महिषासुर जैसा भ्रष्टाचार

अगर लोगों से पूछा जाए कि देश के सामने सबसे बड़ी समस्या कौन सी है तो लोग अलग-अलग उत्तर देंगे। कोई कहेगा कश्मीर समस्या सबसे गंभीर है,कोई कहेगा पूर्वोत्तर की समस्याएं ज्यादा विषम हैं, कोई कहेगा नक्सल आंदोलन सबसे बड़ी चुनौती है और शायद कोई कहेगा आतंकवाद सबसे बड़ा खतरा है, लेकिन मुझे लगता है कि आज देश के सामने सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार की है। अगर गहराई से देखा जाए तो भ्रष्टाचार एक ऐसी कड़ी बनाता है जो सब समस्याओं को पिरोती है। जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में भ्रष्टाचार एक विकराल रूप धारण कर चुका है। इन दोनों ही क्षेत्रों में ऐसे वर्ग हैं जो आतंकवाद से उत्पन्न परिस्थितियों का लाभ उठाकर अपनी जेबें भर रहे हैं। केंद्र सरकार आर्थिक विकास के लिए कश्मीर और पूर्वोत्तर में पानी की तरह पैसा बहा रही है। इस धनराशि का बहुत बड़ा भाग बेईमान नेताओं, भ्रष्ट अफसरों और बदनीयत ठेकेदारों के कोष में जा रहा है। पूर्वोत्तर में तो भ्रष्टाचार इतना व्याप्त हो चुका है कि उसकी सीमा बताना मुश्किल है।
   एक प्रदेश के मुख्यमंत्री पर तो यह आरोप लगा था कि उन्होंने करोड़ों रुपए आतंकवादी संगठनों को दिए। नगालैंड में विद्रोहियों की समानांतर सरकार चल रही है। मणिपुर में किसी भी बड़ी योजना का ठेका उसी को मिल सकता है जिस पर आतंकी संगठनों का वरदहस्त हो। दुर्भाग्य से न तो विद्रोहियों के खिलाफ ठोस कदम उठाए जा रहे है और न ही आवंटित धन के सदुपयोग का कोई मापदंड निर्धारित किया जा रहा है। नक्सल समस्या के पीछे भी भ्रष्टाचार एक बहुत बड़ा कारण है। भ्रष्टाचार की वजह से भारत सरकार की विकास संबंधी योजनाएं धरी रह जाती हैं और आम आदमी को वांछित राहत नहीं मिलती। जन वितरण प्रणाली एकदम चरमरा गई है। सरकार जानती है कि नक्सल समस्या का तब तक निवारण नहीं हो सकता जब तक प्रभावित जनपदों/प्रदेशों का आर्थिक विकास नहीं होगा। यह तथ्य ध्यान में रखते हुए प्रभावित जनपदों को विशेष तौर से धनराशि आवंटित की जाती है, पर यह पैसा कहां जा रहा है या इसका क्या सदुपयोग हो रहा है, इसके बारे में किसी को नहीं पता। नतीजा सामने है। नक्सल आंदोलन धीरे-धीरे अन्य प्रदेशों में फैलता जा रहा है। आतंकवाद की जड़ में भी भ्रष्टाचार है। मुंबई में 1993 में जो विस्फोट हुए थे वे भ्रष्ट अधिकारियों की ही देन थे। इन अधिकारियों ने आरडीएक्स तथा अन्य अस्त्र-शस्त्र समुद्री रास्ते से भारत आने दिया था। हवाला द्वारा हजारों करोड़ रुपए के वारे-न्यारे हो रहे हैं। देश में बहुत सी ऐसी गैर-सरकारी सामाजिक संस्थाएं हैं जो कहने को तो विदेशी मुद्रा किसी अच्छे सामाजिक कार्य के लिए मंगाती हैं, लेकिन इस मुद्रा का बहुत बड़ा अंश वे राष्ट्र विरोधी तत्वों या संगठनों को दे देती हैं।
   देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में विशेष तौर पर भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है। करीब दो वर्ष पहले एक केंद्रीय मंत्री का ध्यान मैंने इस ओर आकर्षित किया था तो उन्होंने मुझे आश्वासन देते हुए कहा था कि मैं भ्रष्ट अधिकारियों की एक सूची बनाकर उनके पास भेजूं। काफी छानबीन करने के बाद मैंने भ्रष्टतम आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की एक सूची बनाई। चाहता तो यह था कि दस आईएएस और दस आईपीएस अधिकारियों की ही सूची हो, पर इस संख्या को मैं तेरह-तेरह से कम नहीं कर पाया। अपने पत्र में मैंने लिखा कि इन तेरह आईएएस अधिकारियों की चल-अचल संपत्ति कम से कम सौ करोड़ की है और तेरह आईपीएस अधिकारियों की चल-अचल संपत्ति कम से कम दस करोड़ की। मैंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं है कि आईपीएस अधिकारी अपेक्षाकृत कम बेईमान है, बल्कि सच यह है कि उन्हे अवैध संपत्ति अर्जित करने के उतने मौके नहीं मिलते।
  
