घातक उग्रता

तमिलनाडु में सत्ताधारी दल द्रमुक के कार्यकर्ताओं ने जिस तरह भाजपा और हिंदू मुन्नानी के कार्यालयों में हमले किए उसकी सिर्फ और सिर्फ निंदा ही की जा सकती है
 
तमिलनाडु में सत्ताधारी दल द्रमुक के कार्यकर्ताओं ने जिस तरह भाजपा और हिंदू मुन्नानी के कार्यालयों में हमले किए उसकी सिर्फ और सिर्फ निंदा ही की जा सकती है-ठीक वैसे ही जैसे रामविलास वेदांती के कथित धर्मादेश की, लेकिन देश यह अच्छी तरह महसूस कर रहा है कि एक पक्ष की गलती पर चुप्पी साधी जा रही है और दूसरे पक्ष की गलती पर बढ़-चढ़कर प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है। इस दोहरे मानदंड का परिचय जानबूझकर दिया जा रहा है। यह विकृत पंथनिरपेक्षता का घातक नमूना है। ऐसी पंथनिरपेक्षता राष्ट्र को खतरे में डालने वाली है, क्योंकि यह बहुसंख्यक समाज का सीधे और खुले तौर पर अनादर करती है। यह शर्मनाक है कि किसी भी पंथनिरपेक्षतावादी ने करुणानिधि के खिलाफ मुंह खोलने का साहस नहीं जुटाया, जबकि उन्होंने करोड़ों हिंदुओं के आराध्य राम का बार-बार निरादर किया।
 
 विहिप नेता रामविलास वेदांती के तथाकथित फतवे पर द्रमुक कार्यकर्ताओं की उग्र प्रतिक्रिया का इसलिए कोई औचित्य नहीं बनता था, क्योंकि वेदांती के पक्ष में कोई भी खड़ा नहीं हुआ। उन्होंने अपने बयान का खंडन भी कर दिया था। प्रश्न यह है कि क्या ऐसा ही कुछ करुणानिधि के बयानों के संदर्भ में भी हुआ? वह अभी भी अपनी अमर्यादित टिप्पणियां वापस लेने के लिए तैयार नहीं। आखिर अधिक घातक क्या है- एक मुख्यमंत्री की उकसावे वाली टिप्पणियां अथवा किसी पूर्व सांसद का ऐसा बयान जिसे वापस ले लिया गया? यदि सोनिया गांधी ने रामविलास वेदांती के कथित बयान पर कट्टरपंथियों से लड़ने के लिए सभी को एकजुट होने की सलाह दी है, जैसा कि द्रमुक नेता दावा कर रहे हैं तो यह दु:खद भी है और निराशाजनक भी। निश्चित रूप से कंट्टरपंथियों से एकजुट होकर लड़ने की जरूरत है, लेकिन उनमें जानबूझकर भेद करके नहीं। आज ऐसा ही किया जा रहा है और वह भी सोची-समझी रणनीति के तहत। 

 
 
   इससे अधिक खतरनाक और कुछ नहीं कि किसी राज्य में सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता विरोधी दल के कार्यालयों पर हमले करें और वह भी तब जब उसके नेता ने ही लोगों को आक्रोशित करने का काम किया हो। इसमें किसी को आपत्ति नहीं कि द्रमुक कार्यकर्ता करुणानिधि को अपना भगवान मानें, लेकिन आखिर उन्हें इस बात की इजाजत किसने दी कि वे दूसरों के आराध्य को अपमानित करें? तमिलनाडु में आज जो कुछ हो रहा है वह केंद्र सरकार द्वारा जानबूझकर ओढ़ी गई लाचारी का दुष्परिणाम है। क्या यह विचित्र नहीं कि रामसेतु मसले पर देश चिंतातुर है, लेकिन कोई नहीं जानता कि इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री की क्या राय है? केंद्रीय सत्ता का नेतृत्व कर रही कांग्रेस का दृष्टिकोण भी समझ से परे है। कांग्रेस और केंद्र सरकार ने जिस सफाई से देश को शर्मसार करने वाले हलफनामे पर किसी को उत्तरदायी ठहराने से इनकार कर दिया उसका ही परिणाम है कि द्रमुक प्रमुख अपनी जबान पर लगाम लगाने से इनकार कर रहे हैं। कुछ ऐसा ही आचरण द्रमुक की ओर केंद्र सरकार में मंत्री टीआर बालू भी कर रहे हैं। वह अपने लोगों को अभी भी इसके लिए आश्वस्त कर रहे हैं कि रामसेतु टूट कर रहेगा। अच्छा हो कि केंद्रीय सत्ता यह महसूस करे कि रामसेतु मसले पर उसकी अकर्मण्यता देश की एकता के तंतुओं और पुलों को कमजोर बना रही है।