाहिए।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार हैं)