   जिन कैबिनेट मंत्री को मैंने पत्र लिखा था वह अगर चाहते तो अपनी कलम से उन भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्घ सीबीआई जांच का निर्देश दे सकते थे और नहीं तो कम से कम उनके इनकम टैक्स रिटर्न का सत्यापन करा सकते थे। दुर्भाग्य से उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। कुछ महीने बाद जब मैंने उन्हें एक रिमाइंडर भेजा तो उनके सचिव ने एक संक्षिप्त उत्तर प्रेषित किया कि आपका पत्र मंत्री महोदय को दिखा दिया गया है। इसका मतलब था कि पत्रावली बंद कर दी गई है। उल्लेखनीय है कि यह पत्र मैंने अपने लेटरहेड पर हस्ताक्षर करके भेजा था अर्थात यह कोई गुमनाम पत्र नहीं था। उत्तर प्रदेश में जब दस्यु ददुआ मारा गया तो मैंने कहा था कि ददुआ जंगल में रहता था और सब जानते थे कि वह डकैत है इसलिए उसे मारा जा सका, पर उन डकैतों से कैसे निबटा जाए जो सचिवालय में बैठे हैं या खाकी वर्दी पहनकर अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे है? उत्तर प्रदेश सरकार में अगर साहस हो तो वह भ्रष्टतम आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की सूची बनाकर उन्हें नौकरी से सीधे बर्खास्त करे।
  
   वैसे तो भ्रष्टाचार देश के सभी विभागों में है, पर यदि उन्हें चिह्नित और बर्खास्त करने की शुरुआत आईएएस और आईपीएस से की जाए तो इसका तत्काल प्रभाव अन्य विभागों पर पड़ेगा। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने 31 मार्च 2006 को समाप्त हुए वर्ष के प्रतिवेदन में लगभग हर विभाग पर उंगली उठाई है। सीएजी के अनुसार सरकार की अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की शैक्षिक योजनाओं के क्रियान्वयन में प्रगति नहीं हुई। इसके अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यकों से संबंधित शैक्षिक योजनाएं और सर्वशिक्षा अभियान कोई छाप नहीं छोड़ सका। शासकीय धन का गबन कई विभागों में किया गया। सबसे अधिक गड़बड़ियां स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विभाग में पाई गई। जनता जानना चाहेगी कि सीएजी रिपोर्ट ने जो तथ्य उजागर किए हैं उन पर क्या कार्रवाई की गई? उत्तर प्रदेश में ही पुलिस भर्ती में जो भ्रष्टाचार हुआ वह सामने आ रहा है। मानवीय दृष्टिकोण से उन सिपाहियों से सहानुभूति है जो सभी अर्हताएं पूरी करते थे, फिर भी भर्तियों में व्यापक अनियमितताओं के कारण उन्हें नौकरी से निकाला गया। अधिकारियों पर तो जैसी करनी, वैसी भरनी वाला मुहावरा चरितार्थ होता है,पर मुख्यमंत्री की कार्रवाई तब तक अधूरी मानी जाएगी जब तक इन अनियमितताओं के जिम्मेदार नेता एवं नौकरशाह दंडित नहीं होते।
  
   सभी लोग जानते है कि भर्ती में उगाही का पैसा कुछ प्रमुख नेताओं के पास जाता था और सचिवालय में तैनात कुछ अधिकारी भी अनियमितताओं में भागीदार थे। इतने बड़े पैमाने पर अनियमितताएं सभी की साठगांठ से ही होती है। अभी केवल पुलिस पर गाज गिरी है, प्रशासनिक अधिकारियों और नेताओं को जवाबदेह बनाना बाकी है। देखना है कि सरकार लूट-खसोट करने वाले नेताओं और नौकरशाहों के विरुद्घ क्या कार्रवाई करती है? भारत को सबक लेना चाहिए बांग्लादेश से, जहां यद्यपि तानाशाही है, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ वहां की सरकार ने जो कदम उठाए है वे सराहनीय है। वहां करीब 170 राजनीतिक हस्तियों को जेल में डाला जा चुका है। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया और हसीना भी हैं। क्या हमारे देश की केंद्र सरकार या राज्य सरकारें बांग्लादेश के अधिकारियों जैसा नैतिक साहस दिखा सकेगी?
  
   (लेखक उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी है)