आस्था के प्रति संकीर्ण सोच

राम और रामायण को भारत के सांस्कृतिक व्यक्तित्व को परिभाषित करने वाला तत्व मान रहे हैं स्वप्न दासगुप्ता 
 

1980 के अंतिम दौर में लालकृष्ण आडवाणी ने भारतीय राजनीति में दो नए शब्द जोड़े थे-अल्पसंख्यवाद तथा छद्म पंथनिरपेक्षता। इन शब्दों के विशेष प्रभाव ने न केवल भारतीय राजनीति और जनमानस की सोच को बदलने का काम किया, बल्कि भाजपा को भी राष्ट्रीय राजनीति में एक ताकत के रूप में स्थापित होने में मदद की। पिछले सप्ताह रामसेतु मामले में राम और रामायण की प्रामाणिकता को लेकर पुरातत्व विभाग के हलफनामे पर उत्पन्न विवाद के बीच आडवाणी ने एक नया शब्द सैडो-सेकुलरिज्म सामने रखा है। इसका इस्तेमाल वह कथित पंथनिरपेक्षतावादियों द्वारा मजहबी आस्थाओं, विशेषकर हिंदुओं की मान्यताओं का उपहास उड़ाने की प्रवृत्ति को रेखांकित करने के लिए करते हैं।

   राम का अस्तित्व होने या न होने को लेकर उत्पन्न हुई उत्तेजना ने उस बहस को ढक दिया जो सेतुसमुद्रम परियोजना के औचित्य को लेकर आरंभ हुई थी। पिछले एक वर्ष से हिंदू समर्थकों का एक छोटा सा समूह ही रामसेतु या एडम ब्रिज को बचाने का एक ई-मेल अभियान छेड़े हुए था। परियोजना का उनका विरोध दो तर्को पर आधारित था। पहला यह है कि समुद्र के अंदर स्थित पुल, जिसकी पुष्टि सेटेलाइट तस्वीरों में हुई है, वास्तव में लंका पर चढ़ाई के लिए भगवान श्रीराम की वानर सेना द्वारा निर्मित किया गया था। परियोजना का विरोध कर रहे लोगों की मांग है कि रामसेतु को प्राचीन स्थलों और स्मारकों के अधिनियम के तहत संरक्षित किया जाए। केरल में 16 सितंबर को पारित एक प्रस्ताव में यह घोषित किया गया कि रामसेतु हिंदुओं के लिए उतना ही पवित्र स्थल है जितना कि मुस्लिमों के लिए मक्का, ईसाइयों के लिए वैटिकन, यहूदियों के लिए वेलिंग वाल तथा बौद्धों के लिए बोध गया।
  
  
   परियोजना के विरोध में दूसरा तर्क यह है कि इस सेतु को नष्ट कर देना पर्यावरणीय दृष्टि से घातक होगा। यह क्षेत्र 3600 अलग-अलग जल संसाधनों का केंद्र है और सुनामी लहरों का प्राकृतिक अवरोध भी है। इस क्षेत्र को समुद्री जहाजों का यात्रा मार्ग बना देने से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी प्रतिकूल असर होगा। रामसेतु मामले पर पुरातत्व विभाग के हलफनामे और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि द्वारा राम की इंजीनियरिंग पर बेहूदा सवाल उठाने तक इस परियोजना के खिलाफ अभियान कुछ हिंदू कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शनों तक सीमित ही था। यद्यपि आरएसएस के समर्थन से भाजपा ने जून में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सत्र में रामसेतु बचाने के पक्ष में एक प्रस्ताव पारित किया था और मुरली मनोहर जोशी ने राज्यसभा में इस संदर्भ में एक जोरदार वक्तव्य भी दिया था, लेकिन पार्टी के भीतर बहुत थोड़े लोगों की ही यह राय थी कि यह मामला रामजन्मभूमि की तरह लोगों को आंदोलित कर सकता है।
  
  
   रामसेतु अभियान के साथ एक दिक्कत यह है कि इसके आंदोलनकारी इस भ्रम से पूरी तरह निकल नहीं सके कि यह मामला आस्था का प्रश्न है या पर्यावरण रक्षा के लिए रामसेतु को बचाना जरूरी है? बहुत सारी ऊर्जा यही सिद्ध करने के लिए खर्च की जा रही है कि रामसेतु प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव निर्मित है। इसके समर्थन में इंटरनेट पर बहुत से पन्ने भरे पड़े हैं। प्रचलित हिंदूवाद की असाधारण विशेषता यह है कि यह राष्ट्रीय आस्था है, जो भारतीय उपमहाद्वीप की जमीन में रोपित है। समाज विज्ञानी मार्टिन ग्रे ने बीस साल तक हिंदू धर्म का अध्ययन किया है। उनका कहना है कि पूरे विश्व में भारत में तीर्थांटन की परंपरा सबसे प्राचीन है। तीर्थस्थलों की संख्या इतनी बड़ी है कि पूरा भारत वर्ष ही एक विशाल तीर्थस्थल सा लगता है। महाभारत में करीब तीन सौ मंदिरों का वर्णन है। कल्याण तीर्थांकमें 1820 तीर्थ यात्राओं का बखान है।
  
  
   हावर्ड की प्रोफेसर डियाना एक्क ने अपनी पुस्तक बनारस : सिटी आफ लाइफ में लिखा है कि तीर्थ को मुख्यतया देवताओं और प्रसिद्ध विभूतियों के महान कार्यों और उपस्थिति से जोड़कर देखा जाता है। स्वर्ग और पृथ्वी की सीमारेखा के बीच तीर्थ न केवल लोगों की प्रार्थना को देवताओं की ओर अग्रसर करते हैं, बल्कि ये देवताओं के पृथ्वी लोक पर उतरने का स्थल भी है। हिंदू तीर्थ स्थलों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसना हास्यास्पद होगा, जैसे 51 शक्ति पीठ के बारे में कहा जाता है कि शिवजी के तांडव नृत्य के दौरान यहां सती के शरीर के हिस्से मिले थे। इसी प्रकार यहां रामायण और महाभारत से संबंधित तीर्थों के अनेक संदर्भ हैं। उदाहरण के लिए घायल लक्ष्मण को बचाने के लिए हनुमान ने जिस गंधमदन पर्वत को उखाड़ा था, उसके संदर्भ में तीन तरह के दावे किए जाते हैं। भारत तो वह धरती है जहां रामकथा के तथाकथित खलनायकों को भी खारिज नहीं किया गया है। देवगढ़ के वैद्यनाथ मंदिर का संबंध रावण से है, जो शक्तिशाली होने के साथ-साथ परम विद्वान तथा शिव का उपासक भी था। कुंभकोणम का नाम रावण के बलशाली अनुज कुंभकर्ण पर पड़ा। रामायण की प्रामाणिकता पुरातात्विक प्रमाणों की मोहताज नहीं है। तथ्य यह है कि रामायण को उसके विभिन्न रूपों में एक दृष्टांत के रूप में देखा जाता है और भगवान श्रीराम को जाति, वर्ग तथा समूह की संकीर्णता से परे संपूर्ण हिंदू मानस में एक आदर्श राजा माना जाता है। वस्तुत: रामायण भारत के सांस्कृतिक व्यक्तित्व को परिभाषित करने वाला तत्व है। रामायण के पवित्र स्थलों की किसी से तुलना नहीं हो सकती। वे तो सनातन हिंदू आस्था से संबद्ध है। इस आस्था पर किसी तरह का संदेह उत्पन्न करना, जैसा कि एएसआई ने किया या उसे अनावश्यक अपमानित करना, जैसा कि करुणानिधि ने किया, यही प्रदर्शित करता है कि पंथनिरपेक्ष नियंत्रण हिंदू मान्यताओं की बात आने पर न जाने कहां गुम हो जाता है। संप्रग सरकार ने जो गलती की वह कोई तकनीकी भूल नहीं है। यह उस मानसिकता की उपज है जो केवल हिंदुत्व को अपमानित कर आनंदित होती है। चाहे जो भी कहा जाए, आज कांग्रेस सैडो सेकुलरिज्म को पोषित करने की जिम्मेदारी से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती।